-12 फीसद नमी की गेहूं खरीदी जाती है पर गर्मियों में 46 डिग्री पर खुले आसमान में होता है भंडारण
-सरकार ने हल ना निकाला तो हर कर्मी हो जाएगा चार्जशीट: कोर्डीनेशन कमेटी
-काम करने के नजरिए पर निर्भर करता है: आढ़ती एसोसिएशन
भूपेश चट्ठा, पटियाला
साल में दो बार किसान की फसल खरीदने और उसे भुगतान करवाने में मदद करवाने वाला आढ़ती 72 घंटे के लिए अनाज संभालता है और सदियों से व्यवसाय करता आ रहा है। धान व गेहूं की खरीद पर कुल मूल्य का ढ़ाई फीसद हिस्सा कमीशन के रूप में लेता है, जबकि खरीद एजेंसियां महीनों से लेकर सालों तक अनाज की संभाल करती है पर घाटे में चल रही है। इन एजेंसियों के कर्मियों ने इसके लिए मौसम को जिम्मेदार ठहरा दिया है।
राच्य सरकार की पांच खरीद एजेंसियों मार्कफैड, पंजाब एग्रो, पनसप, वेयर हाउसिंग कारपोरेशन, पनसीड, के कर्मियों की कोर्डीनेशन कमेटी का कहना है कि अनाज के भंडारण के दौरान होने वाली कमी में तापमान व नमी की भूमिका खासी है। 12 फीसद नमी की गेहूं की खरीद की जाती है पर 46 डिग्री पर खुले आसमान के नीचे भंडारण करने पर ये कम हो जाती है और इस कमी को 'चोरीÓ बता उनके सर मढ़ दिया जाता है।
कोर्डीनेशन कमेटी के प्रधान भुपिंदर सिंह कहते हैं कि इस आलम में कोई भी कर्मी व अधिकारी चार्जशीट से नहीं बचने वाला। गेहूं भंडारण में प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार ढ़ाई हजार कर्मियों में से एक हजार से अधिक पर चार्जशीट हो चुकी है। वर्तमान हालात में यह आंकड़ा दो हजार उसे उपर जाने वाला है। नई हुई भर्ती के 30 से 35 फीसद कर्मी इसी डर से नौकरी छोड़ चुके हैं।
इसी कमेटी के विधु शेखर भारद्वाज कहते हैं कि गर्म हवाओं से सूखी गेहूं डिस्पैच होते समय कम हो जाती है तो कर्मी पर एफआईआर दर्ज हो जाती है लेकिन सीलन बढऩे पर बढ़े वजन का लाभ कर्मी को नहीं दिया जाता। यही नार्मस हैं।
दिलचस्प है कि पंजाब मंडी बोर्ड के नाते चेयरमैन अजमेर सिंह लक्खोवाल यों तो किसानों व आढ़तियों का तकनीकि रूप से बराबर का प्रतिनिधित्व करते हैं, लेकिन आढ़तियों को मिलने वाले कमीशन के लगातार बढऩे से आपत्ति है। वे कहते हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य के बढऩे के साथ ही बढ़ रही आढ़त को फ्रीज किया जाना चाहिए।
वहीं नई अनाज मंडी सरहिंद रोड की आढ़ती एसोसिएशन के प्रधान गुरनाम सिंह लचकाणी कहते हैं कि एमएसपी का मार्केट फीस और आढ़त से कोई सीधा मेल नहीं है। एमएसपी के बाद ही दोनों चीजें जोड़ी जाती है, आढ़त कम होने से किसान को कोई लाभ नहीं होने वाला, जबकि खरीद एजेंसी के नुकसान में रहने और आढ़ती को हो रहे फायदे पर वे कहते हैं कि ये काम करने के नजरिए पर निर्भर करता है। हम प्राइवेट लोग हैं हमे पता है कि नफा और नुकसान दोनों हमारा ही है। ऐसे में काम किया जाता है, जबकि सरकारी आदमी का वेतन आना ही होता है। वे कहते हैं कि घर में हम एक भी पंखा अनावश्यक नहीं चलने देते जबकि आफिस में आसपास चलते पंखों को आफिस के बाद बंद करने की जिम्मेदारी चौकीदार पर छोड़ देते हैं।
वह आगे कहते हैं कि पंजाब में 25 से 28 हजार आढ़ती काम कर रहे हैं और इतने ही इनके यहां मुनीम हैं। ढाई फीसद कमीशन से सरकार 56 हजार परिवारों को चपरासी का वेतन भी नहीं दे रही है। वहीं, विधु शेखर भारद्वाज बताते हैं कि राज्य सरकार की सभी खरीद एजेंसियां घाटे में और दिन-प्रतिदिन का आपरेशन चलाने के लिए बैंकों के लोन पर निर्भर हैं। हालांकि राज्य सरकार की तरफ पर इनकी 1400 करोड़ रुपये की देनदारी है और सालों से 12500 करोड़ रुपये एफसीआइ के पास फंसे पड़े हैं।
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