मीरी-पीरी का सिद्धांत देने वाले पंजाब में धर्म और राजनीति को अलग नहीं किया जा सकता और पटियाला प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी है, ऐसे में उत्तर भारत के प्रसिद्ध माता श्री काली मंदिर का नाम चुनावों से ठीक पहले आना तय माना जाता है। दिलचस्प है कि इस बार मामला किसी लंबित मांग के पूरा न होने की वजह से नहीं है, बल्कि लंबे समय बाद पूरी हुई मांग से तकनीकी खामी निकाल कर खड़ा किया जा रहा है।
माता काली मंदिर के सरोवर को भव्य बनाने का मुद्दा पिछले तीन विधानसभा चुनावों में शहर की राजनीति को गर्माता रहा है। दो चुनाव सरोवर निर्माण को लेकर लड़े गए, तो पिछले लोकसभा चुनाव में पार्किंग मुद्दा बना। एक आत्मदाह भी हुआ। इस बार सरोवर का जिन्न इसके वाटर ट्रीटमेंट प्लांट को लेकर बाहर आया है। 15 दिन पहले चालू हुए प्लांट पर आल इंडिया हिंदू सुरक्षा समिति के प्रचार मंत्री संजीव बबला का कहना है कि खड़े पानी को साफ करने का कोई बेहतर साधन नहीं है। पानी की निकासी हो और नया पानी आता रहे, तभी ठीक है।
थापर यूनिवर्सिटी के शोध छात्रों ने प्रयोग के तौर पर ट्रीटमेंट प्लांट लगाया है। पानी को हिलाकर साफ करने के प्रयास से उठती दुर्गध सरोवर के पास खड़ा भी नहीं होने दे रही। ऐसे ही मंदिर सरोवर के लिए नहरी पानी की मांग करने वालों की कमी नहीं है।
मंदिर से करीब से जुड़े भाजपा के प्रदेश इनवेस्टर सेल के उप प्रधान वरिंदर खन्ना कहते हैं कि सरोवर का तल ऊपर उठाकर पहले गलती की, फिर अलग अलग जगह की मिट्टी लाने के नाम पर किए गए तजुर्बे फेल हुए। अब काई सामने दिखाई देती है तो पानी में हाथ डालने का मन नहीं करता। वे याद करते हैं कि जब गुरुद्वारा श्री दुख निवारण साहिब के सरोवर से पानी गुरुद्वारा श्री मोती बाग ले जाया गया तो भाखड़ा नहर का यही पानी यहां लाने पर पूरी तरह से सहमति हो गई। हिंदुओं के सरोवर के लिए पानी सड़क पार नही कर सका, जबकि ये मंदिर सरकारी है।
उधर, मंदिर के प्रबंधन को बनाई गई जिला प्रशासन की कमेटी के सदस्य रवि एस.आहलुवालिया बताते हैं कि 15 दिन पहले ही वाटर ट्रीटमेंट प्लांट चलाया गया है और अभी यह परीक्षण स्तर पर है। 30 फीसदी सफाई हुई है। पहली बार चलाने पर पूरे सरोवर की सफाई में डेढ़ महीना लगेगा। इसके बाद ये लगातार चलता रहेगा, उसके बाद कोई दिक्कत नहीं होगी। चलते पानी के सवाल पर वे कहते हैं कि दो ट्यूबवेल लगे हैं जो लगातार चलेंगे। सरोवर में पानी ज्यादा होने पर स्पिल ओवर हो राजिंद्रा टैंक में चला जाएगा। पानी में काई व दुर्गध पर उनका कहना है कि यहां एक्वेरियम जैसा नहीं है। 4.84 लाख रुपये के इस प्लांट के अलावा 15 से 20 फीट ऊंचाई तक पानी उछालने वाले फव्वारे लगाने का प्रस्ताव है। इससे पानी में आक्सीजन की मात्रा स्वत: बढ़ेगी, जो मछलियों के लिए जरूरी है। शेष सफाई मछलियां करती रहेंगी।
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