गतिरोध-पौधारोपण
-गांव घलौड़ी में निगम ने नहीं की निशानदेही तो 11 एकड़ जमीन पर नहीं हुआ पौधारोपण
-लंग गांव में कब्जा कार्रवाई के छह नोटिसों के बाद भी पुलिस सहायता नहीं मिली
भूपेश चट्ठा, पटियाला
उत्तर भारत के सबसे कम प्रदूषण वाले शहरों में शामिल पटियाला में पौधरोपण करने के अभियान वन विभाग के स्तर पर सालों से ठंडे पड़े हैं। इन्हें सिरे चढ़ाने में कहीं राजनीति तो कहीं बाबूशाही अड़ंगा बनी हुई है।
घलौड़ी गांव में नगर निगम से वन विभाग को मिलने वाली 11 एकड़ जमीन की निशानदेही ना होने के चलते यह जमीन वन विभाग के पास नहीं आई और इस पूरे ही क्षेत्र में बड़े पैमाने पर होने वाला पौधारोपण बिलकुल नहीं हो सका है और क्षेत्र बंजर पड़ा है। सूत्र बताते हैं कि आसपास के खेतों का एरिया कुछ बढ़ा तो निगम का क्षेत्र कम हो गया। अब निगम वन विभाग को ऐसे ही जमीन अपने कब्जे में लेने को कह रहा है तो वन विभाग निशानदेही करवाने के बाद। दिलचस्प है कि 'दैनिक जागरणÓ ने अपने पिछले साल के गतिरोध कालम में भी यह मुद्दा उठाया था और हालात आज भी वैसे ही हैं। जबकि वन विभाग और लोकल बाडी विभाग में प्रक्रिया को अंतिम रुप दिया जा चुका है।
ठीक ऐसे ही कब्जा ना मिलने के कारण पौधारोपण ना होने का एक और उदाहरण इस साल जुड़ गया है। लंग गांव में हाईकोर्ट के आदेशों के बाद वन विभाग को मिली दस एकड़ जमीन पर पौधारोपण नहीं हो पाया है। यहां कारण यह है कि जिन लोगों का वर्तमान में जमीन पर कब्जा है उनकी राजनीतिक पहुंच उंची है। वन विभाग की ओर से कब्जा कार्रवाई के छह नोटिस जारी हो चुके है। हर बार पूरी डिवीजन से मजदूर व कर्मचारी ट्रैक्टर व अन्य वाहन बुलवा कर विभाग कब्जा लेने जाने की तैयारी करता है पर उसे प्रोटेक्शन के लिए पुलिस नहीं मिलती। कभी वीआईपी डयूटी आ जाती है तो कभी कोई अन्य कार्यक्रम। दिलचस्प है कि यहां राजस्व विभाग के अधिकारियों की तैनाती के अलावा एक डयूटी मेजिस्ट्रेट सहित 50 से 100 लोग पूरी तैयारी के साथ बैठे रह जाते है क्योंकि उन्हें पुलिस सहायता नहीं मिली होती या फिर अंतिम समय में कोई फोन आ जाता है और हजारों पौधे पेड़ बनने लगने से पहले ही लिफाफे का हिस्सा हो जाते हैं।
हालांकि विभाग ने जिले में दो लाख अधिक पौधों को लगाया अथवा बंटवाया गया है। विभाग की सनौर, पटियाला, समाना, मैंहस, सहित जिले में एक दर्जन नर्सरी हैं। जहां पर लोगों को पौधे कम रेट पर मुहैया करवाए जाते हैं। जहां पर आवला, बेहड़ा, बांस, पिपल, सुखचैन, जामुन, रीठा, बिल, गुलमोहर, जकरंडा, के अलावा अन्य किस्मों के पौधे उपलब्ध रहते हैं। जंगलात विभाग ने पौधारोपण को किसी तरह की कोई जमीन का अधिग्रहण नही किया है। विभाग ने भादसों भीड़, दंदराला, बीड़, अलावा अन्य सरकारी जगहों में पौधे लगाने का काम जरुर किया है।
वहीं पौधारोपण के नाम पर फोटो खिंचवाने वाले, चंदा व शोहरत बटोरने के अलावा खुद को ही खिताब दे स्वयंभू होने वाले समाजसेवी लोगों बहुत कम ऐसे हैं जिन्होंने फिर से पौधारोपण वाले स्थल का पुन: चक्कर लगाया हो। ऐसे में पौधे के पनपने की उम्मीद दस फीसद से भी नीचे आ जाती है। जानकार बताते हैं कि एक बार अगर जानवर किसी पौधे पर मुंह मार जाता है तो वो फिर उभर नहीं पाता। पौधों के पेड़ बनने के पीछे पानी ना मिलने के बाद दूसरी बड़ी रुकावट यही है।
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