Tuesday, 20 March 2012

पटियाला में प्रॉपर्टी अर्श से फर्श पर, सौदे सरंडर, property down in patiala, puda contract surrendered

-26-26 लाख रूपये की धरोहर राशि छोड़ कर रहे प्राइम प्रापर्टी को सरेंडर
-एक साल पहले हुए नीलामी के बाद पूडा को पहली किश्त ही जमा नहीं करवाई
-श्री दुख निवारण साहिब से मिनी सचिवालय रोड पर कटे थे 101 गज के 21 प्लाट
भूपेश चट्ठा, पटियाला
 राजनीतिक सत्ता में आपेक्षित बदलाव ना हो तो अर्थव्यवस्था डगमगाने लगती है। पंजाब विधान सभा चुनावों के परिणाम पटियाला के प्रापर्टी डीलरों की अपेक्षाओं, अनुमानों और अटकलों पर खरे नहीं उतरे तो जमीन जायदाद का अर्थशास्त्र गड़बड़ा गया और प्रापर्टी के दाम अर्श से फर्श पर आ गए हैं। चुनाव परिणाम आने के पहले पखवाड़े में ही बाजार से खरीददार गायब हो गए और सौदे सरेंडर होने लगे हैं।
आलम ये है कि एक साल पहले लंबी जदेजहद व नीलामी में पूरे मोल भाव कर जो प्रापर्टी खरीदी गई अब उसे 26-26 लाख रूपये की धरोहर राशि छोड़ कर सरेंडर किया जा रहा है। पंजाब अर्बन डेवलेपमेंट एंड प्लानिंग अथार्टी, पूडा की ओर से एक साल पहले 25 मार्च को गुरुद्वारा श्री दुख निवारण साहिब से मिनी सचिवालय की ओर जाने वाली रोड पर देवीगढ़ डिवीजन के काटे गए कामर्शियल प्लाट करोड़ों से कोडियों पर आ गए है। पूडा के आधिकारिक सूत्र बताते हैं कि 101 गज के शो रूम के प्राइम प्रापर्टी के 21 प्लाटों की नीलामी की गई। इनमें से दो लोगों ने 15 मार्च को प्रार्थना पत्र दे कर प्रापर्टी औपचारिक रूप से कह दिया कि उन्हें प्रापर्टी नहीं चाहिए। तीन अन्य भी ऐसी ही इच्छा जता चुके हैं जबकि पूछताछ करने वालों की संख्या एक दर्जन के पार बताई जा रही है।
दिलचस्प है जो जमीन एक साल पहले दो से सवा दो करोड़ के बीच नीलामी में बिकी थी वो एक साल में बेकार की क्यों हो गई? पूडा की नीलामी के बाद पहली बार में 25 फीसदी राशि जमा करवानी होती है और इसके बाद ज्यादा से ज्यादा चार किश्तों में शेष राशि जमा करवानी होती है। इन प्लाटों की 15 मार्च को पहली किश्त दी जानी थी। जिसे कुछ लोग पूरा कर पाने की स्थिति में नहीं हो पाए और आगे सौदे हो नहीं सके। ऐसे में पूडा 26 लाख रूपये की कटौती कर बाकी रकम लौटाएगी।
याद रहे कि ऐसी प्रापर्टी पहले तीन साल में ट्रांसफर नहीं हो सकती और सभी किश्तें जमा होने के बाद रजिस्ट्री करवा कर ही अगले खरीददार को बेची जा सकती है। इस पर भी खासा बड़ा शुल्क लगना तय होता है। पूडा के ही एक वरिष्ठ अधिकारी बताते है कि नीलामी में वास्तविक खरीददार के अलावा सट्टा लगाने वाले ट्रेडर भी आ जाते हैं। जिन्हें रोका नहीं जा सकता। इन लोगों के एक साथ कई जगहों पर सौदे हुए होते हैं, जो मंदी के दौर में टूटने लगते हैं। पटियाला में भी लोगों ने उम्मीदें कुछ ज्यादा लगा रखी थी जो धाराशाई हो गई हैं।

Wednesday, 14 March 2012

पंजाब के आब में घुल गया एल्यूमीनियम, heavy metals founds in ground water, aluminium ,


-सात जिले खतरनाक सीमा में आए, अतिरिक्त हैवी मैटल मौजूद
-हर दसवां नमूना हो रहा फैल
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब के आब में घुल गया एल्यूमीनीयम, कैडमियम, क्रोमियम, लैड, मर्करी, आर्सेनिक, सेलेनियम... प्रदेश में भूमिगत जल के लिए गए नमूनों में हैवी मैटल पाया जा रहा है। भारी धातुओं का होना गलत बात नहीं है ये भी आयरन, जिंक, मैग्नीशियम जैसे मिनरल की ही श्रेणी में आते लेकिन प्रदेश में कई स्थानों में ये जरूरत से च्यादा भी है।
जी हां पांच पानियों की धरती पंजाब के लिए चौंकाने वाली यह किसी एनजीओ की रिपोर्ट नहीं है और ना ही किसी शौकिया डाक्टरों के समूह की ओर से लिए गए सैंपलों का ब्योरा है और ना ही पानी संबंधी उत्पाद बेचने वाली कंपनी की ओर से डराने वाला खुलासा। प्रदेश सरकार के वाटर सप्लाई एंड सेनीटेशन विभाग की ओर से लिए गए नमूनों में उक्त खुलासे हुए हैं।
प्रदेश में पानी के नमूने लेकर हैवी मैटल की मात्रा जांची जा रही है, पिछले साल दिसंबर महीने शुरु हुई इस प्रक्रिया में पता किया जा रहा है कि कहां पानी सर्वाधिक खराब और कहां निर्मल है?
विभाग की पटियाला स्थित प्रयोगशाला में किए गए परीक्षणों के परिणाम अभी सार्वजनिक नहीं किए गए हैं लेकिन अधिकारिक सूत्रों का कहना है कि प्रदेश के सात जिले ऐसे हो गए हैं जहां पीने के पानी में हैवी मैटल की मौजूदगी च्यादा है और खतरनाक सीमा में आ गए हैं और औसतन प्रदेश में लिया गया हर दसवां नमूना फेल हो रहा है।
प्रयोगशाला में 34 लाख रूपये का एक विशेष उपकरण आटोमैटिक अैबजार्पशन स्पैकट्रोफोटोमीटर लगाया गया है। इससे पानी में मौजूद 10 प्रकार की भारी धातुओं का पता लगाया जा सकता है। प्रयोगशाला में बीते साल किए गए प्रयोगों के बाद इस साल के पहले ढ़ाई महीनों में शुरु हुए परीक्षणों में 110 सैंपलों में से 10 फीसदी सैंपल फेल हो गए हैं। इनमें, आयरन व मैगनीशियम जैसी कम खतरनाक धातुओं के अलावा एल्यूमीनीयम की मात्रा च्यादा पाई गई है।
सूत्रों का कहना है कि फेल हुए नमूनों में पठानकोट का गांव भंगरूरी में एल्यूमीनीयम, सुजानपुर ब्लाक के गांव मेहरा कलां में एल्यूमीनीयम, इसी ब्लाक के कैलाशपुर में मैगीनीशियम , रूप नगर जिले के गांव खंभेड़ा में आयरन, बङ्क्षठडा जिले के गांव बडिय़ाला के पानी में एल्यूमीनीयम, फिरोजपुर के गांव करमिटी व जलालवाला में एल्यूमीनीयम, कटोरा गांव में एल्यूमीनीयम व आयरन की मात्रा निर्धारित सीमा से कहीं अधिक पाई गई है।
वहीं प्रयोगशाला की प्रभारी एक्सीयन इंजी. मीनाक्षी इस संबंध में कुछ भी कहने से इन्कार करती हैं। कहती हैं कि बिना वरिष्ठ अधिकारियों की अनुमति के वे ना तो रिपोर्ट नहीं दे सकती हैं और ना ही कोई टिप्पणी करेंगी। जबकि विभाग के चीफ इंजीनियर आरएल कौलधर चंडीगढ़ में बैठकों में अधिक व्यस्त होने के चलते प्रतिक्रिया नहीं दे सके।

'हैवी मैटल के शरीर में जरूरत से च्यादा प्रवेश करने पर हमारे तीन महत्वपूर्ण अंगों लीवर, किडनी और दिमाग के विपरीत रूप से प्रभावित होना तय होता है। असर कम या च्यादा, जल्दी या देर से हो पर होता जरूर है और इससे बचने के उपाय भी नहीं है, इसके अलावा जीव की प्रजनन शक्ति भी क्षीण होती हैÓ डा. अमर सिंह आजाद एक्सपर्ट कम्यूनिटी मेडिसीन

Tuesday, 6 March 2012

समाना का 'श्राप' पटियाला ग्रामीण पर आया!, after polling result, punjab election, patiala,


जागरण विशेष
भूपेश चट्ठा, पटियाला
प्रदेश में सत्ता के दूसरे बड़े केंद्र के रूप में जाने जाते पटियाला जिले का समाना विधान सभा ऐसा चुनावी क्षेत्र रहा है जहां के विधायक को 'सत्ता का सुखÓ नहीं मिल पाता लेकिन डी-लीमिटेशन के बाद इस क्षेत्र को तोड़ कर बने पटियाला ग्रामीण की स्थिति भी अब कुछ ऐसी हो गई है कि कांग्रेस के उम्मीदवार ने चुनाव तो जीता पर तमाम अनुमानों-अटकलों व 'परंपराओंÓ के बावजूद कांग्रेस प्रदेश की सत्ता पर काबिज नहीं हो सकी है। ऐसे में पहली प्रतिक्रिया यही आ रही है कि जिस तरह से समाना विधान सभा क्षेत्र पर विपक्ष में बैठने का 'श्रापÓ लगा था अब वो पटियाला ग्रामीण शिफ्ट हो गया है।
समाना से इस बार 2012 में सुरजीत सिंह रखड़ा चुनाव जीते हैं और पहली ही विकास रैली में पार्टी प्रधान सुखबीर सिंह बादल ने उन्हें चुनाव जीतने पर कैबिनेट मंत्री बनाने की घोषणा कर दी थी, जबकि पिछली बार 2007 में वे इसी सीट पर चुनाव हारे पर पार्टी राज्य की सत्ता में आ गई। ठीक इसी तरह 2002 में वे चुनाव जीते और कांग्रेस के ब्रहम महिंदरा चुनाव हरे तो प्रदेश में कांग्रेस की सत्ता बनी। इस बार समाना से पटियाला ग्रामीण आए कांग्रेस के ब्रहम महिंदरा भारी मतों से चुनाव जीते हैं पर राज्य में कांग्रेस आ गई है। यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहा है। बस एक बार अपवाद 1997 में हुआ लेकिन तब शिरोमणि अकाली दल की लहर में इसी पार्टी के उम्मीदवार जगतार सिंह राजला चुनाव जीते पार्टी सत्ता में आई तो राजला जत्थेदार गुरचरण सिंह टोहड़ा के साथ सर्व हिंद शिरोमणि अकाली दल में जा विपक्ष में बैठ गए।

मुखमैलपुर ने जलालपुर को  'भाजीÓ लौटाई
घनौर सीट से 2007 में निर्दलीय के रूप में 732 वोटों से चुनाव जीते मदन लाल जलालपुर को मुखमैलपुर ने 'भाजीÓ लौटा दी है। हालांकि इस बार अजैब सिंह मुखमैलपुर के स्थान पर उनकी पत्नि हरप्रीत कौर मुखमैलपुर 1778 वोटों के अंतर से जीत पाई हैं। याद रहे कि पिछला चुनाव जीतने के बाद जलालपुर पहले अकाली हुए और फिर कांग्रेस का टिकट लेने में कामयाब रहे।

किराए के मकान से निकल राजपुरा के 'मूल निवासीÓ हुए कंबोज
राजपुरा सीट पर भारी बहुमत से जीतने वाले हरदयाल कंबोज पर 2007 में राजखुराना की 'बिरादरीÓ से 'बाहरीÓ उम्मीदवार के रूप में जूझे पर हार गए। पांच साल राजपुरा अपडाउन करते रहे अंत में किराए पर मकान लेने वाले कांग्रेस के हरदयाल कंबोज ने मतदान के बाद और चुनाव परिणाम आने से पहले ही राजपुरा में मकान खरीद लिया है। अब उन्हें यहां की जनता ने 'मूल निवासीÓ होने का प्रमाण पत्र जारी कर दिया है।

लाल सिंह ने बताया 'अनुभवÓ क्या चीज है?
सनौर में कांटे की टक्कर बताई जा रही थी हुआ भी कुछ ऐसा ही लेकिन अंत में घाघ सियासतदान लाल सिंह ने बता ही दिया कि पढ़ाई लिखाई अपनी जगह है पर 'अनुभवÓ बड़ी चीज है।

पटियाला ने फिर चुकाया कैप्टन का 'कर्जÓ, पर परनीत कौर को झटका

पटियाला शहर के वोटरों ने पूर्व रियासत के महाराजा कैप्टन अमरिंदर सिंह का 'कर्जÓ एक बार फिर से चुका दिया है, हालांकि तमाम प्रयासों के बाद पुत्र रणइंद्र सिंह के हार जाने से विदेश राज्यमंत्री परनीत कौर को झटका जरूर लगा है।

बनिंदर कौर लूंबा को मिली 765 वोटों की 'सहानुभूतिÓ
सर्वाधिक ग्रामीण व पिछड़ा क्षेत्र कहे जाने वाले शुतराणा सीट पर अकाली दल की बनिंदर कौर लूंबा के हिस्से में इस बार 765 वोटों की 'सहानुभूतिÓ आई है। याद रहे कि यहां से पहले अकाली और फिर कांग्रेसी के रूप में चुनाव जीतते रहे निर्मल सिंह शुतराणा 'धक्का हुआÓ के नारे पर लड़ते रहे हैं पर इस बार लूंबा 'साडी मदद करोÓ ज्यादा भारी पड़ा।

आलू का थैला बैन, पर पैकिंग में चिप्स बिकेगा, plastic, carry bag, pollution, potato, chips


-40 माइक्रोन से मोटे प्लास्टिक के कैरी बैग पर कानूनन प्रतिबंध लगा
-ज्यादा खतरनाक एलडी व एचडी दाने के मिलने से बना पैकिंग मैटेरियल खुल कर सरकार बिकवा रही है
-राज्य सरकार ने 'पंजाब कैरी बैग रूल 2005Ó बनाया है पर...: पीपीसीबी
भूपेश चट्ठा, पटियाला
आम आदमी साधारण सी रेहड़ी पर से आलू खरीदता है तो उस आलू को भरने वाले आम थैले पर सरकार ने पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए प्रतिबंध लगा दिया है लेकिन वही आलू यदि कोई बड़ी कंपनी चिप्स बना कर पैकिंग में बेच रही है तो कोई दिक्कत नहीं है। हालांकि तकनीकि रूप से चिप्स की पैकिंग में प्रयोग किया गया प्लास्टिक पर्यावरण की दृष्टि से ज्यादा खतरनाक है।
प्लास्टिक इंडस्ट्री से जुड़े जानकार बताते हैं कि आलू चिप्स, भुजिया, क्रेक्स से लेकर शैंपू तक और हर तरह के इलेक्ट्रानिक अथवा इलेक्ट्रिक सामान की पैकिंग करने में जिस मैटेरियल का प्रयोग हो रहा है वो अब तक बनने के बाद से धरती पर ही मौजूद है और इस वेस्ट पदार्थ को कहीं भी खत्म नहीं किया जा सका है।
बाजार में एलडी व एचडी दानों को साथ मिला कर तैयार किए जाने इस पैकिंग मैटेरियल का कोटा भी केंद्र सरकार की भारत पैट्रोलियम जैसी कंपनियां ही उपलब्ध करवा रही हैं और प्लांट भी चल रहे हैं। व्यवसाय से जुड़े हरविंदर सिंह कुक्कू बताते हैं कि पांच रूपये किलो वाले आलू को पैक करने के लिए दो रूपये का लिफाफा चाहिए जबकि 20 रूपये के सौ ग्राम चिप्स लेकर जाने के लिए कुछ नहीं। गरीब आदमी पर अधिक बोझ डालने के अलावा हम यह भी भूल रहे हैं कि आलू की थैली तो फिर कोई गरीब गली में से बीन कर ले जा रहा है पर चिप्स का खाली पैकेट पांव से ही गाली देकर धकेल रहा है। लो डेंसिटी व हाई डेंसिटी के ये पैट्रोलियम उत्पाद प्राकृति के लिए ज्यादा खतरनाक हैं। स्पष्ट है कि सब्जी वाले ने आलू पैक किया तो अपराध और बहुराष्ट्रीय कंपनी ने आलू का टुकड़ा पैक किया तो सुविधा।
दिलचस्प है कि प्रदेश व केंद्र की सरकारों को एयर टाइट पैकिंग के लिए ज्यादा मजबूत मैटेरियल का हवाला दे कर एलडी व एचडी दाने का प्रयोग किया जा रहा है जबकि यही मजबूती कुछ शैंपू बनाने वाली कंपनियां पैपर की पैकिंग पर सेलोविन की परत चढ़ा कर पर्यावरण में चंद सप्ताह में घुलने वाला उत्पाद भी बनाने लगी हंै।
वहीं पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के डिप्टी डायरेक्टर डा. चरणजीत सिंह बताते हैं कि पंजाब कैरी बैग रूल 2005 के तहत 40 माइक्रोन से मोटे प्लास्टिक के कैरी बैग पर कानूनन प्रतिबंध लगाया गया है। जबकि अन्य पैकिंग मैटेरियल इस श्रेणी में नहीं आता।
याद रहे कि 40 माइक्रोन से पतले  कैरी बैग भी वही ठीक  हैं जिन पर इन्हें बनाने वाली कंपनी का पता भी स्टांप के साथ लगा होता है। इन्हें हिलाने पर आवाज नहीं होती और खींचने पर टूटते नहीं खिंचते चले जाते हैं। ये कुछ समय बाद पानी में घुल जाते हैं। जबकि एलडी व एचडी से बने उत्पादों को नष्ट नहीं किया जा सकता।

पांव-खुर गलते थे अब टयूबवेलों के पाइप भी नहीं टिकते, river ghagger, under ground water, pollution, tubewell,


नदी प्रदूषण: अंतिम
-पांच-छह साल में पाइप तो 10-12 साल में ही गल जाती है मोटर
फोटो:1, 2
भूपेश चट्ठा, पटियाला
  जिन जंगलों से नदी गुजरती हो वहां आए साल नलकूप खोदने पड़ते हों, ऐसा नहीं है कि नदी किनारे भूमिगत जल स्तर गिर रहा है लेकिन पानी की कमी हो जाती है। कई बार अचानक टयूबवेल पानी ही देना बंद कर देता है। पंजाब हरियाणा सीमा पर बहने वाली घग्गर नदी के पानी की हालत इन दिनों कुछ ऐसी हो गई है कि टयूबवेल के पाइप गलने लगे हैं और कई स्थानों पर अच्छे मैटल की और पानी में ही डूबने के लिए बनी मोटर भी जंग से जूझ रही होती है।
दरिया के किनारे कम से कम एक सौ मीटर तकके  टयूबवेलों की हालत कुछ ऐसी हो चली है कि हर पांच-छह साल में इनके पाइप बदलने पड़ते हैं जबकि मोटर की हालत 10-12 साल में गलने वाली हो जाती है। धर्मेहड़ी के किसान हरभजन सिंह बताते हैं कि पानी यहां 60 फीट पर ही है और काफी समय से टिका हुआ भी है, लेकिन पाइप के गलने के चलते निचली लैंथ बदलनी ही पड़ती है। दो तीन साल बाद ही डर सताने लगता है कि कहीं  निचले पाइप के च्यादा गलने से मोटर ही बोर के अंदर ना गिर जाए।
जीवन के छह दशक देख चुके किसान जगमिंदर सिंह कहते हैं कि पहले घग्गर नदी का पानी सिंचाई के काम में भी आता था नलकूप की जरूरत तो बाद के सालों में ही पड़ी है। पर अब इनके साथ ही नई मुसीबत भी आ गई है। इन्हें फिर से खोद कर मोटर व पाइप निकाले जाते है हालांकि बोर वही रहता है पर पाइप बदलने में खासा खर्च आता है। एक ही टुकड़ा 12 सौ से उपर का है, खुदाई की लेबर व मशीनरी का खर्च अलग से है। कई बार पानी में गल चुकी मोटर भी बदलनी पड़ जाती है।
क्षेत्र के बाशिंदे याद करते हैं कि अब पशु नदी के पास फटकते नहीं हैं, इंसानों के भी पांव गल जाते है और जानवरों के खुर, क्रिस्टल क्लीयर पानी अब काला-भूरा हो चुका है।
उल्लेखनीय है कि थापर यूनिवर्सिटी और पीपीसीबी के आठ सदस्यों दल की ओर से की गई छह साल पहले की गई मानिटरिंग में सामने आया कि नाइकेटा पेपर मिल मुबारकपुर से पहले लिए गए पानी के सैंपलों मे आर्गेनिक तत्वों, बीओडी सीओडी की मात्र क्रमश 4.2 व 10 माइक्रो ग्राम पाई गई, जिंक 0.46, कैल्शियम 28, मैग्नीशियम 20 एमजी पाया गया। जीरकपुर के आगे अंबाला-चंडीगढ़ पुल पर बीओडी 132, सीओडी  240 एमजी और कैल्शियम 160 व मैग्नीशियम 52 पर आ गया। जल जीवन गिर कर 20 फीसदी रह गया, किसी भी तरह की मछली इस पानी में 96 घंटों में मर जाती है।  हालात इसके बाद से बिगड़े ही हैं और जीरकपुर के बाद घग्गर में पंजाब हरियाणा के बनूड़, घनौर, सनौर, अंबाला, राजपुरा, पटियाला आदी कई शहरों का सीवर आ मिलता है। और दर्जन भर शराब व गत्ता फैक्ट्रीयां सहित कई इंडस्ट्री अपना योगदान दे रही है।

नापाक हुआ घग्गर किनारे का पानी, river ghagger, water pollution,


जागरण सरोकार : पर्यावरण संरक्षण

...नदी प्रदूषण : एक

फोटो: 1
- सब्जी उगाते हैं, बेचते हैं, पर खाते नहीं हैं
भूपेश चट्ठा, धर्मेहड़ी (पटियाला)
पंजाब के जिस पानी पर अनगिनत लोकगीतों की रचना की गई और जिसे हाथ में लेकर साथ जीने मरने की कसमें खाई जाती थीं, पंजाब के उसी आब को हाथ लगाने की हिम्मत अब नहीं होती। जल प्रदूषण की भेंट घग्गर दरिया इस कदर चढ़ चुका है कि कभी पवित्र निर्मल रहने वाला जल पूरी तरह से नापाक हो चला है।
आलम ये है कि पंजाब-हरियाणा सीमा पर स्थित धर्मेहड़ी गांव के पास से गुजरते घग्गर दरिया के पानी से क्षेत्र के किसान सब्जी उगाते हैं, बेचते भी हैं, पर खाते नहीं हैं। इतना ही नहीं घग्गर के ठीक किनारे पर स्थित खेतों में छोटे-छोटे डेरों पर मोटरें लगी हैं। बिजली भी अपने हिसाब से आती रहती है और ट्यूबवेल चलता भी है, पर यहां के लोग अपने पीने व भोजन के लिए पानी दूसरे की मोटर से लाते हैं।
सीमा पर अंतिम खेत के मालिक हरदीप सिंह बताते हैं कि पहले एक दो बोर से ही गड़बड़ वाला पानी आता था। अब ऐसे कई पंप हैं, जहां से दुर्गंध वाला पानी आता है। जिसके चलते पीने अथवा भोजन के लिए प्रयोग नहीं करते।
 ठीक ऐसे ही गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि उन्होंने कुछ मोटरों को ब्लैक लिस्ट जरूर किया है। पीने का पानी उन मोटरों से नहीं लेते, पर सब्जी उगाने और सिर्फ बाजार में बेचे जाने की बात पूरी तरह से सही नहीं है। हालांकि इच्छा के विपरीत फसलों को तो दिया जा रहा है, पर कोशिश होती है कि सब्जी को न लगाया जाए। यहां जुकाम के दौरान भी दुर्गंध का एहसास हो जाता है। खराबी क्या है? ये तो उन्हें नहीं पता, पर पानी स्वाद नहीं है, गेहूं पीली पड़ जाती है। जो लोग खाद की बात करते हैं, वे यहां पर गलत हैं, कई बार पौध अचानक ही मर जाती है।
ऐसा भी नहीं है कि नदी की सफाई नहीं होती, हर साल आने वाला तेज बरसाती पानी सारी गंदगी बहा ले जाता है, पर पानी उतरते ही फिर वही रंग चंद दिनों में लौट आता है। पंजाब हरियाणा को अलग करती घग्गर नदी में बरसाती पानी गुजर जाने के बाद, शहरों का सीवर और फैक्ट्रीयों का प्रदूषित जल आना शुरू होता है। पानी की रफ्तार कम होते ही यह प्रदूषण आसपास के कुओं नलकूपों के पानी को विपरीत रूप से प्रभावित कर रहा है।
वहीं पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के डायरेक्टर डा.चरणजीत सिंह कहते हैं कि ऐसा बिलकुल सही नहीं है कि दुर्गंध वाला पानी जमीन के 200 फीट नीचे हो सकता है। वैज्ञानिक ढंग से सोचा जाए तो किसी भी चीज का बायोलॉजिकल पार्ट पानी के साथ धरती के इतना नीचे नहीं जा सकता। ये ऊपर ही रह जाएगा। साथ ही वे यह भी स्वीकार करते हैं कि घग्गर प्रदूषित है और वे किसी तरह से बचाव नहीं कर रहे, लोगों को चाहिए कि नदी में से पानी निकाल कर सिंचाई के लिए प्रयोग न करें। डा.चरणजीत कहते हैं कि संभव है कि किसी एक या दो नलकूप के पास पानी जमा होता होगा और रिसता होगा। इसके आसपास किसी कैप्टी से संबंध नहीं हो सकता। नदी के प्रदूषण पर किसी तरह के सर्वे पर वे कहते हैं कि हाल ही में ऐसा कोई सर्वे नहीं किया गया है।

Friday, 2 March 2012

पंजाबी तड़के के बिना अधूरी टीम इंडिया!, cricket, punjabi , sidhuism,


हरभजन-युवराज के बाहर होते ही अर्श से फर्श पर
घर में बब्बर शेर इस टीम में एडाप्टेबिलीटी की कमी: नवजोत सिद्धू

भूपेश चट्ठा, पटियाला
जिस तरह से देश को खाद्य सुरक्षा प्रति पंजाब ने आत्म निर्भर बनाया और देश की सीमाएं पंजाब के योगदान के बिना अधूरी है, ठीक वैसे ही पंजाबियों को माइनस करते ही देश का क्रिकेट असुरक्षित हो गया है। पंजाबी तड़के बिना खेल रही टीम इंडिया की हालत हरभजन-युवराज के बाहर होते ही पतली हो गई है।
इसे आप इत्तेफाक कहें या कुछ और लेकिन ये सही है कि वल्र्ड कप के हीरो आल राउंडर युवराज सिंह और टर्बनेटर हरभजन सिंह के बाहर जाने के कारण चाहे जो भी रहे हों लेकिन इनके बाहर होते ही टीम इंडिया अर्श से फर्श पर आ गई है। दिलचस्प सी चर्चा में अब यह भी कहा जाने लगा है कि थोड़ी बहुत लाज अगर बचाई है तो वो दिल्ली के रहने वाले और प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह की तरह 'पंजाबी कोहलीÓ ही हैं। जिनके दम पर वापसी करने का प्रयास हो रहा है।
युवराज की बीमारी कब ठीक होगी? कब हरभजन की वापसी होगी? कब दोनों की फार्म में वापसी के साथ इंडिया कैप मिलेगी? यह सवाल अलग है पर दोनों की परफार्मेंस लाजवाब रही है। हरभजन जहां कई बार मैच विनर साबित हुए हैं तो एक ही ओवर में टी-20 में छह छक्के लगाने वाले युवराज वल्र्ड कप में चार बार मैन आफ द मैच और मैन आफ द टूर्नामेंट रहे हैं।
दूसरी ओर इसी संबंध में पूर्व टेस्ट क्रिकेटर, कामेटेटर व सांसद नवजोत सिंह सिद्धू ने 'दैनिक जागरणÓ से विशेष बातचीत में खुलासा किया कि भारत की टीम में एडाप्टेब्लिटी की कमी है, टीम परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढ़ाल नही पा रही है या फिर परिस्थितियों को अपने पक्ष में नहीं कर पा रही है। यह टीम घर में बब्बर शेर है... घर में होती है तो सब पर भारी... घर के बाहर निकलते ही...Ó।
भारत की टीम में 'पंजाबी तड़केÓकी कमी के चलते 'परफार्मेंसÓ ना देने अथवा  'आउट परफार्मÓ ना कर पाने पर वे खुल कर हंसते हैं और साथ ही देश प्रेम के जच्बे से भर कहते हैं कि 'यह बात सिद्धू के मुंह से अच्छी नहीं लगेगीÓ। साथ ही सिद्धूजिम के अंदाज में कहते हैं 'छोटे बीर लिखना ही है तो ये लिख...कि हमारी टीम मगरमच्छ के जैसी शक्तिशाली है...पानी में होती है तो सौ शेरों पर भी भारी पड़ती है...पानी के बाहर आते ही मगरमच्छ की पूंछ... भी खींच लेते हैं... हमारी हालत अब पानी के बाहर आए मरमच्छ जैसी है जिसकी पूंछ...Ó।