Tuesday, 26 April 2011

earth day-3



केंद्र सरकार की नेशनल ए बीएंट एयर क्वालिटी मानीटरिंग एनएएयूएम के तहत और सेंट्रल पाल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के फंड से पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड राज्य में 20 स्थानों पर नियमित मानीटरिंग करता है।
इनमें से नौ आवासीय व कामर्शियल क्षेत्र है।
इनमें पटियाला फलोर मिल, पीपीसीबी बटाला, पीपीसीबी जालंधर, फायर ब्रिगेड पटियाला, पीपीसीबी विश्वकर्मा चौंक लुधियाना, पंजाब माल्टेक्स जालंधर, ए-वन प्लैटर अमृतसर, मिल्क प्लांट लुधियाना, एमसीटीडब्ल्यू 27 जालंधर

24 घंटे होने वाली मानिटरिंग की सीमा

सस्पेंडिड पार्टीक्यूलेट मैटेरियल एसपीएम -200 मेगा ग्राम प्रति घन मीटर
रेस्पीरेटरी एसपीएम-100 मेगा ग्राम प्रति घन मीटर
हालांकि वर्ष भर का राष्ट्रीय औसत एसपीएम का 140 व आरएसपीएम का 60 है।

आवासीय व कामर्शियल क्षेत्र-पीपीसीबी ने पाया कि लुधियाना के कुछ हिस्सों में सीमा से ये काफी ज्यादा और इसके बाद जालंधर व अमृतसर के नाम आते है।
राज्य में सल्फर डाई आक्साइड और नाईट्रोजन डाई आक्साइड की हवा में मात्र हवा में सभी  स्थानों पर सीमा के ही भीतर है।
इंडस्ट्रीयल क्षेत्र-एसपीएम व आरएसपीएम के मामले में मंडी गोबिंद गढ़ व लुधियाना के कुछ क्षेत्रों में सीमा से ज्यादा है। हालांकि गैसों के मामले में यहां भी  स्थिति ठीक है।

पराली पर धारा 144 तो इंडस्ट्री का कनेक्शन कट, earth day-2,environment, pollution,


-स्कूली बच्चों में लाई जागरुकता भी रंग लाने लगी
-तीन दशक पराली जलाने के बाद एक दशक पहले उठी आवाज से अब तबदीली आई
-नदियां आज भी प्रदूषित, स्थानीय निकाय पर असर नहीं
भूपेश चट्ठा, पटियाला
रावण में कौन सी रामलीला कमेटी ने कितने पटाखे भरे? दिवाली पर अमृतसर का आईटी चौंक च्यादा धुआं व शोर करता है या लुधियाना का घंटाघर क्षेत्र? शांत रहने वालों में पटियाला का राजेंद्रा अस्पताल अब भी पहले नंबर पर बना हुआ है या नहीं? सजलुज में मछलियों की कितनी प्रजातियां कहां तक बची हैं? या फिर घग्गर नदी कहां तक गंदे नाले में बदल चुकी है? जैसे अध्ययन पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड करता रहा है।
इक्का दुक्का नगर परिषदों को छोड़ शेष सभी नगर निगमों, परिषदों को सीवरेज का अनट्रीटेड पानी नदियों में डालने पर नोटिस करना दशकों से रूटीन काम रहा लेकिन पीपीसीबी की ओर से सबसे पहले बायो मेडिकल वेस्ट पर निजी व सरकारी अस्पतालों की खिंचाई कर कानून का क्रियान्वन करवाना पहली उपलब्धि कही जा सकती है।
लंबे समय तक कानून की कमी, कानून है तो क्रियांवन नहीं, यह लागू हो तो वोट बैंक की राजनीति इच्छा शक्ति को कमजोर कर देती है, जैसी बातों पर पीपीसीबी प्रवक्ता व पर्यावरण ईजी. चरणजीत सिंह कहते हैं कि बोर्ड की गतिविधियां पानी, हवा व जहरीला कचरा ठिकाने लगाने संबधी बने तीन अधिनियम लागू करने तक सीमित है। अब तक बड़ी व मध्यम दर्जे की इंडस्ट्री में वायु प्रदूषण नियंत्रण व जल शोधक यंत्र लग चुके है। नदियों में प्रदूषण की मानिटरिंग की जा रही है। बायो मेडिकल वेस्ट व जहरीला कचरा ठिकाने लगाने का काम नियमों अनुसार करने का कार्य लगभग सिरे चढ़ गया है।
ईजी. चरणजीत सिंह कहते हैं कि हवा, पानी और जहरीला कचरा बोड्र के ऐजेंडे में है। इस पर रैलियां निकालने से लेकर स्कूलों में प्रतिस्पर्धाएं करवाना और किसानों, साधारण जनमानस में जागरुकता कैंप लगाना प्रमुख कार्य हैं। अखबार, रेडियो व टीवी पर समय समय पर विज्ञापन जारी कर हर संभावित खतरे के बारे में बताया जाता है। इनका असर आप अपने घरों में देख सकते हैं। जमीन पर अथवा भूमिगत जल में किसी तरह का प्रदूषण बोर्ड के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।
   दिलचस्प है कि इतना सब कुछ होने के बाद भी राच्य में प्रदूषण ना तो बोर्ड के नियंत्रण में आया और ना ही सरकार के घग्गर नदी सिर्फ दस किलोमीटर रह गई शेष गंदा नाला, सतलुज में मछलियां नहीं रही, सतलुज एक्शन प्लान लागू नहीं हुआ, जालंधर को छोड़ किसी नगर निगम ने सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट नहीं लगाया। प्रदूषित पानी आज भी सीधा नदियों में डाला जाता है। शराब व गत्ता फैक्ट्रियों के पास से जब आम आदमी गुजरता है तो दुर्गंध से बुरा हाल होता है, साथ लग्रते नाले में भी तेजाब घुलता नजर आता है पर जब कभी रेड होती है तो सब कुछ ठीक ठाक पाया जाता है। अधिकारियों के जाने तक दुर्गंध बिलकुल नहीं आती। बमुश्किल 20 फीसदी क्षेत्र को छोड़ दें तो 20 लाख हैक्टेयर से अधिक इलाके में पराली बीते साल भी जली है। निगम के ही कर्मी आज भी सड़क किनारे कचरा जलाने से गुरेज नहीं करते।
हालांकि हाल के महीनों में बोर्ड की ओर से गोपनीय ढ़ंग से की गई छापामारी प्रबल इच्छा शक्ति का संकेत भी देती है पर लैदर व डाइंग इंडस्ट्री से कैसे निपटा जाता है यह अभी देखना होगा। अन्यथा पराली को धारा 144 लगा कर रोकना सत्ताधारी गठबंधन के बड़े दल और इंडस्ट्री का बिजली कनैक्शन काटना गठबंधन की छोटी पार्टी के लिए संभावित रूप से ठीक नहीं हो सकता।  

कहानी एक नदी की जो गंदा नाला हो गई earth day-1, river ghagger

 मालवा की लाइफ लाइन घग्गर नदी
-चंद साल पहले तक नदी से मछली पकडऩे के ठेके होते रहे, आज सिंचाई लायक भी नहीं पानी
-नदी के पानी से इंसान क्या जानवरों के खुर तक गलने लगे
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब के बंटवारे में झेलम और चेनाब अलग हुई तो दुख सहलाने को  मालवा व बांगर को अलग करने वाले घग्गर दरिया को याद कर कहा जाने लगा कि आज भी हमारे पास चार नदियां तो हैं लेकिन बंटवारे को एक शताब्दी भी ना बीती की सदियों से मालवा की लाइफ लाइन बनी घग्गर नदी गंदे नाले में कब बदल गई किसी को खबर नहीं हुई।
हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले के डकशई की 1927 मीटर की उंचाई के अपने उद्गम स्थल से मात्र 10 किलोमीटर आगे बढ़ते ही यह फैक्ट्रियों के प्रदूषित व स्थानीय निकाय के अनट्रीटेड सीवरेज से गंदे नाले में बदलना शुरू होती है। पंजाब में इसका स्वागत एसएएस नगर की सुखना चोअ के साथ आए मणीमाजरा, पंचकुला, जीरकपुर और अंबाला-चंडीगढ़ के सीवरेज भी आ मिलते हैं। पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से किए गए एक स्र्वे अनुसार यहां पुल पर बीओडी व सीओडी की मात्रा 132 व 240 एमजी और कैल्शियम व मैग्नीशियम 160 व 52 एमजी पर आ जाता है। जबकि इससे पहले नाईकेटा पेपर मिल मुबारकपुर से पहले लिए गए सैंपलों मे आर्गेनिक तत्वों में बीओडी, सीओडी की मात्रा क्रमश 4.2 व 10 माइक्रो ग्राम, जिंक 0.46एमजी, कैल्शियम 28 एमजी,व मैग्नीशियम 20 एमजी पाया गया।
चंडीगढ़ के ढ़कांसू नाले के इसमें मिलने के बाद जल जीवन 60 फीसदी से गिर कर 20 फीसदी रह जाता है। इस पानी में किसी भी तरह की मछली 96 घंटे में मर जाती है। स्पष्ट है कि अपनी शुरूआत से दस किलोमीटर पर सीवरेज में बदलना शुरू हुई घग्गर का पानी यहां तक आते आते तेजाबी हो चुका है।
राजस्व विभाग पंजाब के आंकड़े बताते हैं कि घग्गर नदी में पटियाला के समाना शहर से आगे गुरदयाल पुरा बीड़ तक में भी मछलियां पकडऩे के ठेके दिए जाते रहे हैं।
खन्नौरी व मूणक के सीवरेज, शराब फैक्ट्रियों, गन्ना मिलों के अपशिष्ट पदार्थों के मिलने के बाद पानी की हालत इस कदर बिगड़ जाती है कि इसके सींचे जल से पैदा हुई सब्जियों में शीशा, कैडमियम, क्रौमियम, लोहा तय सीमा से कहीं अधिक पाया गया। नदी के दोनो और 250 मीटर की सीमा में नलकूपों का पानी भी प्रदूषित हो चुका है, हालांकि धरती अभी बची हुई है।
बारिश के दिनों में इसके तेजाबीपन में 20 फीसदी की कमी आ जाती है। इन दिनों में कीड़े मकौड़ों के रूप में जीवन पलना शुरू होता है लेकिन इस सीजन के अलावा हरियाणा से आने वाले बुड्डा नाला के गांव सागरा के पास मिलने के बाद इसमें से जीवन सौ फीसदी समाप्त है।
पंजाब में इंसानों के तो क्या जानवरों के खुर तक गला देने वाला पानी राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में पीलीया फैलने, पशुओं में मुंह खुर की बिमारियों का कारण बनता है।

आबकारी अधिकारियों ने दिया 72 घंटे का अल्टीमेटम,excise, agitation, employee,

-ईटीओ रणजीत सिंह के खुदकुशी करने से  खफा अधिकारियों,
इंस्पेक्टरों, मिनीस्टरीयल स्टाफ और दर्जा चार ने दिया धरना
-कहा एफआईआर दर्ज कर, दोषी विजीलेंस अधिकारियों को निलंबित किया जाए
उप मुख्य  संवाददाता, पटियाला
राज्य के आबकारी एंव कराधान विभाग के अधिकारियों कर्मियों ने
आज विजीलेंस विभाग की कार्रवाईयों से नाराज पंजाब सरकार के
खिलाफ  अपना गुस्सा निकालते हुए एक्साइज कमिश्नर कार्यालय के बाहर
धरना लगा सरकार को 72 घंटे का अल्टीमेटम दे दिया है।
विभाग के एक एक्साइज एंड टेक्सेशन आफिसर रणजीत सिंह की कथित
रूप से रिश्वत लेते पकड़े जाने और बाद में जमानत पर रिहाई के बाद
मोहाली में उनके खुदकुशी कर लेने से गुस्साए अधिकारियों के
समर्थन में विभाग के इंस्पेक्टर व मिनीस्टरीयल स्टाफ और दर्जा चार
कर्मियों ने समर्थन जताते हुए धरने में भाग लिया है।
ईटीओ एसोसिएशन के प्रदेश प्रधान केएस धालीवाल ने कहा कि
सरकार यदि 72 घंटे के भीतर यदि ईटीओ रणजीत सिंह को मौत
को गले लगाने को मजबूर करने वाले विजीलेंस अधिकारियों के
 खिलाफ  एफआईआर दर्ज नहीं की जाती और दोषियों को निलंबित
नहीं किया जाता तो विभाग को पूरी तरह से ठप्प कर दिया जाएगा।
विभाग के रोजमर्रा के कामों के अलावा, कहीं  भी  जांच नहीं की
जाएगी और राज्य में सामान के प्रवेश पर होने वाली कर वसूली को
पूरी तरह से रोक दिया जाएगा।
ईटीओ एसोसिएशन के अलावा पूर्ण हड़ताल के आहवाहन में शामिल
होने का नारा एक्साइज इंस्पेक्टर एसोसिएशन व मिनीस्टरीयल स्टाफ और
दर्जा चार कर्मियों ने  भी  दिया है।
धरने को संबोधित करने वालों का कहना है कि रणजीत सिंह
विभाग के ईमानदार इंस्पेक्टर थे और जिस व्यक्ति से रिश्वत लेने के
मामले में उन्हें गिरफतार किया गया है उस व्यक्ति से पकड़े माल पर
दो लाख, 27 हजार रूपये कि पेनाल्टी लगाई गई थी और इसकी
बाकायदा रसीद काट कर माल को रिलीज करने के आर्डर भी  दिए जा
चुके थे लेकिन उक्त व्यक्ति ने ईटीओ को दो लाख  52 हजार रूपये
थमा दिए। तर्क दिया गया कि पैसे कम है या ज्यादा ये तो गिन कर ही
पता चलना था, ऐसे में ईटीओ को जानबूझ कर फंसाया गया है।
दिलचस्प है कि रिश्वत लेते पकड़वाने वाला व्यक्ति पहले भी  करीब दो
दर्जन बार पकड़ा जा चुका है और विभाग में 'पॉसर' के नाम से जाना
जाता है। इस घटना से करीब 15 दिन पहले इसी ईटीओ ने इसी व्यक्ति
को टेक्स चोरी में डेढ़ लाख  रूपये की पेनाल्टी ठोकी थी।

धरना वीवीआईपी स्टाइल में

राज्य सरकार के सबसे मलाईदार कहे जाने वाले आबकारी विभाग में लगे
वीवीआईपी स्टाइल के इस धरने को हालांकि बिना किसी पूर्व सूचना
के अचानक किए गए आहवान पर लगाया गया लेकिन इंतजाम पूरी तरह से
चाकचौबंद थे, प्रर्दशनकारियों के लिए धूप में छाया को टेंट,
गर्मी से राहत को पंखे ,आने पर चायपानी, और चारसौ लोगों के लंच
के लिए कैटरिंग की पूरी व्यवस्था की गई थी। शामियाना और सफेद
कवर लगी कुर्सियां कह रही थी कि धरना एक्साइज विभाग का है।

आयुक्तों ने भी  बनाई यूनियन

आमतौर पर कमिश्नर नाम जुडऩे के बाद संगठन की गतिविधियां हर
कोई कम कर लेता है पर ईटीओ रणजीत सिंह के खुदकुशी मामले
ने आबकारी विभाग के आला अधिकारियों में बदलाव ला दिया है।
विभाग के डिप्टी कमिश्नर व असिस्टेंट कमिश्नर स्तर के अधिकारियों
ने एसोसिएशन का गठन कर जसकरण सिंह बराड़ को प्रधान घोषित
कर दिया है। इस एसोसिएशन ने भी  आंदोलन को अपना समर्थन दे दिया
है।

एमएसपी नूं छड्ड, मनप्रीत दा की बनूं...farmer, MSP, politics, trends,


सर्दी  की उधारी चुकाते ही...जट्ट फिर यमला हुआ
-आज भी मंडी में किसान उपज फेंकने आ रहा है बेचने नहीं
-चुनावी खुमारी हावी हुई प्राकृतिक आपदा पर
भूपेश चट्ठा, पटियाला
'टिल्सबरी का आटा 22 रूपये आर्शीवाद लो तो 20...गली की चक्की से चावल का रूला मिला... भी 15 से कम नहीं पर गेहूं 1120 रूपये...50 का बोनस जोड़ भी बात नहीं बनती, सरकार किसान से धक्का करती ही है' सरहिंद रोड स्थित नई अनाज मंडी में जींस के साथ चैक शर्ट पहने आंख पर रै-बन के ग्लास और एक हाथ में स्क्रीन टच मोबाइल तो दूसरे में एसयूवी की चाबी घुमाता 'धरती पुत्र' का यह पुत्र केंद्र व राज्य सरकार की आधुनिक तर्कशील भाषा में कलई खोल रहा है। बता रहा है कि जिस एमएसपी को मिनिमम स्र्पोट प्राइस बता किसान के लिए फायदे का सौदा लीडर समझाते है दरअसल वो ही किसानी को व्यापार या इंडस्ट्री नहीं बनने देती और एमएसपी के पहले 'एम' का मतलब मैक्सीमम हो जाता है।
मंडी के शैड के पास काके दी रेहड़ी के पास चल रहे इस वार्तालाप में कुर्ता-पायजामाधारी ठाकुर सिंह भी अपना परना ठीक करता हुआ कूद जाता है। प्रोग्रेसिव 'काका किसान' के समान आज उसने भी ट्राली मंडी में खाली की है। आंखें थोड़ी लाल जरूर है पर चाय का गिलास उसने अभी अभी खाली किया है, हाथ में कुछ मल...मुंह साफ करता हुआ वो भी 'सथ दी बहस' में तीर सा सवाल दाग देता है, 'एमएसपी नूं छड्ïïड, मनप्रीत दा की बनूं...' और इसके साथ ही देश का अन्नदाता अपने आर्थिक मुद्दे छोड़ कर पूरी तरह से राजनीतिक विश्लेषण शुरू करने लगता है।
'काका किसान' के मोबाइल पर ब्रैन एडम्स की धुन बजती है स्क्रीन पर तस्वीर देखते ही चेहरा चमक उठता है, एक ओर वो स्वदेशी किसान को 'बाई जी, मनप्रीत दा वी हो जू...राजे दा वी, ते...ऐना बादलां दा वी...तुस्सी घर पौंचो'। साथ ही नसीहत दी जाती है कि जब तक आप लोग मंडी में कणक-जीरी सिट्दे रहोगे हालात नहीं बदलेंगे। अपनी उपज को बेचना सीखो।
इसी दौरान मोबाईल की तरफ फिर देखता है काल वेटिंग में देख 'सी यू ब्रदर का फोन है... बाय' अब काका किसान घर पर खड़ी लंडी जीप के लिए एलाय व्हील और टयूबलैस टायर  पर आ जाते है। जबकि ठाकुर सिंह के साथ उसका एक और जोड़ी दार आ जाता है। आगे से उठे कुर्ते पर हाथ मार गुरी कहता है, 'राशन  आ गया है, शामा पै गईयां ने, लीडरां दा तां ऐवें ही चल्लू अपनी संभाल'।
काके दी रेहड़ी पर सिर्फ किरदार बदलते है टापिक नहीं। चुनावी साल में खुमारी अभी से चढ़ गई है। प्रदेश में बहुसंख्यक लोगों किसान और आढ़ती दोनों के पास वर्ष में दो ही महीने काम होता है। एक राजनीति में लगा रहता है तो दूसरा गुनाह माफ करवाने तीर्थ पर जाया करता है।  सर्दी की उधारी उतारते ही किसान यमला हो जाता है, हालांकि अपने घर और पशुओं लायक गेहूं छोड़ सारी पहले ही दिन खा गया है। लेकिन सल्तनत बदलने और तख्त पर बैठने का जनून शायद हमेशा कायम रहे। संभवत यही वजह है कि प्राकृतिक आपदा पर इंश्योरेंस लेने की बजाए किस्मत से लडऩा ही उसे ठीक लगता है।

Wednesday, 13 April 2011

खाद की भी हो खेती तो तंदरुस्त रहे धरती organic, fertilizer, agriculture, trends, tradition,



-खेतों में उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए तैयार किया जा रहा नाइट्रोजन फिक्सेशन बैक्टीरिया
-हरी जैविक खाद पैदाकर मंहगी रसायनिक खादों से किनारा करने की ओर
भूपेश चट्ठा, पटियाला
  शताब्दियों के अपने अनुभव भरे ज्ञान को अमेरिकियों के पास चंद रसायनों के लिए बेचने वाला पंजाब का किसान अब एक बार फिर जैविक खेती की ओर लौटने लगा है। उपज कम न हो इसके लिए आधुनिक मशीनरी का प्रयोग तो किया जा रहा है, लेकिन रसायनों की खपत कम कर मिट्टी की उर्वरा शक्ति दुरूस्त करने को खेत मे हरी खाद उगाई जा रही है। ऐसे में खाद की भी हो खेती तो धरती का तंदरुस्त रहना तय है।

 हरित क्रांति आने से पहले भी पंजाब हरियाणा का किसान 'चीझणÓ अथवा 'ढांचाÓ नाम से ऐसे पौधों की बिजाई साल से एक बार किया करता था। मुख्य फसल की बिजाई अथवा रोपाई से पहले 28-30 दिनों के लिए इन पौधों के बीजों का छिड़काव खेतों मे कर दिया जाता है और मुख्य फसल उगाने से पहले इन पौधों को खेत में बाहकर नष्ट कर दिया जाता है। पौधों के अवशेष मिट्टी मे मिलकर खाद का कार्य करते है।
घग्गर नदी की बेल्ट पर अब 60 दिनों तक पकने वाली धान की किस्म नही उगाए जाने के चलते किसान का ध्यान पानी व पर्यावरण बचाने की ओर लगा है। वहीं उपज में आ रहे ठहराव के चलते किसान अब लागत मूल्य कम कर मार्जन बढ़ाना चाहता है।

  धर्महेड़ी गांव के नंबरदार राजवंत सिंह बताते है कि 10-15 किलो बीज प्रति एकड़ में एक बार बहाई के बाद छिड़क दिया जाता है। पानी देकर फिर दो तीन दिन बाद पानी लगाया जाता है। फिर सप्ताह में एक दिन पानी लगाया जाता है। ऐसे ही 28-30 दिनों मे ढाई तीन फुट का चीझण का पौधा उग जाता है। खेतों मे अप्रैल से जून मध्य तक करने के लिए कुछ नही होता। ऐसे में मिट्टी की ताकत बढ़ाने वाले ये उपाय साल मे एक बार आराम से किये जा सकते है। जीरी रोपाई करने से पहले इन पौधों को बहा दिया जाता है फिर पानी लगा, कद्दू कर रोपाई हो जाती है। राजवंत सिंह अपना अनुभव बताते है कि 100 रूपये प्रति एकड़ से अधिक का खर्च इस कार्य में नही आता।

 वही गुरप्रीत सिंह कहते है कि हरी खाद की खेती के बाद डीएपी जैसी रसायनिक खाद के कम से कम डाले जाने वाले एक थैले के खर्च की बचत हो जाती है। जहां ढ़ाई तीन थैले यूरिया के डालने होते है वहीं यह दो थैले तक  सिमट जाता है। मिïट्टी को साल भर पूरी ताकत रहती है। हरी खाद की खेती से गेहूं की उपज भी अच्छी होती है। पर्यावरणविद् अमरदीप सिंह बताते है कि अब ट्रैक्टर आम होने से चीझण की बिजाई आसानी से हो सकती है। याद रहे कि चीझण की खेती के लिए गहराई पर ट्रैक्टर चलाना होता है। भारी साधन आज की कृषि मशीनरी में मौजूद है। ऐसे में इन जैविक तकनीकों का लाभ लेना चाहिये। इससे पर्यावरण को सुधारा जा सकता है। खर्च कम किया जा सकता है और फसल भी अच्छी होती है।

 कृषि विशेषज्ञ डा. बीएस सोहल बताते है कि सरकार भी हर जिले में चीझण के बीज मुफ्त बांटती है। पूर्व में धान की 60 दिनों में पकने वाली सट्ठी  किस्म न लगाने वाले किसानों को यह बीज दिए जाते थे अब सभी के लिए है। वे बताते है कि इस पौधे से मिïïट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। पानी की  पकड़ बढ़ाने की क्षमता भी बढ़ती है। इस के अलावा पौधे की जड़ मे बनी गांठें नाईट्रोजन फिक्सेशन बैक्टीरिया पैदा करती है। यह मिट््टी की ढांचा मजबूत कर देता है जिससे रसायनिक खाद की आवश्यक्ता काफी कम हो जाती है।

बाई पास दूसरी बार लेगा, जान सैंकड़ों पेड़ों की bye pass, environment, plants, trees, devlopment


-दक्षिणी बाईपास के चालू होने से पहले ही चौड़ा करने की योजना
-1998-99 में बाईपास के भूमि अधिग्रहण पर लगे सैंकड़ों पेड़ों पर लगने लगे लाल निशान
भूपेश चट्ठा, पटियाला
व्यक्ति कुंवारा रह जाए तो कोई तवज्जो नहीं देता, शादी के बाद औलाद ना हो तो भी इंसान सब्र कर लेता है, लेकिन जिसे 10-12 साल पाल पोस कर बड़ा किया हो यदि उसे ही कोई आंखों के सामने फांसी पर चढ़ा दे और यह भी पता हो कि दोबारा ओलाद होगी ही नहीं, तो बर्दाश्त की सीमा टेस्ट होनी तय होती है। 64 नंबर राष्ट्रीय राज मार्ग पर शहर के दक्षिणी बाई पास की भूमि अधिग्रहण के दौरान लगाए गए सैंकड़ों पेड़ अब बाईपास पर ट्रैफिक शुरू होने से पहले ही काट दिए जाएंगे। दिलचस्प है कि निर्माणाधीन बाईपास चालू होने से पहले ही दूसरी बार पेड़ों की जान ले रहा है।
दक्षिणी बाईपास के चालू होने से पहले ही चौड़ा करने की योजना के तहत दोनो ओर लगाए गए अर्जुन, जमौआ, सुखचैन आदि औरनामेंटल पेड़ विकास की बलि चढऩे जा रहे है। याद रहे कि 1998-99 में बाईपास के भूमि अधिग्रहण के तुरंत बाद जैसे ही प्रोजेक्ट पर काम शुरू हुआ सबसे पहले वन विभाग को दोनों किनारों पर पौधे लगा वन क्षेत्र विकसित करने को कहा गया। तकनीकि रूप से ज्यादा कार्बन डाई आक्साइड सोखने वाले प्लांट लगाए गए। आज ये 30 से 40 फिट ऊंचे हो चुके है।
वन विभाग के ही एक कर्मी इसे 'सरकारी निर्णयÓ बताते है और इसकी तुलना खुदकुशी करने से करते है कहते है कि अभी निर्धारित आयु पूरी नहीं हुई है ऐसे में इसके लिए नया क्षेत्र विकसित करने अलग से जमीन भी नहीं मिलने वाली वन विभाग को पेड़ काटने की सूचना दो महीने पहले तक नहीं थी। जिन पेड़ों की आने वाले दिनों में कटाइ्र होगी उनकी छाल काट कर करीब दो महीने पहले ही विभाग ने निशानदेही की है। अधिकारी कहते है कि वन के खाते में चढऩे अथवा जन्म प्रमाणपत्र बनने से पहले ही अब इनका मृत्यु प्रमाण पत्र बनने लगा है। जिन पेड़ों को काटा जाना है उन र अब लाल निशान लगेगा और इनकी मार्किंग कर इन्हें फौरेस्ट कारपोरेशन को सौंप दिया जाएगा।
उल्लेखनीय है कि  राज्य लोक निर्माण विभाग व राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधीकरण के सहयोग से जीरकपुर से पटियाला, संगरूर, बठिंडा होते हुए डबवाली तक बनने वाले फोर लेन के हाई-वे में पटियाला-जीरकपुर के हिस्से की अनुमानित लागत 495.70 करोड़ रूपये आंकी गई है। बार्डर रोड आर्गेनाइजेशन 19 किलोमीटर लंबे बाईपास का निर्माण लगभग पूरा कर चुका है।
वर्ष 2002 में इस सड़क को चौड़ा कर सात से 10 मीटर कर दिया गया लेकिन अब फोर लेन करने पर इसके दोनो लेन सवा आठ -सवा आठ मीटर के करने अलावा बीच में साढ़े चार मीटर की जगह छोड़ी जाएगी। ऐसे में 21.5 मीटर चौड़ी हो जाएगी ये सड़क। दो साल पहले पीडब्ल्यूडी ने केंद्र के साथ एमओयू भी साइन किया पर ये कागजों में ही सिमटा रहा। हालांकि पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड ने लंबा समय पहले ही बाईपास से 100 मीटर दूर तक बिजली कनेक्शन देने बंद कर दिए थे।