प्रदेश में रेत व बजरी से हो सकती थी शराब के ठेकों के समान आय
एक हजार करोड़ रुपये के ठेके मात्र कुछ दर्जन करोड़ में निपटाए गए
सामूहिक बोली के चलते सिर्फ बड़े ठेकेदार ही सामने आये
फिर कहोगे शराब सस्ती करने रेता महंगा कर दिया कहा मंत्री ने
भूपेश चट्ठा, पटियाला पंजाब के पास किसी तरह के प्राकृतिक संसाधनों विशेष रूप से खनिज संपदा के नाम पर पानी का नाम ही आता है और नदियों से निकलने वाली रेत-बजरी इसके बॉय प्रोडक्ट हैं। पंजाब में रेता कितना कीमती है इसका अनुमान हाल ही में उच्च न्यायालय की ओर से माफियाओं के कब्जे से इसे छुड़वाने लगाए प्रतिबंध के बाद हरियाणा-दिल्ली तक को इसका अहसास हो गया, जब यह मारबल के दामों से ऊपर और सीमेंट के छठे हिस्से के बराबर आ गया। लेकिन प्रदेश में यह संपदा औने-पौने पर नीलाम कर दी गई। इतना ही नहीं नदियों विशेष रूप से प्रदेश के लगभग आधे जिलों में से निकलने वाली सतलुज नदी के रेत बजरी के ठेकों की सामूहिक नीलामी कर दी गई, जबकि पंचायती कानून के अनुसार ग्राम पंचायतों को अपने क्षेत्र में बोली करवाने का हक है, और इससे प्राप्त आय का प्रयोग पंचायत अपनी जरूरतों अनुसार कर सकती है। लेकिन इस बार बोली इंडस्ट्री विभाग ने करवाई। विभाग के ही एक अधिकारी गोपनीयता की शर्त पर बताते हैं कि यदि यह बोली जिले के आधार पर सामूहिक ना हो कर हर गांव के अपने क्षेत्र के आधार पर होती तो ये आंकड़ा एक दर्जन करोड़ न होकर एक हजार करोड़ रुपये का होता। बाजार के दामों के अनुमान के आधार पर आरोप यह भी है कि यह कारोबार शराब व आबकारी से कम नहीं है। शराब के ठेकों के समान आय देने वाले इस कारोबार पर माफिया की गिरफ्त कितनी है इस बात का अंदाज उच्च न्यायालय को है संभवत: यही वजह रही होगी कि न्यायालय ने माफियाओं के शिकंजे से इसे बाहर निकालने की टिप्पणी सहित सरकार से पुराने सभी ठेके रद्द कर नए सिरे से बोली करवाने को कहा और तब तक खनन पर भी रोक लगा दी। यदि किन्हीं तकनीकी कारणों से यदि इंडस्ट्री विभाग यह बोली करवाता है तो संबधित पंचायत को रायल्टी देनी होती है। सामूहिक बोली के चलते पंचायतों का हक भी छीना गया। पूरे जिले की बोली की वजह से बड़े ठेकेदार ही आगे आ सके, जबकि हाईकोर्ट ने माफियाओं की वजह से ही रेता बजरी निकालने पर रोक लगा सरकार को पुन: नए सिरे से बोली करवाने के आदेश दिए थे। दिलचस्प है कि पंजाब का सत्ताधारी गठबंधन जिस रिपेरियन लॉ का हवाला देता आया है वह भी यही कहता कि जिस नदी के पानी से मानसून अथवा बाढ़ में जिस गांव का नुकसान हो रहा है, लाभ भी उसी को मिलना चाहिए
Thursday, 16 September 2010
निशान 1685 पर, चार बार पहुंचा हाय तौबा क्यों?
बीबीएमबी अपने ही बेंचमार्क तोड़ छोड़ रहा पानी
http://in.jagran.yahoo.com/news/local/punjab/4_2_6679880.हटमल
भूपेश चट्ठा पटियाला-144 वर्ग मील में फैले उत्तर भारत के सबसे बड़े और 1700 फीट ऊंचे भाखड़ा बांध की गोबिंद सागर झील में यूं तो 1690 फीट तक पानी भरा जा सकता है लेकिन बांध के निर्माता इंजीनियरों ने इसका खतरे का निशान कुल क्षमता से पांच फीट नीचे 1685 फीट तय कर रखा है। बांध में जल भराव के 1975 से अब तक के आंकड़े गवाह हैं कि पानी सिर्फ चार बार ही खतरे के निशान 1685 फीट को पार कर पाया है। दिलचस्प यह है कि इस निशान को पार करने के बाद जलस्तर में बढ़ोतरी फीट प्रतिदिन की बजाए इंच प्रतिदिन में ही होती रही है।
बांध में पिछले 35 सालों में आए पानी में सर्वाधिक रिकार्ड 1988 में 1687.55 फीट का रहा है लेकिन तारीख के मामले में यह 13 सितंबर को हो पाया, यानि भराव सीजन समाप्त होने से ठीक दो दिन पहले। इसके अलावा 1975-76 में 1687.36 फीट, 1983-84 में 1686.01 फीट, 1978-79 में 1685.96 फीट मापा गया है। बांध में पानी ने 1680 का जल स्तर अब तक इसके अलावा सात बार छुआ है ऐसे में पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड के वे अधिकारी जो बांध पर काम कर चुके हैं बढ़ते जल स्तर की घटना को अनहोनी भी नहीं मान रहे। दो साल पहले भी यहां तक पानी आ चुका है और पांच साल पहले भी सुनामी लहरों के बाद आया है। 2005-06 में पानी 1681.40 तब हुआ जब इससे ठीक एक साल पहले 2004-05 में पानी ने सबसे निचला रिकार्ड 1600.82 फीट का बनाया था। साधारणत: झील में पानी 1650 से 1680 फीट के बीच रहता आया है।
दिलचस्प है कि पंजाब में तबाही मचाने वाली 1993 की बाढ़ वाले साल में इसी बांध से पानी छोड़ा गया था तब पानी का स्तर मात्र 1628 फीट पर था। जानकार बताते हैं कि आतंकवाद के उस दौर में पानी छोड़ने के पीछे घबराहट थी या कोई और कारण आज तक खुलासा नहीं किया गया है। लेकिन भाखड़ा ब्यास मैनेजमैंट बोर्ड के चेयरमैन एके गुप्ता का आतंकियों ने कत्ल कर दिया था।
वहीं पावरकॉम के अधिकारी बताते हैं कि बारिश के एक दिन के लिए रूकते ही जल स्तर ने वहीं ठहर जाना है, अभी दो दिन लगभग सूखा मौसम निकला है और स्तर बढ़ने की रफ्तार एक से गिरकर आधे फीट पर आ गई है। बांध में 24 अगस्त को 1674.41 फीट पानी था, 25 अगस्त समाप्त होने के बाद 1674.74 फीट ही हो पाया है।
ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फैडरेशन ने की तीखी आलोचना
बारिश के दिन पानी छोड़ने पर जताई आपत्ति
http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=46&edition=2010-08-28&pageno=5#
उप मुख्य संवाददाता, पटियाला : ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फैडरेशन के चेयरमैन इंजी. पदमजीत सिंह ने भाखड़ा ब्यास मैनेजमैंट बोर्ड की गोबिंद सागर झील से पानी छोड़े जाने को लेकर तीखी आलोचना की है। वे कहते हैं कि बांध से न केवल फिजूल पानी छोड़ा जा रहा है बल्कि पानी भी तब छोड़ दिया जाता है जब पंजाब में भारी बारिश हो रही होती है। बीबीएमबी अपने ही बनाए हुए बैंच मार्क एक ओर रख कर न जाने किस घबराहट में पानी छोड़े जा रहा है जबकि जलस्तर अभी काफी नीचे है। बैंच मार्क के अनुसार बांध में एक अगस्त को 1650 फीट और 15 अगस्त को 1670 फीट पानी हो सकता है जबकि इस साल बांध में एक को 1615.76 फीट और 15 अगस्त को 1657.12 फीट पानी था। बीबीएमबी ने 11 अगस्त को खुद अपनी ही तकनीकि कमेटी की सिफारिश पर तय किया कि बांध के 1670 फीट तक आने के बाद ही पानी की बढ़ती रफ्तार को थामा जाएगा और इसे एक फीट से अधिक एक दिन में नहीं बढ़ने दिया जाएगा। उधर इसके बावजूद बांध से 22 अगस्त को 59 हजार क्यूसिक, 23 को 61 हजार, 24 अगस्त को 53 हजार क्यूसिक और 25 अगस्त को 53 हजार क्यूसिक पानी छोड़ दिया गया। अब पानी की आवक 58 हजार क्यूसिक पर आने के बाद भी व्यर्थ बहाने का क्रम चालू है जबकि नहरों व बिजली बनाने का काम 15 हजार क्यूसिक में हो जाता है। 24 अगस्त को पंजाब में भारी बारिश के बीच पानी छोड़ा गया तो आनंदपुर साहिब में कटाव आ गया। पंजाब से भेजे गए एसओएस के बाद ही सीमा दस हजार क्यूसिक पर लाई गई और फिर सिलसिला चालू कर दिया गया।
http://in.jagran.yahoo.com/news/local/punjab/4_2_6679880.हटमल
भूपेश चट्ठा पटियाला-144 वर्ग मील में फैले उत्तर भारत के सबसे बड़े और 1700 फीट ऊंचे भाखड़ा बांध की गोबिंद सागर झील में यूं तो 1690 फीट तक पानी भरा जा सकता है लेकिन बांध के निर्माता इंजीनियरों ने इसका खतरे का निशान कुल क्षमता से पांच फीट नीचे 1685 फीट तय कर रखा है। बांध में जल भराव के 1975 से अब तक के आंकड़े गवाह हैं कि पानी सिर्फ चार बार ही खतरे के निशान 1685 फीट को पार कर पाया है। दिलचस्प यह है कि इस निशान को पार करने के बाद जलस्तर में बढ़ोतरी फीट प्रतिदिन की बजाए इंच प्रतिदिन में ही होती रही है।
बांध में पिछले 35 सालों में आए पानी में सर्वाधिक रिकार्ड 1988 में 1687.55 फीट का रहा है लेकिन तारीख के मामले में यह 13 सितंबर को हो पाया, यानि भराव सीजन समाप्त होने से ठीक दो दिन पहले। इसके अलावा 1975-76 में 1687.36 फीट, 1983-84 में 1686.01 फीट, 1978-79 में 1685.96 फीट मापा गया है। बांध में पानी ने 1680 का जल स्तर अब तक इसके अलावा सात बार छुआ है ऐसे में पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड के वे अधिकारी जो बांध पर काम कर चुके हैं बढ़ते जल स्तर की घटना को अनहोनी भी नहीं मान रहे। दो साल पहले भी यहां तक पानी आ चुका है और पांच साल पहले भी सुनामी लहरों के बाद आया है। 2005-06 में पानी 1681.40 तब हुआ जब इससे ठीक एक साल पहले 2004-05 में पानी ने सबसे निचला रिकार्ड 1600.82 फीट का बनाया था। साधारणत: झील में पानी 1650 से 1680 फीट के बीच रहता आया है।
दिलचस्प है कि पंजाब में तबाही मचाने वाली 1993 की बाढ़ वाले साल में इसी बांध से पानी छोड़ा गया था तब पानी का स्तर मात्र 1628 फीट पर था। जानकार बताते हैं कि आतंकवाद के उस दौर में पानी छोड़ने के पीछे घबराहट थी या कोई और कारण आज तक खुलासा नहीं किया गया है। लेकिन भाखड़ा ब्यास मैनेजमैंट बोर्ड के चेयरमैन एके गुप्ता का आतंकियों ने कत्ल कर दिया था।
वहीं पावरकॉम के अधिकारी बताते हैं कि बारिश के एक दिन के लिए रूकते ही जल स्तर ने वहीं ठहर जाना है, अभी दो दिन लगभग सूखा मौसम निकला है और स्तर बढ़ने की रफ्तार एक से गिरकर आधे फीट पर आ गई है। बांध में 24 अगस्त को 1674.41 फीट पानी था, 25 अगस्त समाप्त होने के बाद 1674.74 फीट ही हो पाया है।
ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फैडरेशन ने की तीखी आलोचना
बारिश के दिन पानी छोड़ने पर जताई आपत्ति
http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=46&edition=2010-08-28&pageno=5#
उप मुख्य संवाददाता, पटियाला : ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फैडरेशन के चेयरमैन इंजी. पदमजीत सिंह ने भाखड़ा ब्यास मैनेजमैंट बोर्ड की गोबिंद सागर झील से पानी छोड़े जाने को लेकर तीखी आलोचना की है। वे कहते हैं कि बांध से न केवल फिजूल पानी छोड़ा जा रहा है बल्कि पानी भी तब छोड़ दिया जाता है जब पंजाब में भारी बारिश हो रही होती है। बीबीएमबी अपने ही बनाए हुए बैंच मार्क एक ओर रख कर न जाने किस घबराहट में पानी छोड़े जा रहा है जबकि जलस्तर अभी काफी नीचे है। बैंच मार्क के अनुसार बांध में एक अगस्त को 1650 फीट और 15 अगस्त को 1670 फीट पानी हो सकता है जबकि इस साल बांध में एक को 1615.76 फीट और 15 अगस्त को 1657.12 फीट पानी था। बीबीएमबी ने 11 अगस्त को खुद अपनी ही तकनीकि कमेटी की सिफारिश पर तय किया कि बांध के 1670 फीट तक आने के बाद ही पानी की बढ़ती रफ्तार को थामा जाएगा और इसे एक फीट से अधिक एक दिन में नहीं बढ़ने दिया जाएगा। उधर इसके बावजूद बांध से 22 अगस्त को 59 हजार क्यूसिक, 23 को 61 हजार, 24 अगस्त को 53 हजार क्यूसिक और 25 अगस्त को 53 हजार क्यूसिक पानी छोड़ दिया गया। अब पानी की आवक 58 हजार क्यूसिक पर आने के बाद भी व्यर्थ बहाने का क्रम चालू है जबकि नहरों व बिजली बनाने का काम 15 हजार क्यूसिक में हो जाता है। 24 अगस्त को पंजाब में भारी बारिश के बीच पानी छोड़ा गया तो आनंदपुर साहिब में कटाव आ गया। पंजाब से भेजे गए एसओएस के बाद ही सीमा दस हजार क्यूसिक पर लाई गई और फिर सिलसिला चालू कर दिया गया।
पंजाब में ग्राम सभा की मौत, पंच हुए पेर्मय्श्वेर
http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=46&edition=2010-09-02#
अमेरिका के राष्ट्रपति के समान सरपंच का प्रत्यक्ष चुनाव 80 के दशक में फिर शुरू किया था
इस बार की तबदीली ने सत्ताधारी दल को दिए 80 फीसदी सरपंच, लगातार बढ़ रही है संख्या
पंचों को दबाव में ला कर सरपंच को कठपुतली बना दिया गया
भूपेश चट्ठा, पटियाला : पंजाब में सरपंच का चुनाव करने वाली ग्राम सभा की मौत हो गई है और पंच वास्तव में परमेश्र्वर की भूमिका में आ गए है। स्थानीय निकाय स्तर पर संसदीय प्रणाली लागू करने के लिए ग्रामसभा अथवा पूरे गांव के मतदाताओं के बहुमत की जरूरत नहीं रही। नए एक्ट के अनुसार सिर्फ पंच ही बहुमत के आधार पर सरपंच को बदल सकते हैं। ग्रामीण राजनीति के जानकार बताते हैं कि पंचायत सचिव, डायरेक्टर और सबसे अधिक शिरोमणि अकाली दल की ओर से पार्टी स्तर पर नियुक्त किए गए विधानसभा क्षेत्र के प्रभारी, चाहे वे हारे उम्मीदवार हों या जीते हुए विधायक, के समर्थकों का पलड़ा जिस ओर झुका हो वही सरपंच बन रहा है। गांव की राजनीति में गहरी दिलचस्पी रखने वाले बताते हैं कि पंचायत की ओर से पहली बार चुने गए सरपंच के दो साल पूरे होते ही राजनीति शुरू हो जाती है और इसके बड़े खिलाड़ी पंच ना होकर सत्ताधारी दल के क्षेत्रीय नेता होते हैं। उन्हीं के इशारे पर सचिव व डायरेक्टर भी एक तरह से राजनीतिक प्यादे की भूमिका निभाते हैं। दिलचस्प है कि पंचों की संख्या सम हो तो भी बैठक बुला ली जाती है और अपने बंदे पूरे व सामने वाले के एक कम होने पर भी फटाफट पहले से तैयार किया हुआ प्रस्ताव पारित कर अपना बंदा सरपंच बना दिया जाता है। हालात ऐसे हो गए हैं कि सत्ताधारी पार्टी के समर्थक सरपंचों की संख्या 80 फीसदी के पार हो चुकी है और लगातार बढ़ रही है। ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के सदस्य ब्रंा महिंदरा कहते हैं कि यह आंकड़ा 95 फीसदी के पार हो चुका है। बीडीओ, पंचायत सचिवों को बाकायदा निर्देश देकर अकालियों के हल्का इंचार्ज की पसंद थोपी जा रही है। उनके अपने विधानसभा क्षेत्र समाना के 106 में से 95 गांवों के सरपंच अकाली लगा दिए गए हैं। यूथ डेवलपमेंट बोर्ड पंजाब के चेयरमैन और शिरोमणि अकाली दल के स्टूडेंटस आर्गेनाइजेशन ऑफ इंडिया के प्रधान गुरप्रीत सिंह राजू खन्ना कहते हैं कि सरकार का किसी पर दबाव नहीं है और न ही पंचायत के मामले में कोई दखल देती है, लेकिन जो सरपंच अच्छा काम नहीं करता पंचायत उसे खुद ही बदल रही है। ग्राम सभा की मौत के सवाल पर वे कहते हैं कि यह प्रक्रिया पिछली सरकार के कार्यकाल में शुरू हुई थी वर्तमान ने तो सिर्फ पूरी की है। उल्लेखनीय है कि वर्तमान व्यवस्था का प्रयोग पहले भी राज्य में किया जा चुका है और यह तब भी असफल रही थी बदलाव के नाम पर इसमें सरपंच का न्यूनतम कार्यकाल तय किया गया है। इसे लागू करने के पीछे सचिव स्तर के अधिकारी कहते हैं कि सरपंच एक बार चुन तो लिया जाता था पर पंचों का विश्र्वास खोने के बाद वह किसी तरह का कामकाज नहीं चला पाता था इसीलिए यह व्यवस्था की गई है।
अमेरिका के राष्ट्रपति के समान सरपंच का प्रत्यक्ष चुनाव 80 के दशक में फिर शुरू किया था
इस बार की तबदीली ने सत्ताधारी दल को दिए 80 फीसदी सरपंच, लगातार बढ़ रही है संख्या
पंचों को दबाव में ला कर सरपंच को कठपुतली बना दिया गया
भूपेश चट्ठा, पटियाला : पंजाब में सरपंच का चुनाव करने वाली ग्राम सभा की मौत हो गई है और पंच वास्तव में परमेश्र्वर की भूमिका में आ गए है। स्थानीय निकाय स्तर पर संसदीय प्रणाली लागू करने के लिए ग्रामसभा अथवा पूरे गांव के मतदाताओं के बहुमत की जरूरत नहीं रही। नए एक्ट के अनुसार सिर्फ पंच ही बहुमत के आधार पर सरपंच को बदल सकते हैं। ग्रामीण राजनीति के जानकार बताते हैं कि पंचायत सचिव, डायरेक्टर और सबसे अधिक शिरोमणि अकाली दल की ओर से पार्टी स्तर पर नियुक्त किए गए विधानसभा क्षेत्र के प्रभारी, चाहे वे हारे उम्मीदवार हों या जीते हुए विधायक, के समर्थकों का पलड़ा जिस ओर झुका हो वही सरपंच बन रहा है। गांव की राजनीति में गहरी दिलचस्पी रखने वाले बताते हैं कि पंचायत की ओर से पहली बार चुने गए सरपंच के दो साल पूरे होते ही राजनीति शुरू हो जाती है और इसके बड़े खिलाड़ी पंच ना होकर सत्ताधारी दल के क्षेत्रीय नेता होते हैं। उन्हीं के इशारे पर सचिव व डायरेक्टर भी एक तरह से राजनीतिक प्यादे की भूमिका निभाते हैं। दिलचस्प है कि पंचों की संख्या सम हो तो भी बैठक बुला ली जाती है और अपने बंदे पूरे व सामने वाले के एक कम होने पर भी फटाफट पहले से तैयार किया हुआ प्रस्ताव पारित कर अपना बंदा सरपंच बना दिया जाता है। हालात ऐसे हो गए हैं कि सत्ताधारी पार्टी के समर्थक सरपंचों की संख्या 80 फीसदी के पार हो चुकी है और लगातार बढ़ रही है। ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के सदस्य ब्रंा महिंदरा कहते हैं कि यह आंकड़ा 95 फीसदी के पार हो चुका है। बीडीओ, पंचायत सचिवों को बाकायदा निर्देश देकर अकालियों के हल्का इंचार्ज की पसंद थोपी जा रही है। उनके अपने विधानसभा क्षेत्र समाना के 106 में से 95 गांवों के सरपंच अकाली लगा दिए गए हैं। यूथ डेवलपमेंट बोर्ड पंजाब के चेयरमैन और शिरोमणि अकाली दल के स्टूडेंटस आर्गेनाइजेशन ऑफ इंडिया के प्रधान गुरप्रीत सिंह राजू खन्ना कहते हैं कि सरकार का किसी पर दबाव नहीं है और न ही पंचायत के मामले में कोई दखल देती है, लेकिन जो सरपंच अच्छा काम नहीं करता पंचायत उसे खुद ही बदल रही है। ग्राम सभा की मौत के सवाल पर वे कहते हैं कि यह प्रक्रिया पिछली सरकार के कार्यकाल में शुरू हुई थी वर्तमान ने तो सिर्फ पूरी की है। उल्लेखनीय है कि वर्तमान व्यवस्था का प्रयोग पहले भी राज्य में किया जा चुका है और यह तब भी असफल रही थी बदलाव के नाम पर इसमें सरपंच का न्यूनतम कार्यकाल तय किया गया है। इसे लागू करने के पीछे सचिव स्तर के अधिकारी कहते हैं कि सरपंच एक बार चुन तो लिया जाता था पर पंचों का विश्र्वास खोने के बाद वह किसी तरह का कामकाज नहीं चला पाता था इसीलिए यह व्यवस्था की गई है।
Wednesday, 15 September 2010
सीधी बिजाई ने बाढ़ को भी दी मात
http://in.jagran.yahoo.com/news/local/punjab/4_2_6725130_1.html
सर्वाधिक बाढ़ प्रभावित पटियाला जिले में 1.40 लाख टन अधिक उत्पादन की उम्मीद
शुरू में दबी रही फसल ने शानदार बढ़त दिखा चौंकाया
भूपेश चट्ठा, पटियाला : धान की सीधी बिजाई करने वाले किसान बाढ़ के दिनों में खासे सहमे थे लेकिन अब बारिश अच्छी होने और कई क्षेत्रों में छह-सात दिन फसल के डूबे रहने के बावजूद फसल का खराब न होना और कटाई के निकट आने तक इसका फिर से उभर जाना किसान के लिए दोहरा लाभ देने वाला साबित हुआ है। पानी की शानदार बचत करने वाली और धरती में बरसाती पानी जाने के रास्ते में रुकावट न बनने के अलावा किसानों का लागत मूल्य खासा कम करने वाली धान की सीधी बिजाई ने एक तरह से बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा को भी सीधा कर दिया है। दिलचस्प है कि सीधी बिजाई करने वाले किसानों को पांच हजार प्रति एकड़ का मुआवजा भी मिल गया और फसल भी पुन: नहीं बीजनी पड़ी, जबकि इसकी तुलना में पनीरी लगाने वाले किसान हरियाणा के करनाल से अमृतसर तक महंगी पनीरी के लिए भटकते रहे और इन्हें एक बार फिर रोपाई करनी पड़ी। धर्मेड़ी के किसान गुरप्रीत सिंह बताते है कि खर्चे में कटौती इस तरीके से तय है, 15 सौ रुपये की पनीरी लगवाई नहीं देनी पड़ती, इसके अलावा खाद का उपयोग भी इस बार कम हुआ है। फसल की अवधि कम होने पर डीजल के खर्च में कमी को वे इससे नहीं जोड़ते। कहते है कि बारिश ने पेट भरे रखा ऐसे में डीजल की जरूरत नहीं पड़नी थी। पर्यावरण को लाभ इससे कितना हुआ इसपर वे भूमिगत जलस्तर पर ही रूक जाते हैं। वहीं मुख्य कृषि अधिकारी एससी खुराना कहते हैं कि शुरू में ऐसा लग जरूर रहा था कि धान की ये फसल कुछ कमजोर रह गई है लेकिन अब पूरी तरह से दुरूस्त है, किसी तरह की बीमारी भी नहीं लगी है। बाढ़ की मार तले आई इस तरह के धान की फसल तीन से चार दिन पानी में पूरी तरह से डूबी रहने के बावजूद अब बेहतरीन उपज देने जा रही है। अगले साल सीधी बिजाई के इस गुण को भी किसानों के सामने रखने के सवाल पर वे कहते हैं कि बाढ़ तो न ही आए तभी अच्छा है। पर सीधी बिजाई को पूरी तरह से बाढ़ प्रूफ होने का सर्टिफिकेट देने से वे फिलहाल हिचकते है। कहते है कि धान की फसल में पानी में डूबे रहने की क्षमता होती है। चूंकि सीधी बिजाई में पौधा जमीन से बीज के रास्ते जुड़ता है ऐसे में पनीरी की तुलना में पकड़ ज्यादा मजबूत रहती है। उधर बाढ़ से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले पंजाब के पटियाला जिले के डिप्टी कमीश्नर दिपेंद्र सिंह कहते हैं कि इस साल पिछले साल की तुलना में1.30 लाख टन ज्यादा फसल होने की संभावना है। दो लाख 32 हजार हैक्टेयर में बिजाई हुई है, और 14 लाख 74 हजार टन उत्पादन होने की उम्मीद है।
mark the news
http://in.jagran.yahoo.com/news/local/punjab/4_2_6725130_1.html
--
http://in.jagran.yahoo.com/news/local/punjab/4_2_6725130_1.html
सर्वाधिक बाढ़ प्रभावित पटियाला जिले में 1.40 लाख टन अधिक उत्पादन की उम्मीद
शुरू में दबी रही फसल ने शानदार बढ़त दिखा चौंकाया
भूपेश चट्ठा, पटियाला : धान की सीधी बिजाई करने वाले किसान बाढ़ के दिनों में खासे सहमे थे लेकिन अब बारिश अच्छी होने और कई क्षेत्रों में छह-सात दिन फसल के डूबे रहने के बावजूद फसल का खराब न होना और कटाई के निकट आने तक इसका फिर से उभर जाना किसान के लिए दोहरा लाभ देने वाला साबित हुआ है। पानी की शानदार बचत करने वाली और धरती में बरसाती पानी जाने के रास्ते में रुकावट न बनने के अलावा किसानों का लागत मूल्य खासा कम करने वाली धान की सीधी बिजाई ने एक तरह से बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा को भी सीधा कर दिया है। दिलचस्प है कि सीधी बिजाई करने वाले किसानों को पांच हजार प्रति एकड़ का मुआवजा भी मिल गया और फसल भी पुन: नहीं बीजनी पड़ी, जबकि इसकी तुलना में पनीरी लगाने वाले किसान हरियाणा के करनाल से अमृतसर तक महंगी पनीरी के लिए भटकते रहे और इन्हें एक बार फिर रोपाई करनी पड़ी। धर्मेड़ी के किसान गुरप्रीत सिंह बताते है कि खर्चे में कटौती इस तरीके से तय है, 15 सौ रुपये की पनीरी लगवाई नहीं देनी पड़ती, इसके अलावा खाद का उपयोग भी इस बार कम हुआ है। फसल की अवधि कम होने पर डीजल के खर्च में कमी को वे इससे नहीं जोड़ते। कहते है कि बारिश ने पेट भरे रखा ऐसे में डीजल की जरूरत नहीं पड़नी थी। पर्यावरण को लाभ इससे कितना हुआ इसपर वे भूमिगत जलस्तर पर ही रूक जाते हैं। वहीं मुख्य कृषि अधिकारी एससी खुराना कहते हैं कि शुरू में ऐसा लग जरूर रहा था कि धान की ये फसल कुछ कमजोर रह गई है लेकिन अब पूरी तरह से दुरूस्त है, किसी तरह की बीमारी भी नहीं लगी है। बाढ़ की मार तले आई इस तरह के धान की फसल तीन से चार दिन पानी में पूरी तरह से डूबी रहने के बावजूद अब बेहतरीन उपज देने जा रही है। अगले साल सीधी बिजाई के इस गुण को भी किसानों के सामने रखने के सवाल पर वे कहते हैं कि बाढ़ तो न ही आए तभी अच्छा है। पर सीधी बिजाई को पूरी तरह से बाढ़ प्रूफ होने का सर्टिफिकेट देने से वे फिलहाल हिचकते है। कहते है कि धान की फसल में पानी में डूबे रहने की क्षमता होती है। चूंकि सीधी बिजाई में पौधा जमीन से बीज के रास्ते जुड़ता है ऐसे में पनीरी की तुलना में पकड़ ज्यादा मजबूत रहती है। उधर बाढ़ से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले पंजाब के पटियाला जिले के डिप्टी कमीश्नर दिपेंद्र सिंह कहते हैं कि इस साल पिछले साल की तुलना में1.30 लाख टन ज्यादा फसल होने की संभावना है। दो लाख 32 हजार हैक्टेयर में बिजाई हुई है, और 14 लाख 74 हजार टन उत्पादन होने की उम्मीद है।
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http://in.jagran.yahoo.com/news/local/punjab/4_2_6725130_1.html
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Monday, 13 September 2010
rotten wheat-vodka, rotten rice...would be bear
गेहूं सड़ रहा, अब चावल की बारी
अन्य राज्यों में सेला व पंजाब, हरियाणा में सड़ रहा कच्चा चावल
दो साल पहले मुद्रास्फीति रोकने को उठाया कदम हुआ ओवरडोज
भूपेश चट्ठा, पटियाला गोदामों में गेहूं सड़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट से लेकर प्रधानमंत्री तक नीतिगत विवादों में उलझ गए हैं और सिर्फ 20 दिनों बाद पंजाब व हरियाणा में धान के साथ ऐसे ही हालात बनने की नौबत आना तय है। देश भर में फूड कारपोरेशन ऑफ इंडिया के पास अब चावल रखने की जगह नहीं है। ऐसे में गैर बासमती का निर्यात खोले बिना भंडारण की समस्या हल होना नामुमकिन है। गेहूं सड़ चुका है और अब चावल की बारी आ रही है। द फेडरेशन ऑफ आल इंडिया राइस शैलर्स मिलर्स एसोसिएशन के प्रधान तरसेम सैणी बताते हैं कि अनाज सड़ने के लिए जितना कर्मियों को दोषी ठहराया जा रहा है उससे कहीं ज्यादा नीतियां बनाने वाले जिम्मेदार हैं। दो साल पहले देश में अनाज की कमी, बढ़ती मंहगाई व मुद्रास्फिति से पार पाने को गैर बासमती चावल के निर्यात पर पाबंदी लगा दी गई। तब समय की जरूरत हो सकती थी पर अब देश भर में एफसीआई के पास कहीं भी चावल रखने की जगह नहीं है फिर भी प्रतिबंध जारी है। चावल सड़ने की तथाकथित तैयारियों में एक अन्य तथ्य यह भी है कि उड़ीसा, आंध्र प्रदेश व छत्तीसगढ़ जैसे तटीय राज्यों में मोटा कहा जाने वाला सेला चावल उगाया जाता है, लेकिन इन राज्यों में खाने के लिए लोग पंजाब, हरियाणा में पैदा होने वाले कच्चा कहे जाने वाले धान की हाईब्रिड किस्मों से बने चावल को ही पसंद करते हैं। इन्हीं राज्यों से सेला निर्यात किया जाता रहा है पर अब एफसीआई इन राज्यों से कच्चा चावल खरीद रही है। तरसेम कहते है कि इसका सीधा प्रभाव हुआ कि तटीय राज्यों के सेला प्लांट बंद हो गए और पंजाब में चावल रखने की जगह नहीं बची। 20 फीसदी धान आज भी बिना मिलिंग पड़ा है। मुद्रास्फीति रोकने को दी गई दवा ओवरडोज हो गई है। जालंधर, कपूरथला, फिरोजपुर, संगरूर में शैलर धान से अटे पड़े हैं, जबकि बठिंडा व मानसा जिलों में धान की 201 किस्म का प्रभाव शैलरों का पीछा नहीं छोड़ रहा। पंजाब में ही तीन हजार करोड़ रुपये से अधिक का पिछले साल का धान पड़ा है और अगली फसल कम से कम इन जिलों में मात्र 20 दिन बाद कहां रखेगी और कौन से शैलर में लगाई जाएगी एफसीआई की समझ से बाहर है पर स्पष्टीकरण फिर भी दिए जा रहे हैं। गैर बासमती चावल के अंतरराष्ट्रीय दामों और निर्यात के लाभ पर तरसेम कहते हैं कि वाजिब दाम मिलने तय हैं। बांग्ला देश में सेला की मांग है और पाकिस्तान में बाढ़ से फसल तबाह हुई है। वहीं अपने देश में अनाज खराब करने के बाद खरीद मूल्य से कम दामों पर सिर्फ इसलिए बेचा जा रहा है, क्योंकि खराब हो रहा है। प्रदेश में मिलिंग पर वे कहते हैं कि एक महीने में सारा काम निपटाया जा सकता है यदि चावल एफसीआई समय पर उठाती रहे।
http://in.jagran.yahoo.com/news/local/punjab/4_2_6719698_1.html
अन्य राज्यों में सेला व पंजाब, हरियाणा में सड़ रहा कच्चा चावल
दो साल पहले मुद्रास्फीति रोकने को उठाया कदम हुआ ओवरडोज
भूपेश चट्ठा, पटियाला गोदामों में गेहूं सड़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट से लेकर प्रधानमंत्री तक नीतिगत विवादों में उलझ गए हैं और सिर्फ 20 दिनों बाद पंजाब व हरियाणा में धान के साथ ऐसे ही हालात बनने की नौबत आना तय है। देश भर में फूड कारपोरेशन ऑफ इंडिया के पास अब चावल रखने की जगह नहीं है। ऐसे में गैर बासमती का निर्यात खोले बिना भंडारण की समस्या हल होना नामुमकिन है। गेहूं सड़ चुका है और अब चावल की बारी आ रही है। द फेडरेशन ऑफ आल इंडिया राइस शैलर्स मिलर्स एसोसिएशन के प्रधान तरसेम सैणी बताते हैं कि अनाज सड़ने के लिए जितना कर्मियों को दोषी ठहराया जा रहा है उससे कहीं ज्यादा नीतियां बनाने वाले जिम्मेदार हैं। दो साल पहले देश में अनाज की कमी, बढ़ती मंहगाई व मुद्रास्फिति से पार पाने को गैर बासमती चावल के निर्यात पर पाबंदी लगा दी गई। तब समय की जरूरत हो सकती थी पर अब देश भर में एफसीआई के पास कहीं भी चावल रखने की जगह नहीं है फिर भी प्रतिबंध जारी है। चावल सड़ने की तथाकथित तैयारियों में एक अन्य तथ्य यह भी है कि उड़ीसा, आंध्र प्रदेश व छत्तीसगढ़ जैसे तटीय राज्यों में मोटा कहा जाने वाला सेला चावल उगाया जाता है, लेकिन इन राज्यों में खाने के लिए लोग पंजाब, हरियाणा में पैदा होने वाले कच्चा कहे जाने वाले धान की हाईब्रिड किस्मों से बने चावल को ही पसंद करते हैं। इन्हीं राज्यों से सेला निर्यात किया जाता रहा है पर अब एफसीआई इन राज्यों से कच्चा चावल खरीद रही है। तरसेम कहते है कि इसका सीधा प्रभाव हुआ कि तटीय राज्यों के सेला प्लांट बंद हो गए और पंजाब में चावल रखने की जगह नहीं बची। 20 फीसदी धान आज भी बिना मिलिंग पड़ा है। मुद्रास्फीति रोकने को दी गई दवा ओवरडोज हो गई है। जालंधर, कपूरथला, फिरोजपुर, संगरूर में शैलर धान से अटे पड़े हैं, जबकि बठिंडा व मानसा जिलों में धान की 201 किस्म का प्रभाव शैलरों का पीछा नहीं छोड़ रहा। पंजाब में ही तीन हजार करोड़ रुपये से अधिक का पिछले साल का धान पड़ा है और अगली फसल कम से कम इन जिलों में मात्र 20 दिन बाद कहां रखेगी और कौन से शैलर में लगाई जाएगी एफसीआई की समझ से बाहर है पर स्पष्टीकरण फिर भी दिए जा रहे हैं। गैर बासमती चावल के अंतरराष्ट्रीय दामों और निर्यात के लाभ पर तरसेम कहते हैं कि वाजिब दाम मिलने तय हैं। बांग्ला देश में सेला की मांग है और पाकिस्तान में बाढ़ से फसल तबाह हुई है। वहीं अपने देश में अनाज खराब करने के बाद खरीद मूल्य से कम दामों पर सिर्फ इसलिए बेचा जा रहा है, क्योंकि खराब हो रहा है। प्रदेश में मिलिंग पर वे कहते हैं कि एक महीने में सारा काम निपटाया जा सकता है यदि चावल एफसीआई समय पर उठाती रहे।
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Sunday, 12 September 2010
मक्की पर लगा तीन फीसदी टैक्स
http://in.jagran.yahoo.com/news/local/punjab/4_2_6703788.html
साल में तीन फसल होती है मक्की की, धान-गेहूं दोनों का है विकल्प
भूपेश चट्ठा, पटियाला : एक किलो चावल के लिए तीन से पांच हजार लीटर पानी की खपत, वह भी गर्मी के दिनों में। हालात गेहूं के लिए भी कुछ ऐसे ही हंै, लेकिन धान जितने बुरे नहीं है, लेकिन मक्की के रूप में एक ही फसल ऐसी है जो इन दोनों का बदल भी देती है और एक और यानि एक ही साल में तीसरी फसल भी दे जाती है। इतना सब कुछ होने के बावजूद पानी की बचत के मामले में अव्वल है। हर तरफ से डाइवरसीफिकेशन कर पर्यावरण को संजोने वाली मक्की पर सरकार ने तीन फीसदी का टैक्स लगा दिया है। दिलचस्प है कि मक्की पर जबतब टैक्स लगता रहा है और हटाया भी जाता रहा है। 1990 के दशक के आरंभ में इस पर टैक्स लगा पर फिर हटा दिया गया। इसी दशक के अंत में एक बार फिर लगा दिया गया। ऐसा दो तीन बार हो चुका है। अब फिर लगा दिया गया है। कृषि के मंडीकरण मामलों की जानकारी रखने वाले पर्यावरण प्रेमी अधिकारी नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहते हैं कि राज्य में एक भी मक्की की प्रोसेसिंग यूनिट नहीं लगी है। अब रोपड़, होशियारपुर, नवांशहर व गुरदासपुर के अलावा हिमाचल प्रदेश के साथ लगते जिलों में अब मक्की का रकबा पांच से दस फीसदी बढ़ना शुरू हुआ है। इसे और बढ़ने देना चाहिए न कि रुकावट बनना चाहिए। धान की फसल से दूर होने वाले को तो अफीम छोड़ने वाले के समान लाभ दिया जाना चाहिए न कि सजा लगा देनी चाहिए। वहीं, मुख्य कृषि अधिकारी खुराणा बताते है कि यह इकलौती फसल है, जिसे आप साल में तीन बार फरवरी, जून व अक्टूबर में सियालू मक्की के रूप में लगा सकते है, जबकि फाइव ऐलीमेंट हैल्थ एंड एजुकेशनल सोसायटी के डा. जोगिंदर टाइगर कहते है कि भूमिगत जलस्तर संजोने के अलावा मक्की पंजाब की अपनी फसल है। सरकार को तो चाहिए कि पंजाब की अपनी फसलें उगाने वालों को तो ज्यादा रियायतें दे। भारतीय किसान यूनियन एकता के प्रदेश महासचिव सुखदेव सिंह कहते है कि ये तथाकथित किसान हितैषी सरकार है कुछ भी कर सकती है। यह शहरी विकास टैक्स है। सरकार किसान की जेब से पैसा निकाल कर शहरों का विकास कर रही है। हम इस कर की निंदा करते है और वापस लेने की मांग करते है।
साल में तीन फसल होती है मक्की की, धान-गेहूं दोनों का है विकल्प
भूपेश चट्ठा, पटियाला : एक किलो चावल के लिए तीन से पांच हजार लीटर पानी की खपत, वह भी गर्मी के दिनों में। हालात गेहूं के लिए भी कुछ ऐसे ही हंै, लेकिन धान जितने बुरे नहीं है, लेकिन मक्की के रूप में एक ही फसल ऐसी है जो इन दोनों का बदल भी देती है और एक और यानि एक ही साल में तीसरी फसल भी दे जाती है। इतना सब कुछ होने के बावजूद पानी की बचत के मामले में अव्वल है। हर तरफ से डाइवरसीफिकेशन कर पर्यावरण को संजोने वाली मक्की पर सरकार ने तीन फीसदी का टैक्स लगा दिया है। दिलचस्प है कि मक्की पर जबतब टैक्स लगता रहा है और हटाया भी जाता रहा है। 1990 के दशक के आरंभ में इस पर टैक्स लगा पर फिर हटा दिया गया। इसी दशक के अंत में एक बार फिर लगा दिया गया। ऐसा दो तीन बार हो चुका है। अब फिर लगा दिया गया है। कृषि के मंडीकरण मामलों की जानकारी रखने वाले पर्यावरण प्रेमी अधिकारी नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहते हैं कि राज्य में एक भी मक्की की प्रोसेसिंग यूनिट नहीं लगी है। अब रोपड़, होशियारपुर, नवांशहर व गुरदासपुर के अलावा हिमाचल प्रदेश के साथ लगते जिलों में अब मक्की का रकबा पांच से दस फीसदी बढ़ना शुरू हुआ है। इसे और बढ़ने देना चाहिए न कि रुकावट बनना चाहिए। धान की फसल से दूर होने वाले को तो अफीम छोड़ने वाले के समान लाभ दिया जाना चाहिए न कि सजा लगा देनी चाहिए। वहीं, मुख्य कृषि अधिकारी खुराणा बताते है कि यह इकलौती फसल है, जिसे आप साल में तीन बार फरवरी, जून व अक्टूबर में सियालू मक्की के रूप में लगा सकते है, जबकि फाइव ऐलीमेंट हैल्थ एंड एजुकेशनल सोसायटी के डा. जोगिंदर टाइगर कहते है कि भूमिगत जलस्तर संजोने के अलावा मक्की पंजाब की अपनी फसल है। सरकार को तो चाहिए कि पंजाब की अपनी फसलें उगाने वालों को तो ज्यादा रियायतें दे। भारतीय किसान यूनियन एकता के प्रदेश महासचिव सुखदेव सिंह कहते है कि ये तथाकथित किसान हितैषी सरकार है कुछ भी कर सकती है। यह शहरी विकास टैक्स है। सरकार किसान की जेब से पैसा निकाल कर शहरों का विकास कर रही है। हम इस कर की निंदा करते है और वापस लेने की मांग करते है।
..मुझे यूं भुला ना पाओगे
धरती को सेहत सुधारने का फार्मूला किसानों को फिर याद आया
गेहूं के साथ मोटा अनाज लगाना लाभदाय
गेहूं के साथ चना लगाने पर नहीं डालना पड़ता यूरिया
भूपेश चट्ठा, पटियाला स्वदेशी ज्ञान की खोज ने हमें याद करवा दिया कि गेहूं के साथ मोटे अनाज जौ, चना, जवार, बाजरा, मोठ को शामिल कर बने आटे की रोटी खाने से इंसान की सेहत दुरुस्त रहती है, पर अगर किसान इससे दो कदम आगे बढ़ जाए तो धरती की सेहत भी ठीक रहेगी। चुनिंदा किसानों में ही सही, लेकिन पंजाब में इसका चलन फिर शुरू हुआ है। गेहूं की बिजाई में करीब दो महीने हैं। प्रगतिशील किसानों के बीच गेहूं की किस्मों को लेकर चर्चा शुरू हो चुकी है। फाइव एलिमेंट हेल्थ एंड एजुकेशनल सोसाइटी फनविल के डा. जोगिंदर टाइगर कहते हैं कि पंजाब में गेहूं, जौ व चने (बेरड़) की खेती होती आई है। इसमें गेहूं के साथ जौ और चने की बिजाई की जाती है। इसी खेत में बीच-बीच में तैलीय बीजों तोरिया और तारामीरा की आड़े अथवा लकीरें खींच दी जाती हैं। इस तरह से खेती करने से फसल को बीमारी नहीं लगती और एक फसल दूसरी के लिए उपयोगी साबित होने के साथ धरती की उर्वरा शक्ति भी बढ़ाती है। चने की जड़ों में नाइट्रिक बैक्टीरिया होता है, यह हर फली वाली फसल में होता है। गेहूं के साथ चना लगाने पर खेत में यूरिया नहीं डालना पड़ता। जौ के लिए ज्यादा उर्वरा शक्ति की जरूरत नहीं पड़ती, यह कमजोर जमीन में भी उग आता है, जबकि चना धरती की इस शक्ति को बढ़ाता है। दोनों की कीमत पर गेहूं की उपज आ जाती है। चने के पत्ते खेत में बिखरते हैं, जो हरी खाद का काम करते हैं। उनके अनुसार, चने की सुंडी काफी नाजुक होती है। गेहूं पौधे के संपर्क में आने पर स्वत: मर जाती है। गेहूं व जौ की सुंडी के लिए न केवल चना बल्कि आपस में भी टेस्ट विपरीत होने के चलते एक दूसरे पौधे के लिए रक्षा कवच का काम करते हैं। पेस्टीसाइड की जरूरत भी नहीं पड़ती। खेत में गेहूं के साथ अगर अलग-अलग कतार में तोरिया और तारामीरा लगाया जाए तो अन्य कीट भी नहीं लगते। तोरिया से बनने वाला तेल मुख्य रूप से जानवरों के काम आता है। तेज खुशबू और आंखों में जलन तक की क्षमता के चलते ये पौधे गेहूं को पूर्ण सुरक्षित कर देते हैं। हरित क्रांति से खेती का यह तरीका पंजाब में आम था पर अब भुला दिया गया फार्मूला फिर से याद आने लगा है। उधर, कृषि विभाग ने पांच सीजन पहले गेहूं के साथ मेथा की खेती करने का विचार दिया था। मेथा की जड़ें भी गेहूं की फसल के लिए टॉनिक का काम करती हैं और फसल भी काफी पहले आ जाती है। यह प्रयोग सफल रहा पर इसकी मार्केटिंग अमृतसर सहित कुछ ही क्षेत्रों में हो पाई। इस पर मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल कहते हैं कि मेथा के प्रोसेसिंग प्लांट न लग पाने की वजह से यह प्रयोग नहीं चल पाया।
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धरती को सेहत सुधारने का फार्मूला किसानों को फिर याद आया
गेहूं के साथ मोटा अनाज लगाना लाभदाय
गेहूं के साथ चना लगाने पर नहीं डालना पड़ता यूरिया
भूपेश चट्ठा, पटियाला स्वदेशी ज्ञान की खोज ने हमें याद करवा दिया कि गेहूं के साथ मोटे अनाज जौ, चना, जवार, बाजरा, मोठ को शामिल कर बने आटे की रोटी खाने से इंसान की सेहत दुरुस्त रहती है, पर अगर किसान इससे दो कदम आगे बढ़ जाए तो धरती की सेहत भी ठीक रहेगी। चुनिंदा किसानों में ही सही, लेकिन पंजाब में इसका चलन फिर शुरू हुआ है। गेहूं की बिजाई में करीब दो महीने हैं। प्रगतिशील किसानों के बीच गेहूं की किस्मों को लेकर चर्चा शुरू हो चुकी है। फाइव एलिमेंट हेल्थ एंड एजुकेशनल सोसाइटी फनविल के डा. जोगिंदर टाइगर कहते हैं कि पंजाब में गेहूं, जौ व चने (बेरड़) की खेती होती आई है। इसमें गेहूं के साथ जौ और चने की बिजाई की जाती है। इसी खेत में बीच-बीच में तैलीय बीजों तोरिया और तारामीरा की आड़े अथवा लकीरें खींच दी जाती हैं। इस तरह से खेती करने से फसल को बीमारी नहीं लगती और एक फसल दूसरी के लिए उपयोगी साबित होने के साथ धरती की उर्वरा शक्ति भी बढ़ाती है। चने की जड़ों में नाइट्रिक बैक्टीरिया होता है, यह हर फली वाली फसल में होता है। गेहूं के साथ चना लगाने पर खेत में यूरिया नहीं डालना पड़ता। जौ के लिए ज्यादा उर्वरा शक्ति की जरूरत नहीं पड़ती, यह कमजोर जमीन में भी उग आता है, जबकि चना धरती की इस शक्ति को बढ़ाता है। दोनों की कीमत पर गेहूं की उपज आ जाती है। चने के पत्ते खेत में बिखरते हैं, जो हरी खाद का काम करते हैं। उनके अनुसार, चने की सुंडी काफी नाजुक होती है। गेहूं पौधे के संपर्क में आने पर स्वत: मर जाती है। गेहूं व जौ की सुंडी के लिए न केवल चना बल्कि आपस में भी टेस्ट विपरीत होने के चलते एक दूसरे पौधे के लिए रक्षा कवच का काम करते हैं। पेस्टीसाइड की जरूरत भी नहीं पड़ती। खेत में गेहूं के साथ अगर अलग-अलग कतार में तोरिया और तारामीरा लगाया जाए तो अन्य कीट भी नहीं लगते। तोरिया से बनने वाला तेल मुख्य रूप से जानवरों के काम आता है। तेज खुशबू और आंखों में जलन तक की क्षमता के चलते ये पौधे गेहूं को पूर्ण सुरक्षित कर देते हैं। हरित क्रांति से खेती का यह तरीका पंजाब में आम था पर अब भुला दिया गया फार्मूला फिर से याद आने लगा है। उधर, कृषि विभाग ने पांच सीजन पहले गेहूं के साथ मेथा की खेती करने का विचार दिया था। मेथा की जड़ें भी गेहूं की फसल के लिए टॉनिक का काम करती हैं और फसल भी काफी पहले आ जाती है। यह प्रयोग सफल रहा पर इसकी मार्केटिंग अमृतसर सहित कुछ ही क्षेत्रों में हो पाई। इस पर मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल कहते हैं कि मेथा के प्रोसेसिंग प्लांट न लग पाने की वजह से यह प्रयोग नहीं चल पाया।
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