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Friday, 28 September 2012

...अब ट्रैक्टर बेच नहीं होती शादी


जागरण एक्सक्लूसिव
-ट्रैक्टर की कीमत 70 हजार से बढ़कर अब चार-पांच लाख हुई तो जमीन 40 हजार से 40 लाख प्रति एकड़ हो गई
-किसान हुआ समझदार करवाने लगा आउट सोर्सिंंग
भूपेश चट्ठा, पटियाला
देश के नए ट्रैक्टरों की कुल खपत में से चंद साल पहले तक 24 फीसद हिस्सा रखने वाले पंजाबी किसानों के 'ट्रैक्टर प्रेमÓ में अब कमी आ गई है। इतना ही नहीं कभी बेटी की शादी के लिए सबसे आसान कहे जाने वाले 'ट्रैक्टर लोनÓ की चाहत भी नहीं रही है। दिलचस्प है कि इस सब के पीछे कारण कुछ और नहीं अलबत्ता रियल एस्टेट के दामों में उछाल और आटोमोबिल क्षेत्र के ठंडा रहना ही है।
पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला के समाज शास्त्र विभाग के पूर्व मुखी डा. पीएस जम्मू बताते हैं कि हरित क्रांति के दिनों में एक ट्रैक्टर की कीमत 70 हजार से बढ़कर अब चार-पांच लाख हो गई, पर जमीन की कीमत 40 हजार से 40 लाख प्रति एकड़ हो गई है। उन दिनों में 18 फीसद ब्याज पर लिया ट्रैक्टर लोन बेटी की शादी के लिए आसान रास्ता था, किसान अपना खर्च बढ़ा लेता था। ये सिलसिला पांच-दस साल पहले तक भी रहा है पर अब लोग पुराने ट्रैक्टर को प्राथमिकता देते हैं, वो भी एक लाख रूपये से कम के, कई मामलों में यह भी नहीं होता और 'आउट सोर्सिंंगÓ का जमाना है। सीजन आने पर ड्राइवर सहित सेवा ले ली जाती है और रखरखाव की सरदर्दी भी नहीं रहती।
अंताला गांव के गुरविंदर सिंह भिंडर बताते हैं कि फसल का एमएसपी कम था तो किश्त चुकाने कभी एक बीघा तो कभी दो बीघे जमीन बेची जाती थी, ऐसे में बैंक अधिकारी और उनके साथ आने वाली पुलिस किसी विलेन से कम नहीं थी। उनके गांव में ही पांच-छह ऐसे केस हैं जहां एक ही ट्रैक्टर किसानों के पांच पांच एकड़ खा गया। किश्तें टूटती गई और कभी पूरी नहीं हुई। पर अब हालात अलग हैं, अब बैंक अधिकारी खुद कहते हैं कि लोन ले लो, वे कई योजनाएं लाते और दिखाते हैं। बताते हैं कि पुराना लोन किस तरह से 'एडजस्टÓ होगा? और नया किस तरह से लिया जाएगा?  
वहीं राजपुरा रोड पर स्वराज ट्रेक्टर एजेंसी के मालिक विजय कपूर बताते हैं कि लोग अब ट्रेक्टर लोन लेने की बजाए जमीन के कागज रख बैंक से लिमिट बनवाते हैं, इसमें ब्याज भी कम पड़ता है, ऐसे में स्वभाविक है कि विवाह शादी के लिए ट्रेक्टर लोन लेना बीते जमाने की बात हो गई है। पांच सात साल पहले तक भी ऐसा होता था। अब भूमिगत जल स्तर गिरने पर बड़े ट्रेक्टर की मांग पानी खींचने के लिए बढ़ी है, अन्य की बिक्री में गिरावट दर्ज हुई है।
 सोशल साइंसेज एंड हैल्थ फोरम के डा. खोसला बताते हैं कि सरपल्स हुई अमीरी ने भी कई अवगुण दिमाग में डाल दिए हैं। जमीन के अनुपात में ट्रैक्टर चाहे ना मंहगा हुआ हो पर शादी का खर्च खासा बढ़ा लिया गया है। अब फसल लेने के बाद खेत की बजाए मैरिज पैलेस में शादी होती है, उम्र भर दहेज जुटाने की बजाए मॉल में शापिंग की जाती है। घर की बनी चीजों की बजाए अंग्रेजी ब्रांड पसंद किए जाते हैं। ऐसे में ट्रैक्टर लोन चाहे ना भी लिया जाए पर 'किल्लाÓ फिर भी बिकने को हो जाता है।

Saturday, 7 July 2012

किसान व पुलिस प्रशासन में भिड़न्त 29 घायल, Farmers-Police clash leads to 29 injured


-पंचायती जमीन खाली करवाने पर विवाद भड़का
-घायलों में डीएसपी ग्रामीण जगजीत सिंह भी शामिल
भूपेश चट्ठा, पटियाला
बलबेड़ा व चरासों गांव में गांव व पुलिस प्रशासन के बीच आज मंगलवार को हुई भिड़ंत में दोनों पक्षों के 29 लोग घायल हो गए हैं। एक ओर जहां किसानों ने पंचायती जमीन खाली करवाने आए पुलिस व जिला प्रशासन के अधिकारियों पर पत्थर मारे हैं वहीं पुलिस की ओर से किसानों को खदेडऩे के लिए लाठी चार्ज करने से लेकर, आश्रु गैस के गोले छोडऩे, रबर की गोलियां दागने और पानी की फोहरों का इस्तेमाल करने के अलावा हवा में गोलियां भी चलाई गई हैं।
  दोनों गांवों की पंचायतों की करीब 140 एकड़ जमीन खाली करवाने जिला प्रशासन पिछले कुछ समय से प्रयासरत था। इससे पहले भी दो बार प्रशासन ने मौके पर जाकर जमीन खाली करवा खुली बोली के माध्यम से जमीन देने की कोशिश की लेकिन भारतीय किसान यूनियन एकता डकौंदा के समर्थन से जमीन पर काबिज लोगों ने इसका विरोध किया और प्रशासन को खाली हाथ लौटना पड़ा।
आज तीसरे प्रयास में प्रशासन ने बिना किसी घोषणा के बड़ी संख्या में पुलिस बल के साथ मौके पर जाकर जमीन खाली करने को कहा। हालांकि प्रशासन के इस प्रयास की जानकारी किसान यूनियन के नेताओं को पहले से थी, ऐसे में वे भी लगभग हर तरह से तैयारी के साथ मौके पर पहुंचे हुए थे।
पंचायत एंव विकास विभाग और राजस्व विभाग के अधिकारियों के साथ पहुंची पुलिस के साथ किसानों का दो बार टकराव हुआ है। इसमें 14 पुलिस कर्मी और 15 किसान घायल हुए हैं। इनमें डीएसपी ग्रामीण जगजीत सिंह भी शामिल हैं। वे कहते हैं कि उन्हें कुछ पता ही नहीं चला कब वे गिर पड़े और कब पत्थराव शुरू हो गया।
जबकि राजिंदरा अस्पताल में उपचाराधीन जोगिंदर कौर का कहना है कि उन्हें घर में से निकाल कर लाठियों से पीटा गया और ये काम पुरुष पुलिस कर्मियों ने किया है। इसी क्रम में किसानों का कहना है कि पुलिस ने उनका निशाना लगा कर गोलियां चलाई हैं। ब्लाक प्रधान सुखमिंदर सिंह अपनी जख्मी बांह दिखा कहते हैं कि उन्हें भी गोली लगी है।
इसी प्रकार सनौर के एसएचओ जगबीर सिंह पांव पर लगे जख्म को दिखा कहते हैं कि उनके पांव में छर्रा लगा है। दिलचस्प है कि बड़ी संख्या में दोनों पक्षों के घायलों के एक ही स्थान पर होने और घायल होकर उपचार करवाने के बावजूद दोनों पक्षों के हौंसले बुलंद हैं। एसएसपी पटियाला गुरप्रीत सिंह गिल व अतिरिक्त डिप्टी कमिश्नर अनिनदिता मितरा ने अस्पताल का देर सांय दौरा किया है।

बाक्स
बिना उकसावे के पुलिस ने हिंसा की: यूनियन
उपमुख्य संवाददाता, पटियाला
भारतीय किसान यूनियन एकता डकौंदा के जिला प्रधान डा. दर्शन पाल का कहना है कि पुलिस ने पंचायत व राजस्व विभाग के अधिकारियों के साथ आकर बिना उकसावे के हिंसा फैलाई है। डेढ़ घंटे के अंतराल में दो बार किसानों पर जुल्म ढाए गए। इसमें गोलियां बरसाना भी शामिल है। दर्जनों मोटर साइकिलों के साथ तोड़ फोड़ की गई है। यूनियन का कहना है कि 40-50 सालों से जिस जमीन को किसानों ने आबाद किया है और जब ये अन्न उत्पादन करने लगी है तो इसे छीना जा रहा है।


'मुख्यमंत्री हस्तक्षेप करें अन्यथा राज्य स्तरीय संघर्षÓ

फ्लैग: मामला शामलाट जमीन खाली करवाने का

उपमुख्य संवाददाता, पटियाला
बलबेड़ा व चरासौं गांव में शामलाट जमीन खाली करवाने को लेकर हुए विवाद पर 17 किसान व मजदूर संगठनों के नेताओं की कमेटी ने वीरवार को दोनों गांवों और अस्पताल का दौरा करने के बाद कहा है कि इस मामले में मुख्यमंत्री हस्तक्षेप करें। उनके संगठन को बुला कर बात करें और मामला हल करें। यह कार्य 25 जून को होने वाली बैठक में कर लिया जाए अन्यथा वे 26-27 जून को अपने नेताओं के साथ बातचीत कर राज्य स्तरीय संघर्ष करेंगे।
मामले की पड़ताल करने आई कमेटी का नेतृत्व करते बूटा सिंह बुर्जगिल ने मांग की है कि मामले को भड़काने में सबसे अधिक नकारात्मक भूमिका निभाने वाले सदर थाने के प्रभारी एएसपी धु्रमन एच निंबले और सनौर ब्लाक की बीडीओ जसवंत कौर को तुरंत तबदील किया जाए। इसी मौके पर उन्होंने अश्रु गैस के गोलों के खोल व एक रिवाल्वर के कारतूस का खोल भी दिखाया और आरोप लगाया कि महिलाओं और बुजुर्गों को घरों में से निकाल कर मार गया। जितने लोग अस्पताल में हैं उससे कहीं ज्यादा घरों में घायल पड़े हें।
प्रशासन की ओर से हाईकोर्ट के आदेशों पर 87 एकड़ जमीन खाली करवाने के सवाल पर कमेटी कहती है कि एक गांव में चार सौ एकड़ जमीन है तो दूसरे में 365 एकड़ और लगभग इतने ही परिवार हैं। सभी गरीब हैं, धनी कोई नहीं। इनमें 80 फीसद के पास खेती लायक जमीन नहीं है। जिला प्रधान डा. दर्शन पाल कहते हैं कि वे हाईकोर्ट नहीं जा रहे हैं। ये नीतिगत मामला है ऐसे में मुख्यमंत्री से ही हस्तक्षेप करने की मांग कर रहे हैं। चेतावनी के स्वर में वे यह भी कहते हैं कि जमीन वे किसी भी सूरत में खाली नहीं होने देंगे।

जमीन बे-आबाद थी, पंचायती नहीं
यूनियन का तर्क है कि प्रशासन जिस जमीन को पंचायती बता कर खाली करवाने की बात कह रहा है। वो पंचायतों के बनने से पहले और करीब 60 साल पहले बे-आबाद थी जिसे काश्त कर खेती लायक बनाया गया, ऐसे में पंचायती जमीन का हवाला देकर खाली नहीं करवाया जा सकता। तत्कालीन बिजली बोर्ड ने 20-20 साल पहले इसी जमीन पर इन्हीं लोगों के नाम कृषि क्षेत्र में बिजली कनेक्शन दे रखे हैं। 90 मोटरों के अलावा दो सौ से ज्यादा घरों के कनेक्शन भी चल रहे हैं। यूनियन कहती है कि 20 साल पुराना किराएदार नहीं निकाला जाता, ये 60 साल पुरानी जमीन खाली करवा रहे हैं।


दस मरे लोगों पर भी मामले दर्ज
सदर पुलिस थाने में पंचायत विभाग की जिस अधिकारी की शिकायत पर हत्या का प्रयास करने सहित अपराध की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है उनमें दस नाम ऐसे भी बताए जा रहे हैं जिनकी मौत हुए कई बरस बीत चुके हैं। यूनियन के महासचिव जगमोहन बताते हैं कि पुलिस ने बिना सबूत व बिना किसी तरह की जांच के मात्र उन लोगों पर ही मामला दर्ज कर दिया है जिनके नाम जमीन की गिरदावरी थी।