Tuesday, 17 April 2012

बीस साल पहले ही भांपा, पराली का कहर, 20 years ago he anticipated, burning paddy straw will harm productivity



 पृथ्वी के प्रहरी-2
-पर्यावरण वैज्ञानिक डा. चरणजीत सिंह नाभा ने  90 के दशक के आरंभ में पराली जलाने पर 'कृषि वैज्ञानिकों के विरोधÓ के बावजूद चेताया था
-20 वीं सदी आने पर पीपीसीबी ने डिप्टी कमिश्नरों को धारा 144 के तहत प्रतिबंध लगाने को लिखना शुरु किया
भूपेश चट्ठा, पटियाला
60 के दशक के मध्य में हरित क्रांति शुरु हुई तो पंजाब को खरीफ के मौसम की सबसे अधिक व नगद लाभ देने वाली धान की फसल मिल गई। पंजाब की संपन्नता का कारण भी यही है, ऐसे में धान की फसल के खिलाफ बोलने वाला स्वत: 'विलैनÓ हो जाता था।
याद रहे कि खरीफ की फसल में धान उगाने के बाद इसकी कटाई अक्टूबर के तीसरे सप्ताह तक जारी रहती है, साधारण किस्मों के अलावा बासमती उगाए जाने की सूरत में कटाई नवंबर तक भी खिंच जाती है। जबकि रबी की मुख्य फसल गेहूं की बिजाई करने का समय नवंबर ही होता है। ऐसे में धान के बाद खेत को खाली कर साफ करने के लिए धान की पराली को जलाने के अलावा कोई चारा भी मौजूद नहीं था। इस पर पंजाबी समाज में खेत में राख डालने को दवा के रूप में देखा जाता था। ऐसे में पराली को जलाने का नुकसान किसी को दिखाई नहीं दे रहा था।
धान विकास के साथ धान विनाश भी ले आया। इसी विनाश का अहसास पर्यावरण वैज्ञानिक डा. चरणजीत सिंह नाभा को बीस साल पहले ही हो गया था, संभव है कुछ और लोगों को यह ज्ञान प्राप्त हुआ हो लेकिन पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में कार्यरत डा. चरणजीत सिंह ने पराली जलाए जाने का मामला पहली बार 90 के दशक के आरंभ में ही उठाना शुरु कर दिया।

 डा. चरणजीत सिंह नाभा ने पराली जलाने पर 'कृषि वैज्ञानिकों के विरोधÓ के बावजूद चेताया था कि हम लोग अपने मित्र कीटों के साथ धरती के नीचे खाद बनाने वाली प्राकृतिक फैक्ट्री को भी हर साल पराली के साथ जला रहे हैं। निकट भविष्य में चाहे असर ना दिखे लेकिन लंबे समय में पराली जलाने से पर्यावरण को होने वाले नुकसान के अलावा धरती की उर्वरा शक्ति भी क्षीण हो जाएगी।

पीपीसीबी की बैठकों में मामला उठाने व इक्का दुक्का समाचार पत्रों में आर्टिकल लिखने के साथ ही डा. चरणजीत चर्चा में आ गए। विरोध भी हुआ पर लोगों ने इस दिशा में सोचना शुरु कर दिया। बीस साल पुरानी बातें याद कर डा. चरणजीत कहते हैं कि अगर आप प्राकृति के साथ चल कर अपना विकास करते हैं तो विकास कायम रहेगा अन्यथा छलावा ही है।
दिलचस्प है कि 20 वीं सदी आने पर पीपीसीबी ने डिप्टी कमिश्नरों को धारा 144 के तहत पराली को जलाए जाने पर  प्रतिबंध लगाने को लिखना शुरु किया। लेकिन तब भी कभी किसी पर कोई मामला दर्ज नहीं किया जाता था। यहां तक कि पराली जाने से भड़की आग से अन्य खेतों में हुए नुकसान का मुआवजा भी सरकारी खाते से निकल जाता था। इसके बाद भड़की आग पर फायर ब्रिगेड  बुलाने वालों की सूची तैयार करने और कार्रवाई करने के निर्देश जारी होने लगे। बीस साल पहले का युवा वैज्ञानिक डा. चरणजीत आज पीपीसीबी में डायरेक्टर लोक संपर्क हैं और कहते हैं कि बीस सालों में मात्र बीस फीसदी सफलता ही हासिल हुई है, लेकिन निराश नहीं है।


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