Tuesday, 20 September 2011

अवैध शराब का ठेका बंद, 50 लाख की चपत, excise, revenue, loss


उप मुख्य संवाददाता, पटियाला
नगर निगम की सीमा में अनधिकृत रूप से शराब बेच रहे गुड़ मंडी स्थित ठेके को आबकारी विभाग ने बंद करवा अगली कार्रवाई शुरू कर दी। हालांकि यह ठेका अब तक राज्य सरकार के आबकारी राजस्व को 50 लाख रुपये से ज्यादा की चपत लगा चुका है।
नगर निगम सीमा में शराब बेचने के लिए चार समूह बनाए गए हैं और 10 से 12 ठेकों के हर समूह के लिए लाइसेंस फीस 12.50 करोड़ रुपये है। अंग्रेजी व देसी का एक ठेका कम से कम एक करोड़ रुपये सालाना फीस पर आया है। ऐसे में एक अप्रैल से 20 सितंबर तक साढ़े पांच महीने से ज्यादा चले इस ठेके ने राजस्व को जमकर चूना लगाया है। हालांकि अधिकारियों को इस बाबत पहले भी शिकायतें मिलीं पर विभाग में मौजूद कुछ लोगों के चलते शराब बेचने वाले ठेकेदार सफलतापूर्वक आंख मिचौली खेलते रहे। विभाग के ही एक आला अधिकारी कहते हैं कि जब जाते थे तो बंद मिलता था पर बाद में फिर से खुला होने की शिकायत आ जाती। वहीं हाल ही में आबकारी एवं कराधान अधिकारी का कार्यभार संभालने वाले एसके गर्ग कहते हैं कि ठेका बंद है और अगली कार्रवाई की जा रही है।
दूसरी ओर कारोबार से जुड़े लोग और विभागीय सूत्र बताते हैं कि शहर व आसपास के क्षेत्रों में अधिकृत रूप से चल रहे शराब के कारोबार की लंबी फेहरिस्त है। इसमें सरहिंद रोड पर हरदासपुर के लिए मंजूर ठेका शहरी सीमा में गांव बारन में चल रहा है। आबकारी का ग्रामीण क्षेत्र में लाइसेंस शुल्क 35 लाख रुपये है तो शहर में एक करोड़ रुपये। ऐसे ही रेलवे स्टेशन पर विभाग से एक ठेका पास है पर अंग्रेजी व देसी के नाम पर दो अलग-अलग ठेके चलाए जा रहे हैं और दोनों पर दोनों तरह की शराब बिक रही है। इनमें एक ठेका पूरा तरह अवैध है जिससे राज्य सरकार को लाइसेंस का चूना तो लग ही रहा है उधर अन्य राजस्व की हानि भी हो रही है।

बांधों का भराव सीजन समाप्त, नीचे आने लगा जल स्तर, dam reservior, season is over,



भूपेश चट्ठा, पटियाला
मानसून की लगभग वापसी के साथ बांधों का भराव सीजन मंगलवार को समाप्त हो गया। इसके साथ ही कम हुई पानी की आवक से बांधों के जल स्तर के नीचे आने का सिलसिला भी शुरू हो गया है।
उत्तर भारत के सबसे बड़े भाखड़ा बांध में पानी की आवक कम हो कर 29 हजार 352 क्यूसिक रह गई है, जबकि एक दिन पहले तक यह 32 हजार 108 क्यूसिक थी। बांध से बिजली बनाने के लिए रोजाना 32हजार 300 क्यूसिक पानी छोड़ा जा रहा है। और बांध का जलस्तर 24 घंटों में 1680.94 फीट से कम हो 1680.80 फीट पर आ गया है।
पौंग बांध में पानी की आवक 19 हजार 34 क्यूसिक से गिरकर 15हजार 911 क्यूसिक रह गई है। हालांकि यहां से बिजली बनाने के लिए प्रतिदिन छोड़े जा रहे 11 हजार क्यूसिक पानी के चलते जल स्तर 1390.54 फीट पर बना हुआ है।
इसी प्रकार रावी पर बने रणजीत सागर बांध की क्षमता 527.91 मीटर है लेकिन इससे काफी नीचे 525.06 मीटर पर रहा जलस्तर बीते 24 घंटों में घटकर 524.93 मीटर पर आ गया है। यहां भी रोजाना की आवक 23 हजार क्यूसिक से गिर कर 14 हजार क्यूसिक रह गई है जबकि यहां से हररोज 18 हजार क्यूसिक से अधिक पानी छोड़े जाने की वजह से इस बांध का जलस्तर नीचे आने लगा है।
दिलचस्प है कि 11 से 18 सितंबर के बीच भाखड़ा बांध से हर रोज चार हजार क्यूसिक पानी बिना बिजली बनाए फ्लड गेट खोल कर छोड़ा गया। आल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन इंजी. पदमजीत सिंह ने आज यहां इस बारे में पूछे जाने पर कहा कि इन सात दिनों में जितना पानी बहाया गया है उससे 350 लाख यूनिट बिजली बननी थी और न्यूनतम दरों पर इसका मूल्य सात करोड़ रुपये बनता है, जबकि पानी की कीमत नहीं लगाई जा सकती।
बकौल इंजी. पदमजीत सिंह अगर पिछले साल का भाखड़ा का जल स्तर 1681.53 फीट पर रखा गया था तो इस साल बांध की सुरक्षा को कौन सा खतरा हो गया है? कौन सी कमजोरी है? इतना ही नहीं बीबीएमबी की ओर से जारी की गई विज्ञप्ति में खतरे का निशान 1680 फीट बता दिया जाता है जबकि डिजाइन के अनुसार बांध में 1690 फीट तक पानी भरा जा सकता है।
याद रहे कि इससे पहले भी पौंग बांध के मामले में बीबीएमबी ने इसी सीजन में 1400 फीट के पौंग बांध के ऊपरी निशान से काफी पहले पानी छोड़ दिया और फिर रोककर 'भूल सुधार' की गई। पौंग बांध से छोड़े गए पानी के आंकड़े बताते हैं कि यदि थोड़ा संयम बरता होता तो न केवल पौंग बांध से बही 49 करोड़ यूनिट की बिजली बची होती अपितु सिंचाई के लिए पानी की भी बचत होती। पौंग बांध के स्पिल-वे गेटों को 14 अगस्त को खोला गया और 31 अगस्त तक 5.4 लाख क्यूसिक पानी नदी में उड़ेल दिया गया। इस पानी के साथ ही 396 मेगावाट क्षमता के बांध से बिजली के करीब 27 करोड़ यूनिट भी बह गए। पौंग पावर प्लांट से पानी नहीं गुजरा तो मुकेरियां हाइड्रो प्रोजेक्ट से भी 22 करोड़ यूनिट बनने से रह गए।

शराब बंदी सरकारी, चलते रहे मोबाइल ठेके, excise, dry day


भूपेश चट्ठा, पटियाला हर ड्राई-डे को गांधी जयंती कहने वाले पंजाबियों को शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के आदर्श चुनाव आचार संहिता से कोई खास फर्क नहीं पड़ा है। डिप्टी कमिश्नर की ओर से लागू की गई शराब बंदी को लगभग सरकारी साबित किया गया है। पुलिस व आबकारी विभाग की आंखों में धूल झोंकने वाली आंख मिचौली दिन भर चली। हालांकि दो दिन छकाने के बाद पटियाला पुलिस को देर शाम गुरबक्श कालोनी के ठेके के निकट से सफलता हाथ लगी है। दो दिन पहले तक पम्मी चिकन वाले के यहां काम करते तफज्जलपुरा में रहने वाले अनिल कुमार पर लाहौरी गेट थाने की पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है। उसके पास से छह पेटी देशी शराब की बरामद की गई है। अनिल कुमार की जमानत ले ली गई है। विभागीय सूत्रों व प्रत्यक्षदर्शियों अनुसार शनिवार सुबह करीब 11 बजे शराब के कारोबारियों ने अपना धंधा शुरू कर लिया। बताया गया कि सुबह बस स्टैंड के गेट के सामने कार्नर होटल के पास, अनारदाना चौक और सन्नौरी अड्डा के अहाते खुल गए, लेकिन दोपहर बाद तक यह बंद कर दिए गए। इस दौरान रेलवे स्टेशन के पास ठेके के इर्द गिर्द गतिविधियां जारी रही। शाम होते-होते रेलवे स्टेशन से गुरुद्वारा श्री दुखनिवारण साहिब की ओर जाती सड़क पर मौजूद ठेके पर गहमागहमी हो गई। अंदर बाहर दो तरफ से सप्लाई होती रही, जबकि देर सांय मॉडल टाउन गोल चक्कर के पास स्थित ठेके पर शराब बेचने का नजारा साफ तौर पर देखा जा सकता था। यहां दरवाजे पर बने रोशनदान से सप्लाई बदस्तूर जारी रही। सन्नौरी अड्डा और सैफाबादी गेट के ठेके भी लगभग इसी श्रेणी में आते हैं। 

ठेके सील, गड़बड़ी की होगी जांच : आबकारी एवं कराधान अधिकारी 

आबकारी एवं कराधान अधिकारी एसके गर्ग से संपर्क किए जाने पर उन्होंने कहा कि विभाग ने पूरी गंभीरता से ठेके सील करवाए हैं, फिर भी कहीं गड़बड़ है तो वह तुरंत जांच करवाते हैं। दूसरी ओर जिले में पुलिस ने बख्शीवाला में दो और नाभा में ऐसी ही चुनावी शराब बेचने के मामले दर्ज किए हैं।

Sunday, 18 September 2011

खास नहीं, आम हुआ पटियाला का मतदान, sgpc, election, voting

उप मुख्य संवाददाता, पटियाला
देश में लोकसभा के चुनाव हों या राज्य में विधानसभा के, पटियाला को प्रतिष्ठित चुनाव क्षेत्रों में रखा जाता रहा है। लेकिन शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की दस सीटों वाले पटियाला में इस बार चुनाव वीवीआईपी न होकर पूरी तरह से आम होकर रह गया है।
शिअद महासचिव प्रोफेसर प्रेम सिंह चंदूमाजरा का गांव चंदूमाजरा जिला फतेहगढ़ साहिब में चला गया तो उन्होंने भी पटियाला का रुख नहीं किया। राज्य सरकार में कभी नंबर दो की हैसियत रखने वाले तत्कालीन सहकारिता मंत्री कैप्टन कंवलजीत सिंह की मृत्यु के बाद जिले के इकलौते मंत्री भी एसजीपीसी चुनाव में मतदान नहीं कर पाए। अकाली दल के बनूड़ से विधायक जसजीत सिंह बन्नी अब डेराबस्सी के रास्ते मोहाली जिले के हो गए हैं।
पटियाला में अब सिख मतदाताओं के मामले में अकालियों के पास पूर्व मंत्री व पूर्व विधायक के रूप में पार्टी के विधानसभा क्षेत्र इंचार्ज ही रह गए हैं। इनकी फेहरिस्त हालांकि खासी लंबी है पर लाल बत्ती आधिकारिक रूप से न होने की स्थिति में वीवीआईपी की मुहर नहीं लग पाती।
राज्य में प्रदेश कांग्रेस के प्रधान कैप्टन अमरिंदर सिंह और विदेश राज्य मंत्री परनीत कौर ने गुरु नानक देव फाउंडेशन स्कूल स्थित पोलिंग स्टेशन में अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं किया। उनके अलग से बने मतपत्र 529 परनीत कौर और 530 कैप्टन अमरिंदर सिंह दोनों का ही स्याही लगने का इंतजार पूरा नहीं हुआ। पोलिंग बूथ नंबर 38 में मोतीबाग पैलेस से बनी चार वोटें एसजीपीसी चुनाव के लिए नोटीफिकेशन होने के बाद वोट बनवाई गई हैं। उनके पुत्र रणइंदर सिंह और राजमाता महिंदर कौर ने भी मतदान में भाग नहीं लिया।
कांग्रेस के दोनों दिग्गजों के मतदान से दूर रहने और इनमें से एक के नदारद तो दूसरे के शहर में रहने के बावजूद वोट न डालने के बाद कांग्रेसियों ने मानो अघोषित बायकाट ही कर दिया।

Friday, 16 September 2011

बारिश ने तबाह कर डाली धान की 1121 किस्म, bad weather, paddy,


-पॉलीनेशन नहीं होने से दाने बल्लियों में पूरे नहीं पड़ते: डा. सोहल
-पछेती को भी नुकसान पर अगेती के दाने बदरंग होने की संभावना बढ़ी
भूपेश चट्ठा, पटियाला
बल्लियां या धान की 'मुजंरेंÓ निकलने के ठीक उपर आई बारिश ने धान की पीएयू-1121 किस्म को लगभग तबाह कर डाला है, हालांकि कृषि विशेषज्ञों व पंजाब सरकार की ओर से इस किस्म को ना लगाने की सिफारिश की थी।
दुनिया भर में अपने सबसे लंबे चावल के लिए मशहूर धान की यह किस्म है तो साधारण लेकिन देखने में बासमती चावल का रंग रूप लिए होती है। अंतर सिर्फ इतना है कि इसमें बासमती जैसी खुशबू नहीं होती। इसके बावजूद दाम के मामले में ये साधारण धान की तुलना में दो से तीन गुना तक मंहगा बिकता है। खाड़ी देशों में ज्यादा मांग के चलते केंद्र सरकार की निर्यात नीति इसके दामों को आए सीजन प्रभावित करती रहती है। जिससे दाम शेयर बाजार की तरह अर्श से फर्श के बीच झूलते रहते है।
आठ व नौ सितंबर को हुई बारिश के बाद बीते दिन की बौछारों पर नौगावां केकुलजिंदर सिंह औलख बताते हैं कि जिस एकड़ में मुजंरें निकल रही थी वहां बारिश की बूंदों ने सारा सिट्टा सफेद कर दिया है और जहां दाने में दूध आ चुका था वहां पर अब आई बारिश ने इसे काला करना तय कर दिया है।
सितंबर मध्य की इन दो बौछारों ने धान की अन्य किस्मों को भी विपरीत रूप से प्रभावित करना शुरू कर दिया है। फसल कितने फीसदी खराब हुई है इसका आंकलन तो धूप निकलने के  बाद ही हो पाएगा लेकिन बारिश ने धान की गुणवत्ता पर सीधा-सीधा असर डाल दिया है। धर्मेहड़ी के गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि इस साल बराबर अंतराल पर हुई बारिशों ने धान के फसल को खासा तगड़ा कर रखा था। भारी हुए पौधे पर इन दिनों की बारिश ने कुछ ऐसे हालात बना दिए हैं जैसे किसी के मुंह पर आप लगातार थपड़ मारते रहो। दाने का थोथा रह जाना अथवा कम वजन का होना उतना ही खतरनाक है जितना ना बनना। ऐसे फोके दाने पंखा लगाते ही कचरे के रूप में कबाड़ में जा गिरते हैं।
पंजाब कृषि विभाग के डिप्टी डायरेक्टर बीज, डा. बीएस सोहल बताते हैं कि सितंबर के इन दिनों में होने वाली बारिश को ठीक कहा ही नहीं जा सकता और इसके बाद आने वाली बारिश और ज्यादा खतरनाक साबित होगी। धान के पौधे पर सीधे पड़ी पानी की बौछारें और साथ में चली हवा से बल्लियों में से दाने झड़ जाते हैं और जहां पर दाने नहीं हुए हैं वहां पानी लगने से थोथे रह जाते हैं। अन्य फसलों पर तो विशेष असर नहीं होता पर प्रदेश की खरीफ की मुख्य फसल धान के मामले में पॉलीनेशन नहीं होने से दाने बल्लियों में पूरे नहीं पड़ते हैं।
 डा. सोहल कहते हैं जहां बल्लियां निकलने को होती हैं और हवा से पौधे गिर गए हैं उनमें बाद में बनने वाला बीज छोटा रह जाता है। इतना ही नहीं दाने का छिलका बदरंग हो जाता है। धान का छिलका काला होने पर इससे निकला चावल बदरंग अथवा मटमेला भूरा होता है। जिससे मंडी में धान के बेचने में भी खासी परेशानी आती है।
ऐसे ही लखविंदर सिंह बताते हैं कि  जिन किसानों ने धान की बिजाई और रोपाई देरी से की थी उन्हें इससे पहले नुकसान नहीं हुआ है। पर अब हालात बदल रहे हैं। पंजाब हरियाणा सीमा पर बाढ़ की मार तले आने वाले ज्यादातर क्षेत्र में कुछ ऐसा ही माहौल है। अगेती रोपाई पर जहां मार पड़ी है पर ज्यादा लाभ पछैती को भी नहीं है अलबत्ता नुकसान अब बढ़ेगा।

Thursday, 15 September 2011

गोदाम ठसाठस, धान न जाए फंस, storage, rice, in punjab,


नहीं हुए गोदाम खाली, कहीं चावल ना बन जाए मुसीबत
-शैलर मालिकों से एफसीआई नहीं लेगा, विवादित पीएयू-201 किस्म के दो लाख टन धान के चावल
भूपेश चट्ठा, पटियाला
न्यूनतम समर्थन पर धान की सरकारी खरीद शुरू होने से ठीक दो सप्ताह पहले भी पंजाब के गोदाम खाली नहीं हो पाए हैं। गेहूं की बात अलग भी रख दें तो राच्य में 58 लाख टन चावल से गोदाम अटे पड़े हैं और करीब डेढ़ सौ लाख टन धान आने को है।
दिलचस्प है कि केंद्र सरकार के संस्थान फूड कारपोरेशन आफ इंडिया ने शैलर मालिकों से धान की विवादित रही किस्म पीएयू-201 से बनने वाला चावल लेने से ही इंकार कर दिया है। पंजाब के शैलरों में पड़े साल 2009-10 सीजन के दो लाख टन धान के चावल के एवज में 1905 रूपये प्रति क्विंटल की दर से पैसे भरवाने का आदेश जारी कर दिया है। अब ये पुराना चावल, नए चावल में मिल कर एफसीआई के खाते में एक बार फिर पिछले रास्ते से जाएगा या बाजार के रास्ते निर्यात होगा इस पर कुछ नहीं कहा जा सकता। लेकिन राच्य में
अभी वर्ष 2010-11 सीजन के 18 लाख टन धान से बना 11 लाख टन चावल अगले महीने तक एफसीआई के पास जरूर जा पहुंचेगा।
उल्लेखनीय है कि पंजाब में अनाज के सडऩे की खबरों से तंग केंद्र ने जहां गेहूं और चावल के मामले में 20-20 लाख टन के निर्यात की अनुमति दी है लेकिन मानसून के पहले तक के हालात और अब के हालात में कोई बदलाव नहीं आया है। एफसीआई ने बाढ़ से सबसे च्यादा प्रभावित हो सकने वाले निचले क्षेत्रों से अनाज निकालना शुरू किया। जून जुलाई में गेहूं की ढुलाई को प्राथमिकता दी तो अब चावल मुसीबत बन गया। प्रदेश में भंडारण के आंकड़ों अनुसार मानसून से ठीक पहले 135 लाख टन गेहूं था, इसमें एक चौथाई बंद गोदामों में तो 102 लाख टन खुले में था जबकि चावल की मात्रा 26 लाख टन थी। रेलवे की ओर से आठ-नौ लाख टन की ढुलाई की गई तो मिलिंग के बाद चावल की मात्रा लगातार बढ़ती रही। अब ये 58 लाख टन पर आ गया है।

'बठिंडा, मानसा और बरनाला के राइस शैलर मालिक पीएयू-201 किस्म के धान से सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। एफसीआई को चाहिए कि नया चावल आने से पहले ही पुराने का भली प्रकार निपटारा कर ले, साथ ही रेलवे की ओर से ढुलाई को तेज करना चाहिए तभी अनाज को सडऩे से रोका जा सकता है। अन्यथा विदेशी बाजारों में हमें उचित दाम मिलना तो दूर कंसाइनमेंट वापिस तक आने का अंदेशा बना रहता हैÓ
फैडरेशन आफ आल इंडिया राइस मिलर्स एसोसिएशन के प्रधान तरसेम सैणी

' राच्य में धान की फसल के शैलरों में जाने के बाद नवंबर के पहले सप्ताह तक उनके पास नया चावल आना शुरू होगा और एफसीआई पंजाब से हर महीने करीब 15 लाख टन आनाज उठवा रही है। ऐसे में किसी तरह की परेशानी नहीं आनी चाहिए। रही बात धान के स्टोरेज की, वो राच्य सरकार की खरीद एजेंसियों ने करवा कर रखवानी है। इसमें एफसीआई की कोई भूमिका नहीं हैÓ
फूड कारपोरेशन आफ इंडिया के डिप्टी जनरल मैनेजर असीम छााबड़ा

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भूपेश चट्ठा, पटियाला
दुनिया भर में ओजोन की पतली होती जा रही परत को लेकर हाय तौबा मची है, लेकिन देश के विकसित प्रदेशों की श्रेणी में खुद को रखने वाले पंजाब में ग्रीन हाउस गैसों को कम करने की दिशा में एक कदम भी नहीं उठाया गया है, यदि ऐसा ही रहा तो छोटे पौधे जल जाएंगे और दम घुटने लगेगा।
गौरतलब है कि अक्टूबर के आरंभ में उत्तरी भारत के पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में धान की पराली हर ओर जलेगी। इसे कार्बन गैसों की भरमार निकलेगी। प्रदेश के वातावरण में 30 सालों में खासा बदलाव आ गया है। रातें गर्म और दिन ठंडे होने लगे हैं। फिर भी वायु प्रदूषण के इस पहलू पर हर कोई मौन है।
याद रहे कि ओजोन की परत को नुकसान पहुंचाने वाली गैसें कार के इंजन या इंडस्ट्री से निकले सीधे प्रदूषण से प्रभावित नहीं होती, लेकिन सूरज की रोशनी के हाइड्रोकार्बन व नाइट्रोजन आक्साइड से प्रतिक्रिया करने पर जरूर उत्पन्न होती हैं। उत्तर भारत में पराली के जलने से उठा धुआं यानी स्मोक और हवा में मौजूद नमी यानी फोग के मिश्रण से बना स्मोग ओजोन को नुकसान पहुंचाने की आदर्श परस्थितियां पैदा करते हैं।
आक्सीजन के तीन अणुओं से बनने वाली ओजोन गैस का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि यदि यह वातावरण में हो तो सबसे पहले वायु प्रदूषण के रूप में पशुओं को सांस लेने में तकलीफ पैदा करती है और कई तरह के संवेदनशील पौधों को जला कर समाप्त कर देती है। लेकिन जब यही नीले रंग की ओजोन गैस वातावरण के उपरी हिस्से में, धरती से 10 से 50 किलोमीटर की दूरी पर होती है, तो इसकी मोटी परत खासी लाभकारी हो जाती है और धरती तक पहुंचने वाली इलेक्ट्रोमैगनेटिक रेडिएशन को पहले ही रोक देती है।
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सोशल सांइसिस एंड हेल्थ फोरम के डा. पीपी खोसला ने वीरवार को इस बारे में पूछे जाने पर कहा कि यदि ऐसा ही होता रहा तो गर्मी के दिनों में आपकी कार यदि धूप में पार्क हो गई और भले ही आपने शीशों पर काली फिल्म भी लगा रखी है। फिर भी कार में बैठते ही आप अल्ट्रा वायलट किरणों की वजह से बेहोश होने वाली स्थिति में आ जाएंगे। ये किरणें जब एक बार अंदर घुस आती हैं तो स्वत: बाहर नहीं निकलती। धरती की हालत भी हमने कुछ ऐसी ही कर दी है। कार का माहौल तो एयरकंडीशनर चला कर थोड़ी देर में ठीक कर लिया जाता है परंतु धरती पर एसी का काम करने वाले पौधे हम लगा नहीं रहे हैं।
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'निसंदेह ओजोन की परत को नुकसान पहुंचाने वाली गैसें एयर कंडीशनर व रेफ्रीजरेटर से निकलती हैं और ज्यादातर उपकरण भी बिजली के ही हैं लेकिन पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड(पावरकॉम) का इन गैसों को रोकने अथवा नियंत्रित करने से सीधा संबंध नहीं है। इस दिशा में अभी तक पावरकॉम की ओर से किया गया कोई अध्ययन उनके ध्यान में नहीं है'
ऊर्जा बचत विभाग के चीफ इंजीनियर व पीएसईबी इंजीनियर्स एसोसिएशन के प्रधान इंजी. जीएस बेदी।
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'पंजाब में पराली जलती है और थोड़ा बहुत अन्य वायु प्रदूषण भी होता है लेकिन इन सभी का ओजोन की परत से सीधा संबंध नहीं है। ओजोन लेयर को नुकसान पहुंचाने वाली मीथेन जैसी ज्यादातर ग्रीन हाउस गैसें विकसित देशों की देन हैं'
डा. चरणजीत सिंह नाभा, डायरेक्टर पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड