-स्कूली बच्चों में लाई जागरुकता भी रंग लाने लगी
-तीन दशक पराली जलाने के बाद एक दशक पहले उठी आवाज से अब तबदीली आई
-नदियां आज भी प्रदूषित, स्थानीय निकाय पर असर नहीं
भूपेश चट्ठा, पटियाला
रावण में कौन सी रामलीला कमेटी ने कितने पटाखे भरे? दिवाली पर अमृतसर का आईटी चौंक च्यादा धुआं व शोर करता है या लुधियाना का घंटाघर क्षेत्र? शांत रहने वालों में पटियाला का राजेंद्रा अस्पताल अब भी पहले नंबर पर बना हुआ है या नहीं? सजलुज में मछलियों की कितनी प्रजातियां कहां तक बची हैं? या फिर घग्गर नदी कहां तक गंदे नाले में बदल चुकी है? जैसे अध्ययन पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड करता रहा है।
इक्का दुक्का नगर परिषदों को छोड़ शेष सभी नगर निगमों, परिषदों को सीवरेज का अनट्रीटेड पानी नदियों में डालने पर नोटिस करना दशकों से रूटीन काम रहा लेकिन पीपीसीबी की ओर से सबसे पहले बायो मेडिकल वेस्ट पर निजी व सरकारी अस्पतालों की खिंचाई कर कानून का क्रियान्वन करवाना पहली उपलब्धि कही जा सकती है।
लंबे समय तक कानून की कमी, कानून है तो क्रियांवन नहीं, यह लागू हो तो वोट बैंक की राजनीति इच्छा शक्ति को कमजोर कर देती है, जैसी बातों पर पीपीसीबी प्रवक्ता व पर्यावरण ईजी. चरणजीत सिंह कहते हैं कि बोर्ड की गतिविधियां पानी, हवा व जहरीला कचरा ठिकाने लगाने संबधी बने तीन अधिनियम लागू करने तक सीमित है। अब तक बड़ी व मध्यम दर्जे की इंडस्ट्री में वायु प्रदूषण नियंत्रण व जल शोधक यंत्र लग चुके है। नदियों में प्रदूषण की मानिटरिंग की जा रही है। बायो मेडिकल वेस्ट व जहरीला कचरा ठिकाने लगाने का काम नियमों अनुसार करने का कार्य लगभग सिरे चढ़ गया है।
ईजी. चरणजीत सिंह कहते हैं कि हवा, पानी और जहरीला कचरा बोड्र के ऐजेंडे में है। इस पर रैलियां निकालने से लेकर स्कूलों में प्रतिस्पर्धाएं करवाना और किसानों, साधारण जनमानस में जागरुकता कैंप लगाना प्रमुख कार्य हैं। अखबार, रेडियो व टीवी पर समय समय पर विज्ञापन जारी कर हर संभावित खतरे के बारे में बताया जाता है। इनका असर आप अपने घरों में देख सकते हैं। जमीन पर अथवा भूमिगत जल में किसी तरह का प्रदूषण बोर्ड के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।
दिलचस्प है कि इतना सब कुछ होने के बाद भी राच्य में प्रदूषण ना तो बोर्ड के नियंत्रण में आया और ना ही सरकार के घग्गर नदी सिर्फ दस किलोमीटर रह गई शेष गंदा नाला, सतलुज में मछलियां नहीं रही, सतलुज एक्शन प्लान लागू नहीं हुआ, जालंधर को छोड़ किसी नगर निगम ने सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट नहीं लगाया। प्रदूषित पानी आज भी सीधा नदियों में डाला जाता है। शराब व गत्ता फैक्ट्रियों के पास से जब आम आदमी गुजरता है तो दुर्गंध से बुरा हाल होता है, साथ लग्रते नाले में भी तेजाब घुलता नजर आता है पर जब कभी रेड होती है तो सब कुछ ठीक ठाक पाया जाता है। अधिकारियों के जाने तक दुर्गंध बिलकुल नहीं आती। बमुश्किल 20 फीसदी क्षेत्र को छोड़ दें तो 20 लाख हैक्टेयर से अधिक इलाके में पराली बीते साल भी जली है। निगम के ही कर्मी आज भी सड़क किनारे कचरा जलाने से गुरेज नहीं करते।
हालांकि हाल के महीनों में बोर्ड की ओर से गोपनीय ढ़ंग से की गई छापामारी प्रबल इच्छा शक्ति का संकेत भी देती है पर लैदर व डाइंग इंडस्ट्री से कैसे निपटा जाता है यह अभी देखना होगा। अन्यथा पराली को धारा 144 लगा कर रोकना सत्ताधारी गठबंधन के बड़े दल और इंडस्ट्री का बिजली कनैक्शन काटना गठबंधन की छोटी पार्टी के लिए संभावित रूप से ठीक नहीं हो सकता।
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