जागरण एक्सक्लूसिव
-ट्रैक्टर की कीमत 70 हजार से बढ़कर अब चार-पांच लाख हुई तो जमीन 40 हजार से 40 लाख प्रति एकड़ हो गई
-किसान हुआ समझदार करवाने लगा आउट सोर्सिंंग
भूपेश चट्ठा, पटियाला
देश के नए ट्रैक्टरों की कुल खपत में से चंद साल पहले तक 24 फीसद हिस्सा रखने वाले पंजाबी किसानों के 'ट्रैक्टर प्रेमÓ में अब कमी आ गई है। इतना ही नहीं कभी बेटी की शादी के लिए सबसे आसान कहे जाने वाले 'ट्रैक्टर लोनÓ की चाहत भी नहीं रही है। दिलचस्प है कि इस सब के पीछे कारण कुछ और नहीं अलबत्ता रियल एस्टेट के दामों में उछाल और आटोमोबिल क्षेत्र के ठंडा रहना ही है।
पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला के समाज शास्त्र विभाग के पूर्व मुखी डा. पीएस जम्मू बताते हैं कि हरित क्रांति के दिनों में एक ट्रैक्टर की कीमत 70 हजार से बढ़कर अब चार-पांच लाख हो गई, पर जमीन की कीमत 40 हजार से 40 लाख प्रति एकड़ हो गई है। उन दिनों में 18 फीसद ब्याज पर लिया ट्रैक्टर लोन बेटी की शादी के लिए आसान रास्ता था, किसान अपना खर्च बढ़ा लेता था। ये सिलसिला पांच-दस साल पहले तक भी रहा है पर अब लोग पुराने ट्रैक्टर को प्राथमिकता देते हैं, वो भी एक लाख रूपये से कम के, कई मामलों में यह भी नहीं होता और 'आउट सोर्सिंंगÓ का जमाना है। सीजन आने पर ड्राइवर सहित सेवा ले ली जाती है और रखरखाव की सरदर्दी भी नहीं रहती।
अंताला गांव के गुरविंदर सिंह भिंडर बताते हैं कि फसल का एमएसपी कम था तो किश्त चुकाने कभी एक बीघा तो कभी दो बीघे जमीन बेची जाती थी, ऐसे में बैंक अधिकारी और उनके साथ आने वाली पुलिस किसी विलेन से कम नहीं थी। उनके गांव में ही पांच-छह ऐसे केस हैं जहां एक ही ट्रैक्टर किसानों के पांच पांच एकड़ खा गया। किश्तें टूटती गई और कभी पूरी नहीं हुई। पर अब हालात अलग हैं, अब बैंक अधिकारी खुद कहते हैं कि लोन ले लो, वे कई योजनाएं लाते और दिखाते हैं। बताते हैं कि पुराना लोन किस तरह से 'एडजस्टÓ होगा? और नया किस तरह से लिया जाएगा?
वहीं राजपुरा रोड पर स्वराज ट्रेक्टर एजेंसी के मालिक विजय कपूर बताते हैं कि लोग अब ट्रेक्टर लोन लेने की बजाए जमीन के कागज रख बैंक से लिमिट बनवाते हैं, इसमें ब्याज भी कम पड़ता है, ऐसे में स्वभाविक है कि विवाह शादी के लिए ट्रेक्टर लोन लेना बीते जमाने की बात हो गई है। पांच सात साल पहले तक भी ऐसा होता था। अब भूमिगत जल स्तर गिरने पर बड़े ट्रेक्टर की मांग पानी खींचने के लिए बढ़ी है, अन्य की बिक्री में गिरावट दर्ज हुई है।
सोशल साइंसेज एंड हैल्थ फोरम के डा. खोसला बताते हैं कि सरपल्स हुई अमीरी ने भी कई अवगुण दिमाग में डाल दिए हैं। जमीन के अनुपात में ट्रैक्टर चाहे ना मंहगा हुआ हो पर शादी का खर्च खासा बढ़ा लिया गया है। अब फसल लेने के बाद खेत की बजाए मैरिज पैलेस में शादी होती है, उम्र भर दहेज जुटाने की बजाए मॉल में शापिंग की जाती है। घर की बनी चीजों की बजाए अंग्रेजी ब्रांड पसंद किए जाते हैं। ऐसे में ट्रैक्टर लोन चाहे ना भी लिया जाए पर 'किल्लाÓ फिर भी बिकने को हो जाता है।
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