Thursday, 8 November 2012

इंटरनेट के युग में भी किताब 'आउट आफ स्टाक'


-पंजाबी भाषा भवन की राज्य स्तरीय पुस्तक प्रदर्शनी में नहीं मिल पाई 'माला मणकेÓ
फोटो:
भूपेश चट्ठा, पटियाला
आम आदमी की 'जरूरत' के साथ 'इच्छा' पूर्ति करने वाली किताब अगर ढ़ंग से लिखी जाए तो इंटरनेट के युग में इलेक्ट्रानिक शब्दों पर प्रिंट को भारी करने में सक्षम है। हर धर्म ग्रंथ की सदियों से चली आ रही उम्र का राज भी शायद यही रहा हो।
पंजाब भाषा भवन में चल रहे पंजाबी भाषा सप्ताह के दौरान लगी एक सप्ताह की पुस्तक प्रदर्शनी में चाहे किताबें कम बिकने और पढऩे की कम हो रही दिलचस्पी की शिकायत हर किसी की जुबान पर है पर यहां भी एक किताब 'आउट आफ स्टाक' का ठप्पा लिए हुए है। नरिंदर सिंह कपूर की 'माला मणकेÓ अब एक बार फिर छपने जा रही है। ग्रेसियश बुक्स के निशांत सूद बताते हैं कि इस लेखक की इसी कड़ी की अगली पुस्तक 'कलियां दा काफिला' जरूर उपलब्ध है। हालांकि दूसरे साल में इसका भी दूसरा संस्करण है। वहीं व्यवसाय से जुड़े लोग बताते हैं कि अब तक पंजाबी में सबसे ज्यादा बिकने वाली किताब का खिताब 'लूणाÓ के नाम रहा है पर 'माला मणके' लगातार पिछला रिकार्ड संशोधित करती जा रही है।

पंजाबी यूनिवर्सिटी ने 50 फीसद छूट पर बेची मात्र 25 हजार की किताबें
 पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला के अपने पब्लीकेशन की स्टाल चला रहे रणजोध सिंह बताते हैं कि इस साल 50 फीसद छूट के साथ किताबें बेची जा रही हैं पर सात दिनों में मात्र 25 हजार रूपये की किताबें ही बिक पाई हैं। नए रूझान पर वे कहते हैं कि शब्द कोष व श्री गुरु ग्रंथ साहिब से संबंधित जिल्दें ज्यादा पसंद की जा रही हैं।

स्कूली बच्चों की दूरी, चार साल बाद लगा मेला
चार साल के अंतराल पर लगे पुस्तक मेले की खबर जहां अनेक लोगों को नहीं लग पाई वहीं स्कूली बच्चों की दूरी ने भी विक्रेताओं का दिल तोड़ा है। आम विक्रेता का कहना है कि मेला लगता रहे तो सभी को जानकारी होती है पर इस बार किताबें खासी कम बिकी हैं।

जातियों का इतिहास बिक रहा फोटो स्टेट के रूप में

पुस्तक प्रदर्शनी की एक स्टाल ऐसी भी रही जहां 23 जातियों का इतिहास एक सपाइरल में बंद कर सीधे प्रिंट आउट के रूप में प्रदर्शित किया गया है। इतना ही नहीं इसके सभी 23 हिस्सों को अलग-अलग कर फोटो स्टेट के रूप में पिनअप कर 20 से 30 रूपये प्रति जाति के हिसाब से बेचा जा रहा है। दिलचस्प है कि भाषा विभाग की स्टाल के बिलकुल साथ लगती स्टाल पर फोटो स्टेट की बिक्री कर रहे चरण सिंह बंबीहाभाई तर्क देते हैं कि आजकल किताब चोरी चाहे हो जाए पर बिकती कम है। हर व्यक्ति के लए अपनी जाति ज्यादा दिलचस्पी पैदा करती है इसलिए खोल कर बेची जा रही हैं। नाटकीय ढ़ंग से इसी बात के दौरान वे 'एक जाति विशेष पर हुए शोधÓ पर लिखी किताब को दिखा कहते हैं कि इस व्यक्ति ने पीएचडी कर ली है।  

किताब की मार्केटिंग करनी पड़ती है

पुस्तक प्रदर्शनी में सिर्फ 'शापिंगÓ के लिहाज से किताब खरीदने आने वालों की कमी नहीं है। किताब में क्या लिखा है अगर बता दिया जाए तो किताब बिक जाती है। वामपंथी विचारधारा से संबंधित अधिकतर किताबें रखने वाले आजाद बुक शॉप के मखण सिंह अमलासिंहवाला कहते हैं कि आज मार्केटिंग करनी पड़ती है। 'किताब की बातÓ समझा दी जाए तो आसानी से बिकती है।

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