Tuesday, 31 January 2012

चुनावी चटकारे punjab election, 2012, patiala, chtkare- 7


क्या पोजीशन है?

नेता, कार्यकर्ता, समर्थक से लेकर वो आम आदमी जो हर सरकार से दुखी है और वोट देने की बजाए घर बैठ कर टेलीविजन का आनंद लेना चाहता है, आज एकमत से एक ही सवाल लिए खड़ा है कि क्या पोजीशन है? सही भी है आपे राच्य में आपके उपर हुकूमत करने एक सरकार बनने जा रही है और आपको खबर दही ना हो तो ये यही नहीं है।
लेकिन चटारे तब शुरु हो जाते हैं जब घाघ सियासतदान भी अदने से व्यक्ति से सवाल करने लग जाते है कि पोजीशन क्या है? और वो  बंदा भी टीवी एक्सपर्ट बन पूरा विश्लेषण देता है और फिर किसी ओर से पूछता  है कि यार पजीशन की है? एंवे ही है ना।

नाम रिसोर्ट का ही बताओ कुल्चे चाहे बाहर रेहड़ी पर हो जाएं

चुनावी सीजन में अपने बंदों के रिश्तेदारों को एक विधान सभा क्षेत्र विशेष में ले जाकर उम्मीदवार से मिलवाने का पूरा जोर लग रहा है। डोर-टू-डोर से कहीं आगे हो कर चल रही पर्सन-टू-पर्सन की मार्किंग में खर्च भी खासा हो रहा है।और आदर्श चुनाव आचार संहता पर तीखी निगाह रखने वाले किसी आब्जर्वर के बूते की भी बात नहीं है कि इस तरह के खर्च को दर्ज कर सके। लेकिन अपने बंदे ठहरे अपने बंदे वे भी 'शरीफ प्रचारकोंÓ का पूरा ख्याल रखे हुए हैं। किसी जमाने में लंच करने वाले अब जब भोजन पर आ गए हैं तो नाम लिया जाने लगा कि रास्ते में पड़ते रिसार्ट पर रुकते हैं। हुआ भी कुछ ऐसा ही लेकिन चटकारे तब शुरु हुए जब कुछ ने रिसार्ट के अंदर लंच किया तो कुछ ने रिसार्ट के बाहर रेहड़ी पर कुल्चे से पेट की च्वाला शांत की, पर नाम दोनों ही पक्षों ने रिसार्ट का लिया।

फोटो में वोटर का चेहरा ना आए

एक जमाना था जब लीडर अपने वोटरों की पहचान सार्वजनिक कर दावा करते थे कि ये उसके वोटर हैं जिसके दम पर वो चुनाव जीतेगा। दांव पेच कीद राजनीति हालांकि चलती रहती थी पर वो बड़े लीडरों अथवा रणनीतिक बढ़त देने वाले समर्थकों को तोडऩे तक सीमित रहती थी, लेकिन अब आलम ये है कि जो काम समर्थक आपके नाम पर किया करते थे और वोटर को किसी एफडी की तरह कैश किया करते थे अब वो सौदे सीधे होने लगे हैं तो लीडरों ने मीडिया पर ही पाबंदी लगाने के प्रयास शुरु कर दिए हैं। शहर के साथ लगते एक  क्षेत्र में नेता जी ने जैसे तैसे समर्थक तो जुटा लिए पर फोटो में वोटर का चेहरा ना आए इसके निर्देश लगातार देते रहे। अब या तो वोटर फिसलने का डर था या फिर आउट सोर्सिंग से मंगवाया गया वोटर पकड़े जाने का डर।

ओ बक्श दो यारों...

कार की किश्तें एक ही चुनाव से पूरी करने के इच्छुक एक  ब्रोकर को सुबह की सैर करने वालों का एक समूह यार कम और बगार च्यादा कहता रहा है। आलम ये है कि उनके आने से पहले ही यार...बगार, यार...बगार के नारे लगने लगते हैं। जनाब का दिल तो पहले ही चुनाव आयोग की आर्दश चुनाव  आचार संहिता तोड़ चुकी है, अब जब घर पर भी ताने सुनने सुनते समझ आने लगे तो जनाब भी दुहाई देने लगे हैं। ओ बक्श दो यारों...बस करो यारों...

इधर जाउं या उधर जाउं...

मतदान होने में दस तो चुनाव प्रचार खत्म होने में एक सप्ताह से कुछ च्यादा समय ही बचा है। लेकिन देरी से होमवर्क करने वाले कुछ लोगों के लिए अब भी सोचने का ही समय चल रहा है। पहले पहल सेफ प्ले का नारा देने वाले ये लोग अब पूरी तरह से उलझन में हैं ऊंठ किस करवट बैठेगा पहले इस आंकलन में समय निकाल दिया और अब सुबह उठते ही शुरु हो जाते हैं कि इधर जाउं कि उधर जाउं... जनाब गाड़ी छूट चुकी है अब कहीं ना जाइए और शांति से बैठ जाइए।

उनकी भी कुछ मजबूरियां रही होंगी

हर तरफ बटोरने का सीजन चल रहा है, कोई वोट बटोर रहा है तो कोई बोटी और कोई वोट के नाम पर रोट बटोर रहा है। मतलब हर किसी को अपने धंधे पानी से है। लोकतंत्र में अगले पांच साल क्या होगा? ये सब बाद में देखा जाएगा अभी तो अपना काम निकलवाना ही सर्वोपरि है। लेकिन इंसान को झटका तब लगता है जब उम्मीद टूटती है। ऐसा ही झटका एक सलाहकार को लगा जब वो बेगानों को तो दुरुस्त करता चल गया पर 'अपनोंÓ को ग्रेस अंक देता कहता चला गया, आखिर उनकी भी कुछ मजबूरियां रही होंगी।



माघ है देखते हैं किसने तिल खाएं हैं और दान किए हैं

चुनावी चटकारे punjab election, 2012, patiala, chtkare- 6


 ये मोबाइल भी 30 शाम पांच बजे तक

चुनावी दौर में हर तरफ बदलाव दिखाई दे रहे हैं। जिस किसी नेता को लोकतंत्र में चुनाव लडऩे का मौका किसी ना किसी पार्टी के टिकट पर अधिकृत प्रत्याशी के रूप में मिला है और नेता जी पहले से चुनाव लडऩे का अनुभव रखते हैं तो उन्होंने पहला काम तो अपना मोबाइल नंबर बदलने का किया है। हालांकि जो नंबर पहले नेता जी के हाथ में हुआ करता था वो अब उनके आफिस की शोभा बढ़ाता हुआ लोगों के साथ संपर्क साधे हुए है, वहीं किसी करीबी की पहचान पर लिया गया नया नंबर हालांकि तेजी से अपनी पहचान बना रहा है पर चुनावी चटकारे लिए जा रहे हैं कि इसे भी च्यादा तवच्जो देने की जरूरत नहीं है। नया नंबर भी 30 जनवरी शाम पांच बजे तक के लिए है। इसके बाद ये भी आउट आफ कवरेज एरिया ही मिलेगा।

इना दे लारे ने मैं तां सीट...

दो पार्टियों से लगातार पांच सालों में टिकट लेने के मामले में खता खा चुके और चुनावों से ठीक पहले दोनों को ही दगा दे चुके एक नेता जी शुरु से ही किंग की तरह रहे और जिए फिर लोकतंत्र में किंग मेकर की भूमिका में रहे। इस बार खुद हाथ आजमाने निकले हैं। नेता जी का मानना है कि लोगों के लिए बहुत किया है अब देखना है कि हमे कितना पसंद करते हैं? इसी जोर आजमाइश के बीच किसी सलाहकार ने अपने हक समझते हुए बताया कि आपके बारे में इस बार का हाईकमान अच्छा सोच रहा है अगली बार आपकी टिकट पक्की है । इस पर तुरंत जवाब आया ऐह तां इना दे लारे ने, करदे कित्थे ने, मैं तां सीट कड्ड रेहा हां।

पंजाब में मीरी पीरी का शासन रहा है

भजन-कीर्तन-पाठ-पूजा कर आम दिनों में आम आदमी की सेवा में मसरूफ रहने के साथ ही अपने लिए भी काम की तलाश कर चुके नेता जी को भी इन दिनों अपना मुख्य काम मिला हुआ है और राष्ट्रीय स्तर के नेता जी प्रदेश भर में दौरे कर अपने नए ग्राहक तलाश रहे हैं, जिनके दम पर अगले चुनाव तक रोटी चलानी है। हालांकि नेता जी का अपना फंडा तो क्लीयर है कि क्या करना है? पर जब एक समर्थक ने पूछ लिया कि ये तो हमारा काम नहीं है। हमारी दाल-रोटी जहां से निकल रही है वहीं च्यादा ध्यान लगाना चाहिए। इस नेता जी ने मूर्ख भक्त को प्रवचन दे डाले अरे हमारा संविधान भी इसे ही मुख्य काम बताता है और उपर से पंजाब है यहां तो मीरी पीरी का राज रहा है।

लड्डू फूटा क्या?

पुरानी कहावत है कि लड्डू फूटेगा तो चूरा होगा और फैल कर बिखरेगा। एक व्यक्ति के लिए ये संभव नहीं कि आराम से फूटे हुए लड्डू को खा ले, ऐसे में लड्डू के मालिक की मजबूरी हो जाती है कि बांट ही दिया जाए। लेकिन ये तभी होगा जब लड्डू फूटेगा, इसके बांटने का चलन चलता आ रहा है। लेकिन इन चुनावों में हालात कुछ ऐसे बने हुए हैं कि चूर-भूर का इंतजार करने वालों को अब तक मायूसी ही मिली है। आलम ये है कि अब चारों ओर से आवाजें आ रही हैं कि लड्डू फूटा क्या?

यार तू तो दो दिन से एमएलए बनने से रह गया

दिखने में टीम अन्ना के सदस्य सा लगने वाला एक उत्साही युवक बीते दिन नामांकन पत्र दाखिल करने अकेला ही अपनी पीठ पर बैग लटकाए निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय में जा पहुंचा। बात नामांकन पत्र के दाखिले से शुरु हुई तो दस्तावेज थमाते हुए उक्त युवक ने अपना पर्चा लेने के लिए। इस पर चुनाव अधिकारी उसे अकेला देख समझाने बुझाने लग गए, वहीं पूरी तरह से कुछ ऐसे ही सवालों के जवाबों से लेस होकर आए उक्त युवक को आखिरकार कागज जांचने भेज दिया गया। जांच में पाया गया कि मात्र दो दिनों की आयु कम होने के चलते नामांकन पत्र दाखिल नहीं हो पाया तो चटकारे भी शुरु हो गए कि यार तू तो दिन से एमएलए बनने से रह गया।

ये राजनीति है डियर, राज नहीं है

दूसरी बार चुनाव लड़ रहे एक नेता जी अपनी आलीशान हवेली में से निकल कर चुनाव प्रचार में धूल फांकने निकले एक युवा नेता को जब कस्बे की गलियों में नुक्कड़ सभा में अपनी ही पार्टी के युवा कार्यकर्ता की सलाहों से दो चार होना पड़ा तो नेता जी तुनक गए और माथे पर बल लाकर बोल 'ले तू ही बोल लेÓ। इस पर मुहल्ले में तुरंत ही प्रतिक्रिया शुरू हो गई कि ये राजनीति है डियर, राज नहीं है। यहां बहुत कुछ सुनना और बर्दाश्त भी करना पड़ता है।

मैं तां बहुत शरीफ हां

चुनावों में जुगाड़ी राजनीति करने के माहिर एक नेता जी को क्षेत्र की राजनीति विशेष रूप से एक दल की दलगत राजनीति का खासा अनुभव है। वे अपने इस काम में खासी महारत भी रखते हैं, उनकी इसी बात पर सभी कायल भी हैं लेकिन पता नहीं क्या बात है चुनाव खत्म होने के साथ ही कभी नेता जी बदल दिए जाते हैं और कभी नेतृत्व बदल जाता है। इस बार भी नेता जी को बड़ी जिम्मेदारी दी गई है और अधिकार दिया गया है कि खुल कर खर्च कर लेना बाद में सब हो जाएगा। वहीं नेता जी ने पैसे ना लेने की बात कह मुफ्त में सेवा के बदले आशीर्वाद की मांग रख दी साथ ही दोस्तों में कहना शुरु किया या मैं तां बहुत शरीफ हां।

ये शादी आखिर है किसकी, चलो छड्डो...

चुनाव आयोग की आदर्श चुनाव आचार संहिता का डंडा किस कदर चल रहा है, इसके परिणाम अब वास्तिवक रूप में दिखने लगे है। पंजाब में जहां आम दिनों में छठा दरिया बहता रहता है वहीं चुनाव के दिनों में ये पूरे उफान पर रहता है, लेकिन इस बार आलम ये है कि खुद चुनावी लोकतंत्र में भाग ले चुके पार्षद स्तर के नेता भी शाम को इंतजाम ना होने की सूरत में भटक रहे होते हैं। आलम ये है कि एक नेता जी शादी की पूर्व संध्या पर आयोजित कार्यक्रम में किसी के बुलाने पर पहुंच गए। सीधी पहचान तो थी नहीं सो मौके पर ही करीबी से पूछने लगे ये शादी आखिर है किसकी? इसी बीच लोगों को आता देख चलो छड्डो... कह कर छठे दरिया की ओर बढ़ गए।  

चुनावी चटकारे punjab election, 2012, patiala, chtkare


 सनडे मतलब मेनटेनेंस डे

आदर्श चुनाव आचार संहिता लगी हो तो हर तरफ सरकारी बाबू का डंडा चलता नजर आता है, जन प्रतिनिधि के नाम पर मिलने वाली छूट इन दिनों में गायब है पर इन सबके बावजूद सनडे तो सन-डे ही है। सर्दियों में कई दिनों बाद सन दिखाई दे तो सन का महत्व और बढ़ जाता है। आज भी कुछ ऐसा ही हुआ चुनाव सिर पर है फिर भी सब कुछ ठीक वैसे ही चल रहा है जैसे लोकतंत्र के राज में चलता है। ऐसे ही लंबी सर्दी के बाद धूप में बाल सुखा रहे एक नेता जी से जब पूछा गया तो उन्होंने टका सा जवाब दिया अरे भई सनडे का मतलब होता है मेनटेनेंस डे। इस दिन आप अच्छे से खुद को संवारे और वे सभी काम करें जो रूटीन में नहीं कर सकते लेकिन किए जाने चाहिए। शरीक की मेनटेनेंस करना भी तो जरूरी है।

तुम बुद्धा बनो बुद्धू नहीं

शहर में आयोजित एक कार्यक्रम में निमंत्रण को लेकर चर्चा चल रही थी। भाई चारे में से ही एक ने आवाज लगाई कि क्या बात है? कहां से आ रहे हैं? बताया गया कि शहर में कुछ खास है नहीं। तुरंत ही जवाब दिया गया कि अरे इतना बड़ा कार्यक्रम हो रहा है तुम गए नहीं। जनाब ने समझा ये तो बड़ी गलती हो गई, इधर उधर हाथ पांव मारने के बाद भी जब कुछ नहीं पता चला तो सुरक्षा एजेंसी में अपनी हाजरी लगवाने कार्यक्रम बताने वालों से ही पूछ डाला कि आखिर वहां हुआ क्या था? इस पर फिर कहा गया कि तुम बुद्धा बनो हमें बस यही चाहिए बुद्धू नहीं, महल छोड़ो और शांति की तलाश में भटको...।


अरे नाम में क्या है, यार तो अपना ही है

शाम की दवा से दूर का भी नाता ना रखने वाले एक नेता जी की खासी इच्जत है और उनके आदर्शवादी रवैये और मिलनसार स्वभाव के साथ हर किसी की मदद के लिए तत्पर रहने के चलते सभी इच्जत भी करते हैं, हालांकि यह भी उनकी आदतों में शामिल है कि कोई इच्जत ना करे तो वे करवा भी लिया करते हैं। हुआ कुछ ऐसा की नेता जी के एक खाने पीने वाले मित्र के नंबर की जरूरत उनके ही एक अन्य मित्र को आन पड़ी। मित्र ने पूरा नाम बता कर जब नंबर मांगा तो नेता जी मुकर गए, कहा ऐसे किसी व्यक्ति को वे नहीं जानते, एक बार फिर याद दिलाने पर नेता जी ने निकनेम ले कहा अरे नाम में क्या रखा है, यार तो अपना ही है। पर चटकारे लिए जा रहे हंै कि असल बात तो दवा ना लेने के चलते कम होती याददाश्त की है...संभालों इसे।


आपने तो पापूलर कर दिया

हाल ही में एक राजनीतिक दल में सताए गए नेता ने अपने ही उम्मीदवार के खिलाफ मोर्चा खोल डाला। मोर्चा भी पूरे पोल खोल अंदाज में। इतना ही नहीं नेताजी ने पक्के पैर हो लिखित शिकायत करते हुए, इन साइड स्टोरी भी बना डाली अपने दल बदलु होने को अपनी योग्यता बताते हुए नेता जी दावा भी ठोक डाला कि जब वे अपने आज के विरोधी के करीबी होते थे तो बहुत से लोग रात में आ कर हाजरी भरते और दिन में अपनी पार्टी के लिए नारेबाजी किया करते थे, अगर उनका मुंह खुलवाया गया तो कोई नहीं बचेगा। पार्टी चाहे तो कारण बताओ नोटिस जारी कर सकती है। वहीं आरोप झेल रहे नेताजी ने भी राजनीतिक दांव खेल सारा पासा पलटा दिया कहा आपने तो शिकायत कर हमारा काम आसान कर दिया। शिकायत ने तो और पापूलर कर दिया है।


जाओ कहीं भी बात बस चुनाव की

विधान सभा चुनावों केलिए चल रहे नामांकन पत्र भरने के दौर में आप कहीं भी चले जाएं, आपको चुनावी विश्लेषक मिल जाएंगे। विवाह, किटी अथवा मकान के उदघाटन के लिए होने वाले समारोहों में सजी हर मेज पर जहां राजनीति की बिसात बिछी है वहीं बच्चे के बर्थ डे से लेकर बुजुर्ग के संस्कार तक में शामिल होने वाले भी अपना एजेंडा साथ लेकर घर से निकलते हैं और संस्कार में जाते ही सबसे पहले अपनी आडियंस तलाश कर कार्रवाई शुरु कर देते हैं। रीति रिवाज के विपरीत देहांत को मौसम और उम्र से जोड़ सारी बात एक ही सांस में निपटा दी जाती है और फिर चुनाव, चुनाव और चुनाव की रट शुरु हो जाती है।

अब नहीं जलते संतों के लाटू

पर्ची से हथियार और लड्डू से लंगर तक पर अपना डंडा चलाने वाले चुनाव आयोग ने पोस्टर व प्रतिमाओं को तो लपेट लिया पर अभी आत्मा से परमात्मा का मिलन आदर्श चुनाव आचार संहिता से परे है। ऐसे ही प्रतिष्ठित व्यक्ति के यहां हुए देहान्त पर अफसोस प्रकट करने वालों की कतार लगी हुई थी। सेकेंड लाइन नेताओं का भी खासा जमावड़ा लगा। उम्मीदवार भी पहुंचे पर आयोग कहीं उन्हें देखकर खर्चा ना जोड़ दे ऐसे में च्यादा देर नहीं ठहरे। वहीं हर तरफ चुनावी खर्च पर चल रही चर्चा में यह भी बताया गया कि यहां आकर सभी व्यक्ति संत हो जाते हैं और और हर आत्मा महान हो जाती है,पर किसी का लाटू यहां आते ही बुझ जाता है तो किसी का थोड़ी देर बाद तो किसी का जल्दी, और बाकी का शमशान से निकलते ही।


आबजर्वेशन है, तरीके से क्या लेना

चुनाव आयोग के डंडे तले हर तरफ बजते हूटर आबजर्वर के आने की आहट दे देते हैं। आम आदमी को हालांकि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता पर चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार, उनके रणनीतिकार और कट्टर समर्थकों को अंदर तक डरा देते हैं। संभव है आबजर्वरों को इस बात का अहसास हो लेकिन दिन भर चुनाव आयोग का डंडा चलाते चलाते वे भी बोर होने लगे हैं। ऐसे ही एक अधिकारी दिन में लाटरी का टिकट लेने से लेकर शहर के दशकों पुराने परिचित की तलाश में निकल पड़े। सवाल उठा तो बताया गया कि आबजर्वर हैं, आबजर्वेशन हो रही तरीके से क्या लेना। अरे भाई बात अगर यही है तो लाल बत्ती से भी क्या लेना वैसे ही कर लो।

मंहगाई है... रेट भी दोगुने हो गए हैं

निसंदेह पिछले विधान सभा चुनावों के बाद से मंहगाई खासी बढ़ी है, लेकिन मंहगाई का असर करीब तीन साल पहले हुए लोक सभा चुनावों के बाद से च्यादा दिखाई दे रहा है और मुद्रास्फीति के वास्तविक आंकड़ों का हवाला शहर के एक प्रोफेशनल व्यक्ति ने इन्हीं चुनावों में फीड बैक के रूप में दिया तो पुराना ग्राहक भी दौड़ गया। बताया गया कि आम भाषा के सेवा शुल्क को कंसलटेंसी चार्जेज बताने वाले जनाब ने जब दाम साढ़े चार गुना बताए और साथ ही कहा कि दो गुने दाम तो मंहगाई से वैसे ही हो जाते हैं। अब तो रेट भी दोगुने हो गए हैं। बाकि सरचार्ज है।

पटियाला जिले में मतदान से चार दिन पहले के हालात, punjab election, trends, 4 days before election


 
कांग्रेस- 4 पटियाला शहर, पटियाला ग्रामीण, नाभा, सनौर
अकाली-4 समाना, शुतराणा, घनौर, राजपुरा

कड़ा मुकाबला- घनौर, राजपुरा, सनौर


पिछला रिकार्ड
कांग्रेस-6 पटियाला शहर, पटियाला ग्रामीण, समाना, शुतराणा, सनौर, घनौर, नाभा
भाजपा- 1 राजपुरा
 अकाली- 1 बनूड़ अब डेरा बस्सी हुई




1 पटियाला शहर
मुकाबला एकतरफा व कैप्टन अमरिंदर के पक्ष में है। 

अकाली उम्मीदवार सुरजीत सिंह कोहली व उनके मेयर पुत्र की ओर से भी हल्का प्रचार ही किया जा रहा है। मेयर एक घंटे में एक ही स्थान पर जा रहे हैं, जबकि कैप्टन अमरिंदर की बेटी रोजाना और पत्नि एक दिन छोड़ कर आ रही हैं।

2 पटियाला ग्रामीण
मुकाबला त्रिकोणीय पर कांग्रेस के ब्रहम महिंदरा की बढ़त

निर्दलीय सतबीर सिंह खटड़ा के आक्रमक प्रचार के चलते ग्रामीण व युवा वर्ग का वोट बैंक अकालियों कुलदीप कौर टोहड़ा के हाथ से फिसल रहा है, शहर में रूझान उन्हें समझ नहीं आ रहा। जबकि ब्रहम महिंदरा शहर के त्रिपड़ी टाउन में बहावलपुर बिरादरी के अलावा पुराने लोगों को साथ लेने में सफल हो गए हैं।  

3 समाना
अकाली उम्मीदवार सुरजीत रखड़ा बढ़त बनाए हुए हैं। 

कांग्रेस के रणइंद्र सिंह अपने बठिंडा क लोगों को साथ लेने के अलावा दो पूर्व अकालियों पूर्व विधायकजगतार सिंह राजला और गुरकीरत सिंह थूही को साथ लिए घूम रहे है। उनकी उम्मीद परनीत कौर पर ही टिकी है जबकि रखड़ा घबराए हुए जरूर हैं और बेहद संभल कर कदम रख रहे हैं।  

4 सनौर
मुकाबला फंसा है कांग्रेस के लाल सिंह परेशान

अकाली तेजिदंर पाल संधू ने घाघ सियासतदान कांग्रेस के लाल सिंह को कड़ी टक्कर दे रखी है। उम्मीद के विपरीत परीसीमन के बाद जुड़े गांवों में लाल सिंह कमजोर हैं तो पुराने क्षेत्र में उनके विरोध में भी आवाजें आ रही  हैं। इस बार अकाली दल से कोई भी बागी नहीं है।

5 शुतराणा

अकाली दल के पक्ष में हवा बनने लगी
 
कैप्टन अमरिंदर की रैली से उम्मीदें लगाए बैठे निर्मल सिंह शुतराणा दो बार भावनाओं के सहारे जीते हैं लेकिन इस बार अकाली दल का टिकट चुनाव, बनिंदर कौर लूंबा, खासा सही साबित हो रहा है। अकाली बहुल मानी जाती सीट पर परनीत कौर के आने के बाद से हालात बदले रहे थे पर अब सुखबीर का असर दिख रहा है। एसओआई मुद्दा बन रही है।

6घनौर
मुकाबला त्रिकोणीय, गणित अकालियों के पक्ष में आने लगा

अकाली दल के बागी हुए और कैप्टन अमरिंदर के पुराने सहयोगी भाउ भाईचारा के प्रधान बलविंदर सिंह सैफदीपुर ने दोनों के समीकरण बिगाड़ रखे हैं। परीसीमन के बाद दो साल पहले तक अकाली दल के लिए पक्की समझी जा रही सीट का गणित अब अकालियों के पक्ष में आरहा है। भाउ भाईचारा कांग्रेस के वोट ज्यादा तोड़ रहा है, कामरेड व जसजीत रंधावा के समर्थक मदन लाल जलालपुर से दूरी बनाए हुए हैं।

7 राजपुरा
भाजपा के राजखुराना असहज पर अब हालात पक्ष में

बहावलपुरी बिरादरी में कुछ लोगों की नाराजगी अभी दूर नहीं हुई, कांग्रेस के कंबोज पर लगा बाहरी का ठप्पा अब हल्का पड़ गया है, आसपास के गांवों विशेष रूप से बनूड़ के पास, में कांग्रेस को समर्थन मिल रहा है।    

8 नाभा

लोगों को नही है दिलचस्पी, हवा कांग्रेस के पक्ष में

दोनों ही उम्मीदवारों के बाहर से आने पर स्थानीय वोटर को दिलचस्पी नहीं है। कांग्रेस के साधु सिंह धर्मसोत का खुला विरोध नहीं है वहीं अकाली दल में लालका को टिकट ना दिया जाना चर्चा में है।    

पटियाला जिले में मतदान से दस दिन पहले के हालात,punjab election, trends, 10 days


कांग्रेस- 2 पटियाला शहर, पटियाला ग्रामीण
अकाली-2 समाना, शुतराणा
मुकाबले में- 3 सनौर, घनौर, राजपुरा
सुस्त रुझान- 1 नाभा

पिछला रिकार्ड
कांग्रेस-6 पटियाला शहर, पटियाला ग्रामीण, समाना, शुतराणा, सनौर, घनौर, नाभा
भाजपा- 1 राजपुरा
 अकाली- 1 बनूड़ अब डेरा बस्सी हुई




1 पटियाला शहर
मुकाबला एकतरफा व कैप्टन अमरिंदर के पक्ष में है। 

अकाली उम्मीदवार सुरजीत सिंह कोहली व उनके मेयर पुत्र की ओर से भी हल्का प्रचार ही किया जा रहा है। मेयर एक घंटे में एक ही स्थान पर जा रहे हैं, जबकि कैप्टन अमरिंदर की बेटी रोजाना और पत्नि एक दिन छोड़ कर आ रही हैं।

2 पटियाला ग्रामीण
मुकाबला त्रिकोणीय पर कांग्रेस के ब्रहम महिंदरा की बढ़त

निर्दलीय सतबीर सिंह खटड़ा के आक्रमक प्रचार के चलते ग्रामीण व युवा वर्ग का वोट बैंक अकालियों कुलदीप कौर टोहड़ा के हाथ से फिसल रहा है, शहर में रूझान उन्हें समझ नहीं आ रहा। जबकि ब्रहम महिंदरा शहर के त्रिपड़ी टाउन में बहावलपुर बिरादरी के अलावा पुराने लोगों को साथ लेने में सफल हो गए हैं।  

3 समाना
अकाली उम्मीदवार सुरजीत रखड़ा बढ़त बनाए हुए हैं। 

कांग्रेस के रणइंद्र सिंह अपने बठिंडा क लोगों को साथ लेने के अलावा दो पूर्व अकालियों पूर्व विधायकजगतार सिंह राजला और गुरकीरत सिंह थूही को साथ लिए घूम रहे है। उनकी उम्मीद परनीत कौर पर ही टिकी है जबकि रखड़ा घबराए हुए जरूर हैं और बेहद संभल कर कदम रख रहे हैं।  

4 सनौर
मुकाबला फंसा है कांग्रेस के लाल सिंह परेशान

अकाली तेजिदंर पाल संधू ने घाघ सियासतदान कांग्रेस के लाल सिंह को कड़ी टक्कर दे रखी है। उम्मीद के विपरीत परीसीमन के बाद जुड़े गांवों में लाल सिंह कमजोर हैं तो पुराने क्षेत्र में उनके विरोध में भी आवाजें आ रही  हैं। इस बार अकाली दल से कोई भी बागी नहीं है।

5 शुतराणा

कांग्रेस के पक्ष में अभी हवा नहीं
कैप्टन अमरिंदर की रैली से उम्मीदें लगाए बैठे निर्मल सिंह शुतराणा दो बार भावनाओं के सहारे जीते हैं लेकिन इस बार अकाली दल का टिकट चुनाव, बनिंदर कौर लूंबा, खासा सही साबित हो रहा है। अकाली बहुल मानी जाती सीट पर परनीत कौर के आने के बाद से हालात बदले हैं।

6घनौर
मुकाबला त्रिकोणीय, गणित समझना मुश्किल 

अकाली दल के बागी हुए और कैप्टन अमरिंदर के पुराने सहयोगी भाउ भाईचारा के प्रधान बलविंदर सिंह सैफदीपुर ने दोनों के समीकरण बिगाड़ रखे हैं। परीसीमन के बाद दो साल पहले तक अकाली दल के लिए पक्की समझी जा रही सीट का गणित समझना अब मुश्किल है। लेकिन भाउ भाईचारा कांग्रेस के वोट ज्यादा तोड़ रहा है।

7 राजपुरा
भाजपा के राजखुराना असहज हुए

बहावलपुरी बिरादरी में कुछ लोगों की नाराजगी अभी दूर नहीं हुई, कांग्रेस के कंबोज पर लगा बाहरी का ठप्पा अब हल्का पड़ गया है, आसपास के गांवों में कांग्रेस को समर्थन मिल रहा है।    

8 नाभा

लोगों को नही है दिलचस्पी

दोनों ही उम्मीदवारों के बाहर से आने पर स्थानीय वोटर को दिलचस्पी नहीं है। कांग्रेस के साधु सिंह धर्मसोत का खुला विरोध नहीं है वहीं अकाली दल में लालका को टिकट ना दिया जाना चर्चा में है।    

पर्यावरण बचाने बना मोर्चा पर चर्चा सीमित, punjab election, issues, enviornment,


 मुद्दा पर्यावरण
 भूपेश चट्ठा, पटियाला
हम यूरोप से डेढ़ सौ साल पीछे हैं, जिस इंडस्ट्री को वहां प्रदूषण के चलते बंद कर दिया गया उसे हमारे यहां भेजा जा रहा है और हम प्राकृतिक कानून के विपरीत काम कर रहे हैं, यही वजह है कि पर्यावरण में सुधार और जल संरक्षण की बजाए प्रदूषण का ग्राफ बढ़ रहा है। पंजाब का पर्यावरण बचा जल सरंक्षण को अनिवार्य करने और सभी राजनीतिक दलों में अलख जगाने पर्यावरण प्रेमी एक मंच पर आए जरूर हैं पर राजनीतिक दलों व चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों की ओर इस पर  इस पर चर्चा बिलकुल नहीं की जा रही है।

पंजाब का एकमात्र खनिज है पानी 
देश के हर राज्य में किसी ना किसी तरह के खनिज पदार्थ निकलते है, इसमें कोयला और पत्थर से लेकर सोना और टंगस्टन, बिजली बल्ब का एलीमेंट, तक शामिल हैं और संबंधित राज्यों के चुनावों में हर बार मुद्दा जरूर बनते हैं। यह चाहे रायल्टी के लिए बने या फिर भ्रष्टाचार के रूप में, लेकिन इन पर चर्चा जरूर होती है। इन्हें संरक्षित करने, बचाने, संयम से प्रयोग करने के वायदे किए जाते हैं, पर पंजाब के एकमात्र खनिज पदार्थ पानी को बचाने की दिशा में कोई बात नहीं हो रही  है।
दिलचस्प है कि हिमाचल प्रदेश की ओर से पानी में से बिजली निकाल लेने और पंजाब को 'फोकाÓ पानी देने जैसे मुद्दों पर पंजाब में कभी चुनाव लड़े और जीते भी गए है पर पानी में मिल रहे जहर को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया गया।

प्राकृतिक स्रोत है मौसम व हवा

सर्दियों में कड़ाके की ठंड और गर्मियों में चिलचिलाती धूप, 0 डिग्री से 48 डिग्री के बीच झूलने वाले पंजाब की आबोहवा ही कुछ ऐसी है कि यहां साल में तीन दमदार फसलें ली जा सकती है, लेकिन प्राकृति के अंधाधुंध तरीके से किए गए दोहन का सिलसिला जारी है।

सब सोयल एक्ट पास कर भी लाभ नहीं

शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने क्या किया? और क्या नहीं? ये एक अलग मुद्दा हो सकता है पर  वर्तमान सरकार धान की फसल की बिजाई और रोपाई का समय सुनिश्चित करने बनाए गए कड़े कानून का लाभ नहीं ले सकी है। दिलचस्प है कि शुरु में खेत मजदूरों की कमी का हवाले दे आलोचना का शिकार हुए इस कानून की अब किसान भी तारीफ कर रहे हैं। किसानों को जल सरंक्षण का आर्थिक लाभ हर तीसरे साल होने वाले बोर के खर्च से बच कर मिला है।

पराली का जलना जारी

धान की पराली को जलाने से होने वाले दुष्प्रभावों पर जागरुकता तो पिछले चुनावों से इन चुनावों के बीच आ गई है पर पराली जलाने का सिलसिला अभी जारी है। याद रहे कि दो साल पहले की तुलना में पिछले अक्टूबर में पराली जलाने पर किसानों पर दर्ज होने वाले मामले नगण्य ही रहे हैं। जबकि एलर्जी व सांस के मरीजों, बच्चों व बुजुर्गो को कई क्षेत्रों में मिली राहत का 'लाभÓ राजनीतिक दल नहीं ले रहे हैं। 

'वातावरण अते समाज बचाओ मोर्चाÓ  

हालांकि इस बार चुनावों से ठीक पहले प्रदेश के पानी और खुराक को जहर मुक्त करने 'वातावरण अते समाज बचाओ मोर्चाÓ का गठन किया गया है। सामूहिक नेतृत्व में चलने वाले इस मोर्चे में खेती विरासत मिशन, कुदरत मानव केंद्रीय सभा, लोक लहर, इंटरनेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी, पंजाबी सत्थ, भारतीय किसान यूनियन के तीन घटक सिद्धूपुर, डकोंदा, राजेवाल जैसे संगठन शामिल हैं। नेतृत्व करने वालों में बाबा बलबीर सिंह सींचेवाल, ज्ञानी केवल सिंह, डा. जीपीआई सिंह, प्रो. जगमोहन सिंह, उमेंद्र दत्त जैसे नाम शामिल हैं।
 

प्रदूषित पानी पार्टी या विचारधारा नहीं देखता

खेती विरासत मिशन के डायरेक्टर उमेंद्र दत्त कहते हैं कि जिस पानी को पीकर केंसर हो रहा है वो किसी की पार्टी या विचारधारा नहीं देखता। यह किसी को भी हो सकता है और इसके लिए जिम्मेदार भी सभी होंगे। पंजाब में गुजरात व राजस्थान से च्यादा डार्क जोन बन गए हैं। राच्य में जो भी सरकार बने वो पर्यावरण इमरजेंसी घोषित करे और सबसे पहले हमारे प्राकृतिक जल संसाधन बचाने की दिशा में जल संरक्षण अधिनियम समय बद्ध तरीके से लागू करे। 

चुनाव आयोग से मांग 

चुनावी घोषणा पत्र में औपचारिकता के रूप में रखे जाने वाले आदर्श स्लोगनों या लच्छेदार बातों को बाद में राजनीतिक दल भूल ना जाएं इसके लिए पहली बार आस्तित्व में आए इस मोर्चे ने चुनाव आयोग से मांग की है कि राजनीतिक दलों की ओर से जारी होने वाला घोषणा पत्र कानूनी दस्तावेज हो और इसे लागू ना करने वाले दलों को अगला चुनाव लडऩे से रोकने का प्रावधान भी होना चाहिए।  

प्राकृति के नियम के विपरीत करते हैं काम

मालवा के पानी में यूरेनियम के अंश पाए जाने की यूरोप के अध्ययन को सामन रखने वाले कम्यूनिटी मेडिसन के विशेषज्ञ व जाने माने पर्यावरणविद् डा. अमर सिंह आजाद कहते हैं कि पंजाब के अलावा हरियाणा व हिमाचल प्रदेश की इंडस्ट्री का टॉक्सिक जल, कई तरह के हैवी मैटल व रसायनिक तत्वों के साथ और यहां के शहरों का सीवरेज लगातार दरिया व बरसाती नालों में उड़ेला जा रहा है। जो प्राकृति के नियम के विपरीत है। जो पानी एक बार ले लिया जाता है, उसे वापिस नदी अथवा नाले में नहीं डाला जाता, उस पानी का शोधन कर खेती में सिंचाई के लिए प्रयोग करना होता है। लेकिन यहां पर सारी इंडस्ट्री लगाई ही नदी किनारे जाती है, सरकार सोई रहती है और खुद अनुमति देती और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अपनी सारी उम्र में एक भी इंडस्ट्री अथवा प्रदूषण फैलाने वाले को सजा नहीं दिलवा पाता।

जिस पानी की खाते कसमें वो कत्ल करने लगा

सोशल साइंसेज एंड हेल्थ फोरम डा. पीपी खोसला कहते हैं कि पंजाब के जिस पानी की कसमें खाई जाती थी अब वो पानी कत्ल करने लगा है। जिस पर कभी लोक गीत लिखे जाते थे, वो बहता पानी तो कई साल पहले गंदा कर दिया अब तो रिस कर धरती के नीचे पहुंचा पानी बीमारियां दे रहा है। 

आने वाली सरकार को परामर्श

 
-आने वाली सरकार को हर दिशा में काम करना होगा
-नियम कानून को सख्ती से लागू करने के अलावा
-घटिया और पुरानी पड़ चुकी तकनीक को पंजाब आने से रोकना होगा, जिससे शराब फैक्ट्रीयों की बाढ़ ना आए, कोयला आधारित थर्मल प्लांट ना आएं।
-पेस्टीसाइड व रसायनिक खादों का प्रयोग कम कर प्राकृतिक खेती की ओर ले जाना 
-शहरों में बड़े पैमाने पर सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने होंगे
-रेन वाटर हारवेस्टिंग और वाटर रिचार्जिंग अनिवार्य हो
-प्राकृतिक स्रोतों के आसपास के इलाकों को अवैध कब्जों से मुक्त करवाए
-जल स्रोतों में उड़ेले जाने वाले जहर को रोका जाए
-पुराने स्रोतों को पुर्नजीवित किया जाए।

 तभी जीवन चक्र में प्रवेश कर चुके टॉक्सिक ततव निकाले जा सकेंगे अन्यथा कैंसर के रूप में ये फूटते रहेंगे।

मुकाबला अनुभव और युवा विचारों के बीच, punjab election, sanour, constituency,


 विधान सभा क्षेत्र :-सन्नौर
कांग्रेस-लाल सिंह
शिअद-भाजपा-तेजिंदर पाल सिंह संधू
 वोटर:-एक लाख 75 हजार 409


भूपेश चट्ठा, पटियाला
पुराने विधान सभा क्षेत्र डकाला के अधिकांश हिस्सों से बने सन्नौर क्षेत्र को चाहे नया नाम मिल गया हो लेकिन यहां की समस्याएं व चुनावी मुद्दों में कोई च्यादा बदलाव नहीं आया है, अलबत्ता हांसी-बुटाना नहर के नाम से एक नया जिन्न जरूर जुड़ गया है। हालांकि परंपरागत प्रतिद्विंयों की बजाए इस बार मुकाबला अनुभव और युवा विचारों के बीच होने जा रहा है।
तेजिंदर सिंह संधू
ताकत:-
परिवार ने दिए आठ एमएलए, टकसाली अकाली वोट, युवा शिक्षित चेहरा, प्रबंधन कुशलता, पहला चुनाव होने के चलते पार्टी में विरोध नहीं, सभी विरोधी अन्य क्षेत्रों में एडजस्ट
कमजोरी:-
देरी से चुनाव प्रचार शुरू, प्रत्यक्ष चुनाव में भागीदारी पहली बार, मुकाबला 25 सालों से क्षेत्र में डटे घाघ सियासतदान से
किन मुद्दों पर लड़ रहे हैं:-
वर्तमान सरकार की ओर से किए गए विकास कायों के अलावा जनता के सामने चार बार विधायक और दो बार के मंत्री लाल सिंह की ओर से समस्याएं हल ना करवाने की बात रखेंगे। क्षेत्र में पहला गल्र्स कालेज खुलवाना, रोजगार दिलवाने देवीगढ़ रोड पर फोकल प्वाइंट बनवाना और पिछड़े क्षेत्र की सभी सुविधाएं व लाभ दिलवाना, तकनीकि स्र्वे करवा कर बाढ़ की समस्या का स्थायी उपाय करना।

लाल सिंह: फोटो 28
ताकत:-
चार दशकों से क्षेत्र की राजनीति में गहराई से जुड़े हैं, ऊर्जा मंत्री रहते हुए बिजली ग्रिड अंडर लोड किए, मंत्री रहते हुए सड़कें दुरुस्त की, चुनाव लडऩे का लंबा अनुभव, कंबोज बिरादरी का समर्थन
कमजोरी:-
वायदे पूरे नहीं कर सके, बाजीगर व हरिजनों जातियों के लोगो को चार-चार मरले के प्लाट देना, लंबे समय से पंचायती जमीनों पर बसे लोगों को वो अलाट कर किश्तों में मुआवजा लेना, पिछड़े क्षेत्र से निकाले गए गांवों का मुद्दा नहीं उठा सके।

किन मुद्दों पर लड़ रहे हैं चुनाव:-

 घग्गर नदी को चैनेलाइज करने वर्तमान सरकार की असफलता, केंद्र के पैसे का प्रयोग ना करना, जिस तरह से बिजली के मामले में ओवर लोड बलबेड़ा ग्रिड पर से दवाब कम हुआ वैसे ही सारा क्षेत्र करना, मीरांपुर चौ, टांगरी, मारकंडा व पटियाला की राव जैसे बरसाती नालों की पिछली सरकार के समय की गई खुदाई समान सफाई व किनारों की मजबूती करना, एयरकंडीशंड आधुनिक सब्जी मंडी बनवाने का श्रेय लेना।