Thursday, 27 December 2012
पंजाब से छोटा किसान हुआ गायब
-बहुराष्ट्रीय कंपनियों की निगाहें बड़े ट्रेक्टर, उपकरण व प्रोसेसिंग सिस्टम बेचने पर लगी
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब में कृषि योग्य जमीन का रकबा चाहे कम हो रहा है और कंकरीट के जंगल भी बस रहे हैं लेकिन राज्य में बड़े किसानों की संख्या बढ़ रही वहीं छोटा किसान तेजी से गायब हो रहा है। किसानों की जनगणना पर जुटाए गए व संग्रहित किए जा रहे आंकड़ों में देश के रूझान के विपरीत जानकारी सामने आ रही है।
दिलचस्प है कि देश भर में जहां छोटे किसानों की गिनती बढ़ रही है। कृषि विभाग के सांख्यकि विभाग से जुड़े अधिकारी बताते हैं कि इससे पहले पंजाब में परिवारों के टूटने के पांच एकड़ तक के किसानों की संख्या लगातार बढ़ती रही है। पर अब बड़े खेत बढ़ रहे हैं और स्वभाविक है कि कई दशकों के बाद बड़े जागीरदार भी एक बार फिर से समाज में फलने फूलने लगे हैं।
जनगणना के आंकड़े औपचारिक रूप से अगले साल मार्च-अप्रैल तक ही प्रकाशित होंगे लेकिन आरंभिक संग्रह करने वाले अधिकारी बताते हैं कि पंजाब में छोटा किसान जहां ठेके पर जमीन दे कर खुद खेती से किनारा कर रहा है। ऐसे लीज पर जमीन देने वाले छोटे व मध्यम किसानों की संख्या एक लाख 30 हजार पर आ गई है। जबकि ऐसे ही जमीन बेच देने वालों का आंकड़ा भी 72 हजार है जो अब जमींदार नहीं रहे।
वर्ष 2010-11 की कृषि जनगणना के आने वाले परिणाम जहां बड़े किसानों की संख्या के मामले में चौंकाने जा रहे हैं वहीं उत्पादन के मामले में भी कम आश्चर्यजनक नहीं होंगे। पंजाब की तुलना में गेहूं उत्पादन अन्य राज्यों में बढ़ रहा है जबकि यहां पर लगभग स्थिर है। दस साल पहले मध्यप्रदेश में गेहूं उत्पादन जहां 57 हजार टन था वहीं अब 80 लाख टन है।
वहीं मक्की उत्पादन पर जोर देते मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल बताते हैं कि अभी तो सारा धान व गेहंू सरकारी खरीद एजेंसियां खरीद रही हैं, लेकिन तब क्या होगा जब यह आपूर्ति अन्य राज्यों से होने लगेगी। सारा सिस्टम निजीकरण की ओर बढ़ रहा है। इसके लिए अभी से जागने की जरूरत है। केंद्र हमारी मक्की नहीं खरीद रहा पर बाजार में बिक रही है, धान का यही एकमात्र सही विकल्प है। वे कहते हैं कि पंजाबियों को अब एक बार चावल खाना कम कर मक्की की रोटी को तवज्जो देनी होगी।
वहीं सोशल साइंसेज एंड हैल्थ फोरम के डा. पीपी खोसला कहते हैं कि ये किसान कहीं गायब नहीं हो रहे ये लो अब खेत मजदूर व दिहाड़ीदार हो गए हैं। कर्ज में डूबे किसानों की जमीनें बिक रही हैं। पंजाब के किसान की हालत ठीक वैसी ही हो गई है जैसी देश की सीमा पर लड़ते हुए सिपाही की जो घायल हो गया है। देश का पेट भरने किसान ने अकाल, बाढ़, आतंकवाद जैसे हर हालात में फसल को पाला, हरित क्रांति ने किसानी का लागत मूल्य बढ़ा दिया और खर्चे किसान ने खुद बढ़ा लिए। ऐसे में अब देश की जिम्मेदारी बनती है कि घायल हुए किसान व कृषि का इलाज करे। जबकि बड़े किसानों का फायदा केवल बहुराष्ट्रीय कंपनियों को होगा जिनकी निगाहें बड़े ट्रेक्टर, उपकरण व प्रोसेसिंग सिस्टम बेचने पर लगी हैं।
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कृषि जनगणना वर्ष 2010-11
-पंजाब में बड़े किसानों की संख्या बढ़कर 10.28 लाख
-मध्यम किसानों की संख्या घटकर 1.01 लाख रह गई
-20 एकड़ से ज्यादा भूमि वाले किसानों की संख्या 2.79 लाख से ज्यादा
-तीन से चार एकड़ जमीन वाले किसानों की संख्या 3.43 लाख
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2000-01 में 65 फीसद थे छोटे किसान
वर्ष 2000-01 में हुई जनगणना का हवाला दे पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला के अर्थशास्त्र विभाग के प्रो. रणजीत सिंह घुम्मन की ओर से किए गए शोध में सामने आया है कि दस साल पहले पंजाब में किसानों की कुल संख्या 18.44 लाख थी, इसमें से पांच एकड़ से कम भूमि वाले छोटे किसान 32 फीसद और पांच से दस एकड़ भूमि वाले मध्यम किसानों का हिस्सा कुल आबादी का 33 फीसद था। शेष बड़े किसानों थे।
Friday, 21 December 2012
अब महिला शिक्षकों से छेड़छाड़ रोकने गाइड लाइन
-आईपीसी में दंड के क्या प्रावधान हैं, सर्कुलर में यह भी बताया गया
-दूर दराज के क्षेत्र में तैनाती से बचा जाए, एक स्थान पर सिंगल महिला की तैनाती ना हो, एक पुरुष कर्मी के साथ अकेली महिला कर्मी की डयूटी ना लगाई जाए
-10 निर्देशों में पंचायत सदस्यों, अधिकारियों और खुद महिलाओं से कहा गया क्या करें? और क्या ना करें?
भूपेश चट्ठा, पटियाला
स्कूल कालेजों में छात्राओं से बढ़ रही छेड़छाड़, दुव्र्यवहार यहां तक की दुष्कर्म की बढ़ रही घटनाओं के बाद अब महिला शिक्षकों के साथ ऐसी किसी दुर्घटना होने से पहले ही रोकने प्रदेश के डायरेक्टर जनरल आफ स्कूल एजूकेशन ने एहतियातन गाइड लाइन जारी कर दिए हैं।
इतना ही नहीं जारी किए गए दिशा निर्देशों में यह भी बताया गया कि कि भारतीय दंड संहिता के तहत महिलाओं के साथ किस प्रकार का दुव्र्यवहार करने पर आईपीसी में दंड के क्या प्रावधान हैं। कितनी सजा है? अथवा कितना जुर्माना हो सकता है? सर्कुलर में इसका भी विस्तृत ब्यौरा दिया गया है।
जारी किए गाइड लाइन में माना गया है कि महिला शिक्षकों को कई बार दूर दराज के क्षेत्रों में डयूटी पर जाना पड़ता है और कई स्थानों पर अकेले तैनाती के दौरान छेड़छाड़ अथवा मानसिक परेशानी से दो चार होना पड़ता है। ऐसी घटनाओं को सभ्य समाज के लिए कलंक बताते हुए इनसे सख्ती से निपटने को कहा गया है। शिकायत के लिए जहां डीजीएसई ने अपना ईमेल लिखा है वहीं मामला गंभीर होने की स्थिति सीधे फोन पर भी कहा जा सकता है। हालांकि महिलाओं की सुरक्षा की जिम्मेवारी समूचे समाज व सरकार की बताई गई है।
कहा गया है कि दूर दराज के क्षेत्र में महिला शिक्षक की तैनाती से बचा जाए, यहां पर पहल के आधार पर पुरुषों की तैनाती हो। जहां कहीं एक स्थान पर सिंगल महिला की तैनात हो, विशेष रूप से प्राइमरी स्कूलों में सुनिश्चित किया जाए कि आंगनवाड़ी सेंटर भी इन्हीं परिसर में काम करते हों। अगर ऐसा नहीं है तो पंचायतों से प्रार्थना है कि वो इन केंद्रों को शिफ्ट करवाएं।
महिला शिक्षकों को छुट्टी के बाद या देर सवेर रिपोर्ट लेने अथवा देने के लिए कार्यालय में ना बुलाया जाए। निर्देश में कहा गया है कि 'कई बार एक पुरुष कर्मी के साथ एक अकेली महिला कर्मी की डयूटी लगाने छेड़छाड़ की घटनाएं बढऩे के अवसर बढ़ जाते हैं।Ó यहां तक कि एक अकेली महिला शिक्षक को किसी भी स्कूल में तैनात ना किया जाए। कम से कम दो महिला शिक्षकों की एक स्कूल में नियुक्ति संबंधी निर्देशित किया गया है।
10 निर्देशों में से छठे में कहा है कि 'कई बार स्कूल प्रबंधन कमेटी, पंचायत सदस्य, स्कूल में आकर अथवा छुट्टी के समय गांव के नौजवान टिप्पणियां करते है।Ó इस मामले में ब्लाक प्राइमरी शिक्षा अधिकारी समय समय पर जांच करें। जबकि ब्लाक रिसोर्स पर्सन व डिस्ट्रिक्ट रिसोर्स पर्सन के बारे में कहा है कि 'ये लोग भी कई बार स्कूल में आकर विजिटिंग रजिस्टर पर हस्ताक्षर नहीं करते...इससे स्पष्ट समझा जाए कि बुरी नीयत से आया हैÓ।
अधिकारियों और खुद महिलाओं को ताकीद की गई है कि क्या करें? और क्या ना करें? इसके साथ ही शिकायत को तुरंत संबंधित इंस्पेक्शन टीम के समक्ष की जाए। ऐसा ना करने का मतलब असमाजिक तत्वों को शह देना होता है। इस जांच करने बनाई जाने वाली पांच सदस्यों की सैक्सुअल हरासमेंट कमेटी में तीन महिलाओं का होना भी जरूरी कर दिया गया है। जबकि पुलिस कार्रवाई करवाने की जिम्मेदारी बीपीईओ अथवा डीईओ की तय की गई है।
महिलाओं के खिलाफ जुर्म करने पर भारतीय दंड संहिता में सजा के प्रावधान
धारा 354 किसी महिला से जोर जबरदस्ती करना, छेड़छाड़ करना, परेशान करना तो दो साल की कैद या जुर्माना अथवा दोनों हो सकती हैं।
धारा 376 बलात्कार - किसी महिला से उसकी सहमति के बिना शारीरिक संबंध बनाने पर सात साल की कैद एवं जुर्माना हो सकता है।
धारा 376 (2बी) सरकारी कर्मचारी होते हुए अपनी स्थिति का गलत फायदा उठाते हुए किसी महिला से बिना सहमति शारीरिक संबंध बनाने पर दस साल की कैद एवं जुर्माने का प्रावधान।
धारा 493 किसी महिला को धोखे से यह यकीन दिलाकर कि अब वह उसकी पत्नी है, शारीरिक संबंध बनाने पर दस साल की कैद एवं जुर्माना अथवा दोनों सजाएं हो सकती हैं।
धारा 509 ऐसा कुछ कहना, इशारा करना जिससे महिला की लज्जा का अनादर हो तो एक साल की कैद या जुर्माना या दोनों सजाओं का प्रावधान।
लोक सभा चुनाव: कैप्टन कंवलजीत की बेटी कांग्रेस में होंगी!
-विदेश राज्य मंत्री परनीत कौर के प्रयास तेज मुलाकात की
-मनप्रीत डौली ने भी किया दिल खोलकर स्वागत
-डेरा बस्सी में परनीत समर्थक दीपेंद्र सिंह ढिल्लों के अकाली हो जाने के बाद राजनीतिक संतुलन की जुगत
भूपेश चट्ठा, पटियाला
शिरोमणि अकाली दल का दिमाग कहे जाने वाले तेज तर्रार नेता स्व. कैप्टन कंवलजीत सिंह की बेटी मनप्रीत डौली जल्द ही कांग्रेस का हाथ थामने जा रही हैं विदेश राज्य मंत्री परनीत कौर के प्रयास जिस तरह से चल रहे हैं उनसे तय है कि अगले लोक सभा चुनाव से पहले अपने संसदीय चुनाव क्षेत्र अधीन आते डेराबस्सी, बनूड़ व कुछ हद तक राजपुरा में राजनीतिक संतुलन बनाने जा रही है।
डेराबससी से परनीत कौर के करीबी और खासा जनाधार रखने वाले दीपेंद्र सिंह ढिल्लों के इसी साल जुलाई में अकाली हो जाने के बाद से कांग्रेस इस क्षेत्र के बागी अकालियों पर डोरे डालने की कोशिश में लगी है। विदेश राज्य मंत्री परनीत कौर के इसी प्रयास का खुलासा डेरा बस्सी के निकट अमलाला गांव में घग्गर नदी पर बनने वाले पुल के लिए आयोजित किए गए कार्यक्रम में हुआ है। घड़ाम के बाबा बुल्ले शाह की ओर से रखे गए कार्यक्रम मनप्रीत कौर डौली व विदेश राज्य मंत्री के खासी करीब रही । नजदीकियां बढऩे के सिलसिले में जहां परनीत कौर की और से शुरुआत की गई बताई जा रही है वहीं मनप्रीत डौली ने भी इस प्रयास का दिल खोलकर स्वागत किया है। कार्यक्रम स्थल तक मनप्रीत कौर को कभी स्व. कैप्टन कंवलजीत के बेहद करीबी गुरकीरत सिंह थूही लेकर गए। याद रहे कि स्व. कैप्टल कंवलजीत की मौत के तुरंत बाद थूही ने अकाली दल छोड़ कांग्र्रेस का दामन थाम लिया था।
पटियाला संसदीय क्षेत्र में आता अमलाला गांव यों तो मोहाली जिले में आता है लेकिन इस पुल के बनने से पटियाला जिले के बनूड़ व स्व. कैप्टन कंवलजीत की कर्म भूमि बनूड़ से सीधा संपर्क हो जाएगा। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि मनप्रीत डौली भी घग्गर के इसी पुल से कांग्रेस में जाने का सफर लगभग पूरा कर चुकी हैं और अब परनीत कौर का 'आफरÓ ठुकराने की स्थिति में नहीं है। हालांकि मनप्रीत कौर कहती हैं कि उन्होंने अपना राजनीतिक भविष्य अभी तय नहीं किया है वे तो बाबा बुल्ले शाह की ओर से रखे गए कार्यक्रम में बुलाने पर भाग लेने आई हैं। वहीं परनीत कौर को उन्होंने बेहद अच्छी महिला बताया और कहा कि दोनों परिवारों में अच्छे रिश्ते रहे हैं। जबकि मंच से वे यह भी कहती हैं कि स्व. कैप्टन कंवलजीत की मृत्यु के बाद से उनके साथ सारा डेरा बस्सी ही अनाथ हो गया है।
डेरा बस्सी में परनीत समर्थक दीपेंद्र सिंह ढिल्लों के अकाली हो जाने के बाद इस विधान सभा क्षेत्र में राजनीतिक संतुलन की जुगत में कांग्रेस का निशाना भी सटीक है। अकाली दल से इसी साल टिकट ना मिलने की स्थिति में मनप्रीत कौर डौली ने अकाली दल छोड़ कर निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ा था। इसी प्रकार दीपेंद्र ढिल्लों ने कांग्रेेस का टिकट ना मिलने पर निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ा। जीते तो दोनों में से कोई नहीं पर वोट व समर्थन खासा जुटा गए।
पंजाबी पानी के बाद मिट्ïटी भी हुई बेदम!
-मिट्टी को कौनसी चाहिए टॉनिक? बताएगा कृषि विभाग
-किसान का नुकसान कम करने फसलें भी सुझाई जाएंगी और कुछ से दूर रहने को भी कहा जाएगा: विशेषज्ञ
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पांच पानियों की धरती पंजाब का पानी गड़बड़ हुआ तो पहले शहरों के घरों में फिल्टर लगे और अब गांवों में पीने का साफ पानी उपलब्ध करवाने पंचायतों में आरओ लग रहे हैं। आलम ये है कि देश के अन्न भंडार में दो तिहाई तक हिस्सा डालने वाले पंजाब की मिट्टी भी बेदम हो गई है। यूरिया, फास्फेट जैसे हरित क्राति के ताकतवर तत्व अब बेमानी हो गए हैं। ऐसे में कृषि विभाग आने वाले दिनों में इससे एक कदम आगे की मिट्टी की टॉनिक सुझाने जा रहा है।
विभागीय अधिकारियों अनुसार अभी तक कृषि विभाग मिट्टी का परीक्षण केवल तीन तत्वों का ही करता था अब इसे माइक्रो न्यूट्रीएंट्स स्तर पर ले जाया जाएगा। नाइट्रोजन, फास्फोरस, केलशियम व जैविक तत्वों की मात्रा ही जांची जाती थी अब बदले हालात में मैग्नीज, जिंक, आयरन व गंधक की जांच की जाएगी।
डिप्टी डायरेक्टर बीज रह चुके मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल बताते हैं कि खेती जिस स्तर पर पहुंच गई है वहां से इसे लाभदायक बनाने के लिए या तो हमे शोध कर लागत कम करनी होगी या फिर उपज के उत्पादन के स्तर को बनाया रखना होगा। इसके लिए जिन तत्वों की कमी है केवल उन्हें ही खेत में डालने की सिफारिश की जाएगी। यह मिट्टी की जांच के दौरान ही पता चल जाएगा। इसके लिए फसल पर एक तत्व विशेष की कमी का असर देखे जाने तक का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। इसी के आधार पर किसान को सुझाया जाएगा कि कौनसी फसल की बिजाई करे अथवा किस फसल से बिलकुल दूर रहें। संभव है कि मिट्टी के परीक्षण के बाद किसान को कुछ नुकसान करने वाली फसलें हमेशा के लिए छोडऩी पड़ें।
डा. सोहल कहते हैं कि अभी तक कई किसानों ने सिर्फ एक दूसरे से सुन कर ही यूरिया खेत में डाल लिया, इसने खेत के जिंक तत्वों को खासा नुकसान पहुंचाया है। जहां जरूरत नहीं थी वहां भी प्रयोग करने से पहले किसान ने यूरिया पर पैसे खर्चे और अब जिंक पर करेगा। ऐसे ही हम एक तय माप अनुसार रसायनिक खादों का प्रयोग करते जाते हैं, जिसका प्रभाव हम 15 दिनों अथवा कई बार तो एक महीने बाद फसल पर बीमारी के रूप में या फिर पौधे की ग्रोथ के रूप में देखते हैं, जबकि पहले माइक्रो न्यूट्रीएंटस की जांच करने पर हमे इस तरह के मंहगे व रिस्की तर्जुबे नहीं करने पड़ेंगे।
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बदलती है टॉनिक की मात्रा, पर होता है विपरीत प्रयोग
कृषि विशेषज्ञ बताते हैं कि जहां मिट्टी में ज्यादा नमी है वहां नहरी पानी की तुलना में खाद का प्रयोग मात्र दो तिहाई हिस्सा ही करना होता है जबकि रेतली जमीन पर ये एक तिहाई रह जाता है। जबकि किसान रेतली जमीन में ज्यादा खाद डाल कर अधिक उपज लेने का प्रयास करता है। इसी प्रकार अगर गेहूं को सिफारिश की गई फास्फोरस वाली खाद डाली गई हो तो उन खेतों में धान, कपास, मक्की, मूंगफली आदि के लिए इस खाद की जरूरत नहीं होती लेकिन ऐसी स्थिति में अगर टेस्ट में नाइट्रोजन की मात्रा ज्यादा आ जाए तो इसका प्रयोग करना पड़ता है।
Saturday, 15 December 2012
Thursday, 13 December 2012
कमजोर मानसून: पर धान की उपज सात फीसद ज्यादा
-धान का सीजन समाप्त, लिफ्टिंग मुकम्मल
-आपात स्थितियों में उत्पादन बढ़ता है: कृषि विशेषज्ञ
-उत्पादन की तुलना में किसान का खर्च ज्यादा बढ़ा: किसान
भूपेश चट्ठा, पटियाला
मानसून के दिनों में प्री मानसून के नाम पर जून में एक भी बारिश नहीं सर्वाधिक जरूरत व जोरदार मानसून वाले जुलाई महीने में हुई तीन से चार बारिश और कुल मिला कर कमजोर कहे जाने वाले मानसून के बावजूद धान की उपज बढ़ गई है। कम से कम पटियाला जिले में पिछले साल की तुलना में धान का उत्पादन बढ़ा है।
मंडियों में आए धान के आंकड़े बताते हैं कि पिछले साल के शानदार मानसून के खरीफ सीजन की तुलना में इस साल धान की उपज सात फीसद ज्यादा रही है। यही आंकड़े एक और दिलचस्प तथ्य उजागर कर रहे हैं। जिसके अनुसार देरी से बिजाई की जाने वाली बासमती किस्मों के उत्पादन को शामिल किया जाए तो कुल बढ़ोतरी दो फीसद ही रह जाती है। यानी बासमती अथवा इसके समतुल्य किस्मों का उत्पादन कम हुआ है।
जिले की 107 मंडियों में पिछले साल जहां 11 लाख 68 हजार 915 टन धान की आवक हुई थी वहीं इस साल इन्हीं पीआर किस्मों की आवक 12 लाख 51 हजार 666 टन धान आया है। जो पिछले साल से सात फीसद ज्यादा है। इसी प्रकार मंडियों में बासमती सहित आए कुल धान की आवक जहां पिछले साल 13 लाख 14 हजार टन रही थी वहीं इस साल ये बढ़कर 13 लाख 41 हजार 260 टन पर आ गई है।
मंडी बोर्ड के अधिकारी बताते हैं कि धान का सीजन अब लगभग समाप्त हो चुका है और मंडियों में से धान की लिफ्टिंग भी मुकम्मल हो चुकी है। संभव है कि एक, दो ट्राली आ जाए पर उम्मीद अब नहीं है।
दूसरी ओर कमजोर मानसून के बावजूद उत्पादन बढऩे के सवाल पर कृषि विशेषज्ञ डा. एएस मान कहते हैं कि आपात स्थितियों में उत्पादन बढ़ता है। पौधों का व्यवहार भी इंसान या अन्य जीवों की तरह होता है। जो खुद को खतरे में पाकर आबादी बढ़ाने लगते हैं। यह लंबे युद्ध अथवा अकाल जैसी परिस्थितियों में देखा गया है। कृषि विशेषज्ञ कहते हैं कि पौधे के लिए मौसम उसके पक्ष में होने अथवा बारिश ठीक ठाक होने की स्थिति में वो फलता फूलता ज्यादा है। वेजीनेशन का आनंद लेने लग जाता है। उसकी लंबाई ज्यादा बढ़ती है पर बल्लियों में बीज पैदा नहीं होता। इस साल भी कुछ हालात ऐसे ही बने कि पौधे ज्यादा नहीं पनपे पर दाने ज्यादा बने हैं।
वहीं भारतीय किसान यूनियन के हरभजन सिंह कहते हैं कि सरकार उत्पादन बढऩे की बात तो करती है पर इसकी तुलना में किसान का खर्च ज्यादा बढ़ा है। उसका जिक्र नहीं करती। मौसम चाहे जैसा हो, सूखे की मार चाहे जितनी पड़े, किसान अपनी फसल को गहने बेच कर या उधारी लेकर पाल ही लेगा। ये भी उसके बच्चों के बारबर ही होती है। जिसे मरने नहीं दिया जा सकता, पर सूखे पर सरकार ने क्या किया?
Tuesday, 4 December 2012
कैसी विकलांग पेंशन? बैसाखी भी नहीं खरीदी सकते
-ढ़ाई सौ रूपये की मासिक पेंशन भी करवाती है तीन महीने का इंतजार
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भूपेश चट्ठा, पटियाला
हम धार्मिक इंसानों की बात सुनते हैं और कई बार उन्हें पूजने भी लग जाते हैं लेकिन हमसे दो कदम दूरी पर खड़े जरूरत मंद इंसान की मदद नहीं करते चाहे उसे कितनी भी इमरजेंसी क्यों ना हो। विकलांगता दिवस पर जिला पुर्नवासन केंद्र में आयोजित एक संगोष्ठी में केंद्र के प्रभारी डा. प्रितपाल सिंह सिद्धू की बातें पंजाब सरकार की ओर से विकलांगों को दी जाने वाली पेंशन पर पूरी तरह से सटीक बैठती है। करोड़ों रूपये की जमीन के मालिक से लेकर बड़े उद्योगपतियों को सरकारी अनुदान दिया जाता है। सरकारी नौकरों को भी कई तरह के सुविधा भत्ते दिए जाते हैं लेकिन विकलांगों को दी जाने वाली पेंशन से आप ढ़ंग की बैसाखी भी नहीं खरीद सकते। अगर आप लकड़ी की भारी भरकम बैसाखी से एल्यूमिनीयम की बैसाखी पर शिफ्ट करना चाहें तो आपको कम से कम दो महीने की पेंशन का इन्तजार करना पडेगा। सरकारी पेंशन ढ़ाई सौ रूपये है तो बैसाखी की कीमत साढ़े चार सौ रूपये।
यह बात सिर्फ एक टांग खराब होने वालों के लिए है। अगर आपके दोनों पांव नहीं है या पूरी तरह से दुरुस्त नहीं है और आप जमाने के साथ रेंग कर ही सही पर ट्राई साइकिल पर चलना चाहते हैं तो आपको वाली ट्राई साइकिल खरीदने के लिए आपको दो महीने की पेंशन एडवांस जमा करवानी पड़ेगी। इसके बाद 90 सब्सिडी वाली ट्राई साइकिल को अपने अनुसार दुरुस्त करवाने के लिए दो से तीन पेंशन लगानी पड़ेगी।
विकलांगता दिवस पर 'दैनिक जागरणÓ के इस प्रयास में सामने आया कि सरकार की ओर से दी जाने वाली पेंशन उन विकलांगों के लिए बेमानी है जिनके हाथ या पांव कट गए हैं और वे कृत्रिम अंग लगवाना चाहते हैं। यहां पर पेंशन तो वही रहती है पर आम आदमी के लिए सब्सिडी कम होकर 75 फिसद रह जाती है और दाम हजारों में चला जाता है। छह से आठ महीने की पेंशन खर्च करने के बाद प्राप्त होने वाले हाथ या पांव की उम्र अधिकारिक रूप से दो साल ही है और इसे तीन साल तक चलाया जा सकता है।
दिलचस्प है कि किसी भी उपकरण अथवा अंग के खराब होने की स्थिति में उसे बाजार भाव पर ही रिपेयर किया जाता है। अंगुली भी खराब हुई तो हाथ का दस्ताना पहले फाड़ा जाता है और फिर अंगुली के दाम डेढ़ पेंशन हैं तो दस्ताना दो पेंशन का है। इस पर भी यदि आप पुर्नवासन केंद्र के आसपास नहीं रहते हैं तो आपको रिक्शा से बस तक का किराया भी लगाना होगा।
ध्यान रहे कि इस दौरान आप अपनी विकलांगता की वजह से कहीं गिरें ना जिससे आपको चोट लगे और ना ही किसी तरह की बीमारी का शिकार हों अन्यथा आप एक बार फिर आम आदमी बन जाएंगे और पेंशन की जद से बाहर हो जाएंगे।
इन हालातों से एडीशनल डिवीजनल कमिश्नर अमृत पाल कौर को जब मौके पर ही अवगत करवाया जाता है तो कहती हैं कि वे सारी बातें सुन रही हैं और नोट भी कर रही हैं। सरकार के पास अधिक ग्रांट देने का प्रस्ताव भेजा जाएगा।
विकलांगता: इलाज से च्यादा रोकथाम जरूरी
-आटो रिक्शा के लगाए गए रिफलेक्टर
फोटो: 1, 2
उपमुख्य संवाददाता, पटियाला
जिला पुर्नवासन केंद्र में विश्व विकलांगता दिवस पर आयोजित किए गए सेमिनार में वक्ताओं ने जहां विकलांगता के इलाज से च्यादा उसकी रोकथाम को जरूरी बताया और कहा कि बहुत से ऐसे काम हैं जिनसे दुर्घटनाएं होने से पहले ही रोकी जा सकती हैं। एडीशनल डिप्टी कमिश्नर विकास अमृत कौर गिल, शहर के ट्रैफिक प्रभारी हरदीप सिंह बडंूगर, केंद्र के प्रभारी डा. प्रितपाल सिंह सिद्धू व पटियाला सोशल वेलफेयर एसोसिएशन के विजय कुमार गोयल ने कहा कि हम दो मिनट के लिए कहीं भी रुक जाते हैं तो ट्रैफिक जाम हो जाता है। इसी देरी को पूरा करने कई लोग रफ्तार बढ़ाते हैं और कई बार जानी नुकसान होता है।
वक्ताओं ने कहा कि सड़क पर सेंस के साथ नैतिक शिक्षा पढ़ाई जानी जरूरी है। इस अवसर पर आटो रिक्शाओं के पीछे रिफलेक्टर भी लगाए गए जिससे कम से कम धुंध के समय में सड़क पर दुर्घटना ना हो।
काम है नहीं, सरकारी कार्यालयों में मिलते धक्के
उपमुख्य संवाददाता, पटियाला
ईश्वर ने जो करना था वो कर दिया...जो सजा लगनी थी लग गई...लेकिन अब हम अपने मां-बाप पर ही पूरी तरह से निर्भर हैं। सरकार कुछ करती नहीं, इतना पढ़े नहीं कि नौकरी मिल जाए अब तो बस चलता है। जिला पुर्नवासन केंद्र में ट्राई साइकिल लेने आए विकलांगों के अनुभव लगभग एक जैसे ही रहे हैं। हालांकि समस्या एक जैसी होने पर ऐसा स्वभाविक भी है। समाज का उनके प्रति रवैया कम से कम उनकी नजरों में तो नकारात्मक ही है। हालांकि अपनी और से प्रशासन और सरकार को कोसने में भी कोई कसर नहीं छोड़ते। कई मायनों में ऐसा वाजिब भी लगता है।
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कर्मजीत सिंह कहते हैं कि वे आठवीं पास हैं और नौकरी मिल नहीं रही अब करें तो क्या? दो बार उन्हें बुलाया भी गया पर आगे धक्के ही मिले, बस चलता कर दिया। हालांकि कर्मजीत से जब कम शिक्षा की बात की जाती है तो वे सहमति भी प्रकट करते हैं। स्वीकार करते हैं कि च्यादा नहीं पढ़ पाए।
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कुलविंदर सिंह कहते हैं कि कम से कम सरकार उन्हें दी जाने वाली चीजों पर तो जुर्माने के रूप में टेक्स ना लगाए। सरकार बड़े जागीरदारों सरमाए दारों पर खर्च कर रही है और उनके लिए जरूरत की चीज भी नहीं दे पाती। ऐसी कैसी सरकार है। एक ट्राई साइकिल मिल रही है। इसे अपने मुताबिक तैयार करवाएंगे। इसमें भी खासा खर्च है।
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जबकि शहर के ही रहने वाले जगतार सिंह कहते हैं कि जो कर रहे हैं उनके मां-बाप कर रहे हैं। अब तो सारा कुछ बोझ सा लगने लगा है। रोटी और कपड़े का प्रबंध जैसे तैसे घर से किया जा रहा है पर बीमारी के हालात में सब कुछ ईश्वर पर निर्भर हो जाता है। काम कोई करने की स्थिति में नहीं है।
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ऐसे ही गुरप्रीत सिंह बताते हैं कि आज तक सिवाय धक्के खाने के कुछ नहीं मिला है। प्रशासन के अधिकारियों की ओर इशारा कर वे कहते हैं कि ये लोग भी अगर कुछ देते हैं तो तरसा कर।
विकलांगता के जारी हुए एक हजार सर्टिफिकेट
हमारे संवाददाता, पटियाला
सिविल सर्जन कार्यालय विकलांग होने पर मेडिकल जांच करने के बाद सर्टिफिकेट जारी करता है। सिविल सर्जन कार्यालय से मिली जानकारी के मुताबिक इस साल एक जनवरी से लेकर 3 दिसंबर तक सिविल सर्जन कार्यालय ने एक हजार सर्टिफिकेट जारी किए हैं, जबकि पिछले साल में सिविल सर्जन कार्यालय ने 2024 विकलांग लोगों को सर्टिफिकेट जारी किए थे। विकलांगों की ये वो संख्या है जो आधिकारिक रूप से हर साल बढ़ती जा रही है। जिन लोगों अथवा उनके परिजनों को सरकारी प्रक्रिया की जानकारी है।
बस में चढ़ नहीं पाते, पार्क में घुस नहीं सकते
फ्लैग: विकलांगों के लिए व्यवस्थागत बदहाली
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-डीसी ने माना समस्या है
भूपेश चट्ठा, पटियाला
केंद्र अथवा पंजाब की सरकारें अथवा जिले का प्रशासन विकलांगों को आम आदमी को मिल रही सुविधा देने में भी नाकाम रहा है। आलम ये है कि विकलांग व्यक्ति बस में चढ़ नहीं पाता क्योंकि बसें ऐसी नहीं बनी कि इनमें आसानी से चढ़ा जा सके और पार्कों के प्रवेश द्वार ऐसे नहीं कि इनमें व्हीलचेयर अथवा तिपहिया साइकिल के साथ घुसा जा सके।
विकलांगों की आबादी के आंकड़ों को लेकर चाहे विवाद हो लेकिन यह फिर भी पांच सात फीसद से कम नहीं है और वोटों के लिहाज से देखा जाए तो सरकारी दस्तावेजों में पटियाला जिले में ही विकलांगों की संख्या 40 हजार के पार है। हर साल सिविल सर्जन के कार्यालय में विकलांगता प्रमाण पत्र बनवाने वालों की संख्या में एक से दो हजार की बढ़ोतरी हो रही है। दिलचस्प है कि ये आंकड़ा वोटों का वो अंतर है जो कई विधान सभा सीटों में हार-जीत के एक-दो हजार वोटों के अंतर से कहीं ज्यादा है लेकिन इस वर्ग की सुनवाई कहीं नहीं हो रही।
विकलांगों के लिए व्यवस्थागत सुविधाओं पर 'दैनिक जागरणÓ की ओर से की गई पड़ताल में सामने आया है कि जिला मुख्यालय वाले शहर में पिछले एक-डेढ़ दशक में बने सरकारी भवनों में व्हीलचेयर लाने ले जाने को रैंप बने हैं। इनमें मिनी सचिवालय, निगम व पूडा कार्यालय की बनी इमारतें शामिल हैं। लेकिन इनमें कहीं भी स्थाई रूप से रखी गई व्हीलचेयर नहीं दिखाई देती।
सरकारी अथवा निजी क्षेत्र में चल रही बसें में प्रवेश के लिए द्वार के ही उपर नीचे कर सकने वाली डेक्कन बसों वाली तकनीक कहीं नहीं है। इतना ही नहीं जिले के सबसे बड़े व पीआरटीसी के मुख्यालय वाले शहर के बस स्टैंड में ही विकलांगों का बिना मदद के प्रवेश संभव नहीं है। पार्क में जाने के लिए घूमते जंगले के गेट लगे है। जहां से निकल पाना संभव नहीं है जबकि मुख्य गेट किसी वीआईपी के आने अथवा बड़े कार्यक्रम के अलावा नहीं खुलता है।
निजी क्षेत्र में हालात ज्यादा बुरे हैं। किसी बड़े शो रूम या मार्केट में आने जाने की आसान सुविधाएं नहीं है। इस पर हंस कर यह भी बताया जाता है कि जिसके पास माल खरीदने की क्षमता है, उसके लिए होम डिलीवरी भी है और शॉप को बाहर सड़क तक लाने की सुविधा है। इसके अलावा जो संभावित ग्राहक नहीं है, उसके लिए क्या करें?
वहीं डिप्टी कमिश्नर जीके सिंह से संपर्क करने पर वे स्वीकार करते हैं कि यह समस्या तो है और इस दिशा में काम किया भी जा रहा है। लेकिन समस्या के निराकरण पर भी उतना ही काम हो पाया है जितना अन्य पर।
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