-प्ले स्टेशन केगेम में नए साफ्टवेयर मंहगे हुए तो क्रेकर ने भी दाम बढ़ाए
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भूपेश चट्ठा, पटियाला
जिस गति से कंप्यूटर के क्षेत्र में इंजीनियरिंग ने तरक्की की है, लगभग उसी गति से हैकर ने 'प्रगतिÓ भी की है। फर्क सिर्फ इतना है कि नया साफ्टवेयर अथवा हार्डवेयर विकसित करने वाले सूचना तकनीकि क्षेत्र के विशेषज्ञ कालेज, यूनिवर्सिटी अथवा किसी शोध संस्थान में नियमित रूप से शिक्षा ग्रहण कर अपने ज्ञान को किसी उत्पाद के रूप में विकसित करते हैं वहीं बंद कमरों में गुप्त रूप से लगातार रातों में इसी 'खोजÓ की 'पुर्न खोजÓ करने वालों के ज्ञान की 'उपयोगिताÓ ने अब मूल से नकल को मंहगा कर दिया है।
हाल ही में लांच हुई बच्चों की गेम्स विशेष रूप से प्ले स्टेशन के मामले में स्पष्ट रूप से सामने आया है कि एक बार हार्डवेयर खरीदने के बाद उपभोक्ता उस पर चलने वाले साफ्टवेयर के बारे में पहले सोचने लगा है। गुरुनानक नगर में रहते दीपक कुमार बताते हैं कि पिछली दीवाली पर उन्होने सोनी कंपनी का प्ले स्टेशन पीएस-2 को 56 सौ रूपये में खरीदा था। इसकी ओरिजनल सीडी 250 रूपये की थी जबकि पायरेटिड मात्र 50 रूपये में, मंहगा होने का हवाला देने पर दुकानदार ने ही ओरिजनल को क्रैक करवाने की सलाह दे डाली। इसके बाद से पायरेटिड सीडी का प्रयोग कर रहे हैं।
दीपक कुमार का एडवेंचर यहीं समाप्त नहीं होता। इस बार उसी कंपनी ने पीएस-3 का नया वर्शन लांच किया। 20 से 22 हजार रूपये के इस प्ले स्टेशन के लिए ओरिजनल सीडी की रेंज आठ सौ रूपये से शुरू होती है। इस गेम के लेटेस्ट वर्शन को अभी तक क्रैक नहीं किया जा सका है, हालांकि पीएस-3 का ही पुराना वर्शन इस साल 25 से 26 हजार रूपये में बिक रहा है। कारण सिर्फ और सिर्फ यही है कि क्रैक किए वर्शन में पायरेटिड सीडी डल सकती है और ये मात्र 250 रूपये में उपलब्ध है।
इसी क्रम में आजाद नगर के श्रीकांत शर्मा बताते हैं कि क्रिकेट, फुटबाल से वॉर गेम तक का सीधे मैदान का अहसास आपके ड्रांइग रूम में करवाने के चलते मांग खासी है। लगातार सीडी बदलने की वजह से इन पर खर्च भी ज्यादा आता है। चूंकि गेम आप बना नहीं पाते ऐसे में कंपनी की गेम के साथ ही एक मोडीफाइड चिप लग जाती है। जिसके बाद आपकी गेम पायरेटिड सीडी का इस्तेमाल कर पाते हैं। हालांकि इसी बीच अगर आप आटोमेटिक अपग्रेड करवाने का प्रयास करते हैं तो कंपनी फिर से आपका सिस्टम ब्लाक कर देती है। ऐसे में फिर से किसी क्रैकर के पास जाना पड़ता है और चिप लगवानी पड़ती है।
इसी प्रकार की एक कंपनी के टेरिटरी सेल्स मैनेजर दिनेश कुमार कहते हैं कि पायरेसी रोकना खासा मुश्किल होता जा रहा है। वे लागे भी लगातार कंपनी को फोटो व वीडियो भेज कर फीडबैक दे रहे हैं। संभव है कि आने वाले समय में सबकुछ आन लाइन होने पर पायरेसी करने वाले जल्द धरे जाएंगे।
वहीं पुलिस के खातों में अभी तक कॉपीराइट एक्ट के तहत दर्ज किए मामलों में कंप्यूटर से मोबाइल पर गाने लोड करने वालों के ही नाम चढ़ पाए हैं। अन्य किसी प्रकार के साफ्टवेयर को इसमें शामिल नहीं किया गया है।
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