Saturday, 2 July 2011

मौसम की मार, मिर्च हुई और लाल, weather, diversification, chili



नुकसान
बारिश से मिर्च के पौधों की जड़ें हुईं कमजोर गलने की आशंका 
 किसान नुकसान को लेकर चिंतित
भूपेश चट्ठा, पटियाला
धान की रोपाई करने वाला किसान चाहे बारिश का स्वागत करने को एक पैर पर खड़ा हो पर अब यही बारिश उसे रुलाने लगी है। साल में दो फसलों के चक्र से निकल कर सब्जियों से डायवर्सिफिकेशन करने वाले किसान अब मिर्च की फसल को लेकर परेशान हैं। दो दिनों से लगातार हुई बारिश और उससे पहले चली तेज हवाओं ने मिर्च के पौधों की जड़ें कमजोर कर दी हैं। वहीं इनके गलने के आसार भी बढ़ गए हैं। याद रहे कि मानसून की बारिश के साथ ही पहाड़ी व शिमला मिर्च गलकर गायब हो जाती है। वहीं साधारण मिर्च बारिश के पानी से और तीखी हो जाती है। नतीजा बाजार में इसकी मांग में गिरावट और दामों में भी कमी हो जाती है। मांग व सप्लाई के सिद्धांत को ठेंगा दिखाते हुए मिर्च के कारोबार पर सोशल साइंसेज एंड हेल्थ फोरम के डा. बलजीत सिंह कहते हैं कि बारिश के बाद न तो ये आचार के लायक रहती है और न इसे सुखाकर लाल ही किया जा सकता है। अलबत्ता इसे थोड़ी मात्रा में ही सही पर खाया जरूर जाना चाहिए। वहीं सन्नौर मंडी में आढ़त का काम करने वाले सुभाष बांगा कहते हैं कि यहां की आबो-हवा और मिट्टी की ही खासियत है कि मिर्च तीखी और बेर बहुत मीठा होता है। लोगों ने अपने यहां खानदानी बीज संजोकर रखे हैं, जो पीढि़यों से लगाए जा रहे हैं, हालांकि अब लोग सन्नौरी मिर्च को छोड़ हाइब्रिड किस्मों की ओर जा रहे हैं। दिखने में बेहद छोटी इस मिर्च का फल यदि फूल से निकलने के साथ ही नीचे यानी धरती की ओर मुड़ जाए तो यह गजब की कड़वी होती है। वहीं हार्टीकल्चर विभाग के डिप्टी डायरेक्टर रंधीर सिंह कहते हैं कि मिर्च की क्वालिटी ही उसके तीखेपन पर निर्भर करती है। बारिश से मिर्च का तीखा होना एक भ्रांति है, लेकिन यदि पौधे की जड़ों में पानी रुक जाए और इसकी निकासी समय रहते न हो तो नुकसान तय है। ऐसे में जड़ों का गलना शुरू हो जाता है। पटियाला में करीब एक हजार एकड़ क्षेत्र में इसकी बिजाई हो रही है। नाभा, भादसों व पातड़ां में इसके अधीन रकबा ज्यादा है। नाभा क्षेत्र में किसान प्लास्टिक शीट का प्रयोग कर अनचाही बारिश से इसका बचाव कर रहे हैं।

घग्गर को साफ कर रही मशीनें पंजाब ने वापस बुलाई, river ghagger, drainage, punjab,


उप मुख्य संवाददाता, पटियाला :
मानसून के दिनों में कहर बरपाने वाली बरसाती नदी घग्गर में साफ सफाई का काम कर रही पंजाब की मशीनें जहां पहले हरियाणा ने उठवा दी थी वहीं आज शेष बची मशीनरी को पंजाब ने वापस बुला लिया है। पंजाब की भूमि पर घग्गर की बाढ़ को नियंत्रित करने के किए जा रहे उपायों के तहत काम कर रही मशीनरी अब कम से कम इस सीजन में नहीं दिखाई देगी, इसे एक तरह से हांसी-बुटाना नहर का जिन्न निगल गया है।
विभागीय सूत्रों का कहना है कि न्यायालय की अवमानना के डर से पंजाब ने यह कदम उठाया है। इसके चलते मकरोड़ साहिब से कराली तक 16.5 किमी की घग्गर में बाढ़ नियंत्रण अथवा नदी को चैनेलाइज करने का काम अब पूरी तरह से बंद हो गया है। याद रहे कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुसार घग्गर नदी की सफाई का कार्य दोनों राज्यों की सहमति से ही करवाया जा सकता है। दोनों राज्यों के मुख्य सचिवों की सहमति जरूरी है। बताया जा रहा है कि यह बैठक सिर्फ इसीलिए नहीं हो पा रही है कि हरियाणा के मुख्य सचिव ने घग्गर के मुद्दे पर कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई जिसकी वजह से अब मशीनरी उठा ली गई है।
दिलचस्प है कि पंजाब के ड्रेनेज विभाग ने इससे पहले भी जून में वकीलों की सलाह लेने के साथ ही इस क्षेत्र में सर्वे करवाया है। तब भी किसी तरह का कार्य आगे ना बढ़ाने की सलाह सामने आई थी लेकिन जनता के दवाब में कुछ कार्य किए भी गए पर अब बात आगे बढ़ती देख पंजाब पीछे हट गया है।

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हांसी बुटाना नहर का मामला : क्षेत्र के लोग दायर करेंगे सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका
भूपेश चट्ठा, पटियाला
लोग आते हैं। हालात देखते हैं और फोटो खिंचवाकर चलते बनते हैं। मंत्री-संत्री सब जानते हैं, हांसी बुटाना नहर पर दीवार बनने से क्या होगा। हम कुछ कहते हैं तो भड़क उठते हैं करें तो क्या करें? ये व्यथा पंजाब-हरियाणा सीमा पर बसे एक या दो नहीं, बल्कि दर्जनों गांवों की है, जो दो राज्यों सरकारों की राजनीतिक शक्तियों के बीच अपने अपने वोट बैंक के एजेंडे की लड़ाई में पिस रहे हैं। पंजाब के धर्मेहड़ी, ससी ससा, अलीपुर, करतारपुर, अलीपुर थेह, नौगांवा जैसे गांव पहले से ही हांसी बुटाना नहर की मार तले हैं। धर्मेहड़ी के गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि बीते साल तो नहर के टूटने से पानी निकल गया पर अब तो बाढ़ की मार को स्थायी करने के लिए दीवार बनाई जा रही है। दिलचस्प है कि हरियाणा के मुख्यमंत्री भुपिंदर सिंह हुड्डा के ड्रीम प्रोजेक्ट कही जाने वाली इसी नहर के इस ओर हरियाणा के सौगलपुर, कसौली, पपराला, गगड़पुर, घमेड़ी, विवादास्पद साइफन के ठीक निकट घमेड़ा जैसे गांव भी मार तले हैं। वहीं धर्मेहड़ी के सरपंच कश्मीर सिंह सीधे सीधे आरोप लगाते हैं कि सरकार के नुमाइंदे फोटो खिंचवाकर चले जाते हैं, हम कुछ करते हैं तो पर्चे दर्ज किए जाते हैं। ड्रेन में साफ सफाई का काम अपने हाथ में लिया तो आज जिला प्रशासन मानसून आने के बाद आ खड़ा हुआ और कह रहा है कि मौसम साफ होते ही पुल के नीचे का फर्श खोद कर गहरा कर अन्य ड्रेन भी साफ कर दिए जाएंगे। यहां धरना लगाए बिना कोई सुनवाई ही नहीं होती है। याद रहे कि नहर के निर्माण के शुरुआती दिनों में जहां संघर्ष समिति का गठन किया गया था आंदोलन से बात न बनी तो बाढ़ का पानी चढ़ने पर लोगों ने इसका किनारा तोड़ डाला, नुकसान हरियाणा के चीका शहर तक जा पहुंचा था। लोगों ने सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई याचिका के अलावा जनहित याचिका दायर करने मन बना लिया है। इन्हें डायरेक्ट एक्शन से भी गुरेज नहीं है। क्षेत्र का हर बाशिंदा दीवार ढहाने के लिए तैयार बैठा है। हालांकि पानी देने से किसी को एतराज नहीं है। दूसरी ओर क्षेत्र में शनिवार को एसडीएम गुरमीत सिंह ने पटवारियों को साथ लेकर इलाके का दौरा किया और खराब हुई फसल की तुरंत गिरदावरी करने के आदेश भी दिए हैं।

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खेत से लाइव, आपसी सहयोग
सेवा ट्रैक्टर की हो या पड़ोसी की, मोटर के पानी की सब हाजिर है
 एक-दूसरे की मदद को पहुंच रहे हैं दोस्त और रिश्तेदार
भूपेश चट्ठा, पटियाला : गर्मियों की छुट्टियों के इन दिनों में बच्चे वेस्टइंडीज में क्रिकेट के सपने देख रहे हैं और आसमान में बादल आते ही शहर में बच्चे बैट बॉल लेकर निकल पड़ते हैं तो गांव में बच्चे ट्रैक्टर के आगे पीछे होने लगते हैं। मौसम में नमी और एक-आध दिन छोड़कर आ रही बारिश ने किसानों के चेहरे इस कदर खिला दिए हैं कि प्रभाव घर परिवार में दिखने लगा है। खुशनुमा माहौल में किसान धान की रोपाई जल्द निपटाने में लगा है।
दिलचस्प है कि मौसम की मेहरबानी और अन्य राज्यों से धान की रोपाई को आने वाले मजदूरों की कमी ने किसानों के दोस्तों-रिश्तेदारों को एक ही मोटर पर ला बिठाया है। डकाला ब्लाक के खेड़ी, रामगढ़ सपेड़ा, धर्मेहड़ी इत्यादि गांवों के रविवार को किए दौरे में पाया गया कि आजकल न केवल किसान अपितु उनके परिवार के सभी सदस्य पूरे जी जान से धान की रोपाई में लगे हैं। बीते सालों को याद करते हुए गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि अक्सर जून के महीने में किसान चिलचिलाती गर्मी में बिजली की मांग के लिए धरने प्रदर्शन कर रहा होता था या फिर सरकार को कोस रहा होता था और लड़के ग्रिड फूंकने और बिजली वालों को उठा लाने जैसी स्कीमें गढ़ रहे होते थे, पर इस बार कम से कम अब तक कुदरत की मेहरबानी से ऐसा कुछ नहीं है। वाहेगुरु की मेहर है। अरदास है कि सीजन अच्छे से निकल जाए।
वहीं रामनगर नाके पर जमे नवां गांव के गुरविंदर सिंह पूरी तरह से विकास की बातें करते हैं कि पहले एक बार ट्रांसफार्मर क्या जलता कई दिनों तक बिजली की उम्मीद नहीं होती थी पर अब लगता है कि शायद आज रात ही आ जाए। बीते साल के अच्छे मानसून से बांधों में भरे पानी से मिल रही बिजली और बिजली चोरी के कम हो रहे साधन की बात जब उन्हें बताई जाती है और पूछा जाता है कि सरकार का कम और प्रकृति व जागरूक हुए लोगों का इसमें ज्यादा योगदान है तो तपाक से कहा जाता है कि रब्ब भी वही है और लोग भी वही। फर्क बस इतना है कि तन पर कच्छहरे का स्थान शॉर्ट व लोवर ने ले लिया है। गड्डा नहीं दिखता तो मोटरसाइकिल आम हो गए हंै।
लगभग हर गांव में आलम यह है कि लोग एक दूसरे की मदद को अन्य स्थानों से भी पहुंच रहे हैं। जिस दोस्त का काम पहले हो गया है वो फोन कर टै्रक्टर सहित सेवा में तैयार होने की बात करता है। बस राशन कैंटीन से हो जाए तो बेहतर नहीं तो सोडा कम से कम साथ होने का आश्र्वासन जरूर चाहता है, हालांकि मौका देख कर स्वदेशी शक्ति वाटर से भी एतराज नहीं करता। मजदूरों की कमी क्या हुई शहर में अफसरी करने वाले भी तंबे में आ कर बहन, बुआ व मासी के यहां रिश्तेदारी में मदद करने को आ गए हैं। सेवा ट्रैक्टर की लगी हो या पड़ोसी की मोटर के पानी की सब हाजिर हो रहा है।

डीजल कब हुआ महंगा! प्रकृति ने दी राहत, punjabi, farmer's expences, paddy soawing,

 बारिश के कारण किसानों ने नहीं चलाया ट्यूबवेल
भूपेश चट्ठा, पटियाला
सरकार ने डीजल के दाम बढ़ा दिए। इस मुद्दे पर पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा हंगामा होने की संभावना थी, पर ऐसा नहीं हुआ। खेती का लागत मूल्य या खर्चे बढ़ने की दुहाई देने वाले किसान संगठन भी लगभग खामोश ही रहे। इस शांति का श्रेय केंद्र या राज्यों की सरकारों को नहीं, अपितु प्रकृति की कृपा को मिला है।
 बिजली, पानी के बाद डीजल की बात करने वाला किसान कह रहा है डीजल कब हुआ महंगा? इस साल मानसून पूर्व की बौछारों ने किसान को खेत में रौणी करने फिर और पानी छोड़ कद्दू करने के लिए किसी तरह का जेनरेटर चलाने की जरूरत नहीं पड़ने दी। इससे पहले एक एकड़ में आठ घंटे ट्यूबवेल चला कर सिंचाई करनी पड़ती थी। मानसून पांच दिन पहले आया और लगातार बरसा, तो बिजली से भी ट्यूबवेल चलाने की जरूरत नहीं पड़ी जेनरेटर तो दूर की बात।
 प्रदेश के कृषि विभाग के मुख्य अधिकारी डा. बीएस सोहल ने वीरवार को बताया कि इस साल अगर कोई साधारण सा हिसाब भी जोड़े तो अंदाजा लगा सकता है कि प्रदेश का कितना धन प्रकृति की मेहरबानी से बचा है। उन्होंने कहा कि एक हेक्टेयर खेत को तैयार करने में आम हालात में किसान मुफ्त की बिजली के अलावा 35 से 40 लीटर डीजल की खपत अपना ट्यूबवेल चलाने में कर देता है। पंजाब में 25 लाख हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र में धान की रोपाई हो रही है।
परिस्थितियां बता रही हैं कि 40 रुपये प्रति लीटर पर आया डीजल यदि जला होता तो अब तक प्रदेश के किसान चार सौ करोड़ रुपये का डीजल जला चुके होते। मरम्मत के खर्च अलग होने थे। गौर हो कि पंजाब में बिजली कनेक्शन वाले 12 लाख ट्यूबवेल हैं और इतने ही बिना कनेक्शन के हैं जिन्हें धान के सीजन में ही चलाया जाता है।

घग्गर साफ कर रही पंजाब की मशीनें हरियाणा ने उठवाई, hansi-butana, flood protection,

उप मुख्य संवाददाता, पटियाला : मानसून के दिनों में कहर बरपाने वाली बरसाती नदी घग्गर की साफ सफाई कर रही पंजाब की मशीनें हरियाणा ने उठवा दी हैं। यह खुलासा शिअद के महासचिव एवं पूर्व सांसद प्रो. प्रेम सिंह चंदूमाजरा ने किया है।
 वह शुक्रवार को यहां पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। पंजाब की भूमि पर बाढ़ नियंत्रण के उपाय कर रही इन मशीनों को उठवाने व कार्य रोकने पर किसी तरह का मामला दर्ज करवाने के सवाल पर कहा कि ये सब हरियाणा ने अपने वकीलों की सलाह से तकनीकी रूप से किया है।
हांसी-बुटाना नहर और इसके साथ बनाई जा रही दीवार पर पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की ओर से अकालियों पर लगाए गए आरोपों पर कहा कि उनके पास अपनी उपलब्धियां गिनाने को हैं नहीं, अपने शासनकाल में उन्होंने हांसी बुटाना नहर को बनने दिया और अब दोषारोपण गठबंधन पर कर रहे हैं। पंजाब के कांग्रेसी हमेशा से ही दिल्ली के साथ रहे हैं, जबकि अकाली दल ने नहर के खिलाफ प्रधानमंत्री तक का दरवाजा खटखटाया और दीवार बनना शुरू होने के एक सप्ताह के भीतर ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। इसी मामले पर सर्वदलीय बैठक बुलाए जाने की पूर्व डिप्टी स्पीकर बीर दविंदर की मांग पर चंदूमाजरा ने कहा कि अब मामला न्यायालय में है ऐसे में सर्वदलीय मीटिंग का ज्यादा औचित्य नहीं रह जाता। प्रो. चंदूमाजरा ने प्रदेश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें हरियाणा से ज्यादा होने के सवाल पर राज्य के पास कम संसाधन होने का हवाला दिया।

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फायदा
 लेवलिंग पर प्रति एकड़ 15 सौ रुपये की आ रही लागत
: पानी की बचत को देख किसानों में बढ़ा इसका प्रचलन
भूपेश चट्ठा, पटियाला : पांच-छह सालों से पंजाब के किसानों को खेत समतल करने की आधुनिक लेजर लेवलिंग तकनीक पर भाषण देते रहने के बाद अब कृषि विभाग का जागरूकता अभियान रंग लाने लगा है। दिलचस्प है कि किसानों ने शुरुआत में इसे सरकारी अफसरों का ड्रामा बता कर नकार दिया। जिन गांवों में पिछले साल इसे आंशिक रूप से अपनाया गया, वहां के किसान इस साल लेजर लेवलिंग पर पूरी तरह से फिदा हो गए हैं। प्रदेश में सिंचाई क्षेत्र में लेजर लेवलिंग को जल सरंक्षण की बेहतरीन तकनीक के रूप में देखा जा रहा है। इससे उबड़-खाबड़ खेत को बराबर कर पानी का पूरी तरह से खेत में समान रूप से फैलने के लाभ गिनवाए गए। बताया गया कि चंद रुपये खर्च कर किसान इसका भरपूर लाभ ले सकते हैं। इससे धान की रोपाई में पानी कम खर्च होगा तो गेहूं की बिजाई के बाद इसके मरने के खतरे भी कम होंगे। धर्मेहड़ी गांव के हरदीप सिंह कहते हैं कि पहले पहल तो लगा था कि सरकारी बाबू अपने कमीशन के चक्कर में एक और जुगाड़ उन पर थोप रहे हैं, लेकिन अब उन्हें इसके लाभ दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने आठ में से तीन एकड़ में लेवलिंग करवाई है और ये तीनों ही फर्श के समान हो गए हैं। मात्र दो ही घंटे में एक एकड़ में पानी फैल गया है। रोपाई के बाद हर जगह पर धान बराबर उंचाई पर दिखाई दे रहा है। मेहनत भी कम लगी है। कद्दू करने में ट्रैक्टर भी कम चला तो डीजल भी बचा है। इसकी तीन साल की मियाद कम और 15 सौ रुपये प्रति एकड़ का खर्च ज्यादा लग रहा है। इसी संबंध में मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल बताते हैं कि इससे पानी की बचत हो रही है। तीन सालों के बाद फिर से लेवलिंग करवाने की बात पर डा. सोहल कहते हैं कि तवी चलने पर बाहर की मिट्टी अंदर की ओर गिराने पर ये असमतल होने लगता है। पहली बार में लेवलिंग करने पर जहां ढाई घंटे का समय लगता है, वहीं बाद में आधा घंटा ही रह जाता है। ऐसे में पैसे भी कम हो जाते हैं। सरकार की ओर से दी जा रही सब्सिडी पर डा. सोहल कहते हैं कि साढ़े तीन लाख की मशीन पर डेढ़ लाख रुपये की सब्सिडी दी जा रही है।