Wednesday, 15 February 2012

यहां चलती है मर्जी, नहीं हुआ वन वे, municipal corporation, one way


-ना लोगों ने दिया सहयोग, ना प्रशासन ने ली सुध
-अभी भी लगे हैं वनवे के बोर्ड पर मानता नहीं कोई
 भूपेश चट्ठा, पटियाला
शाही शहर के चंद लोगों के अंदाज निराले हैं जो अपने ही तरीके से अपनी और अपने जीवन की गाड़ी चलाते हैं। ना चाहते हुए भी अब हर कोई अपनी मर्जी चलाने लगा तो परकोटे वाले शहर की सड़कों पर ट्रैफिक जाम की  समस्या से निजात दिलाने नगर निगम की ओर से बनाया गया ट्रैफिक प्लान शहर में सिरे नहीं चढ़ सका है। शहर की सड़कों को वन वे प्लान अब कागज के नक्शों में सीमित हो कर रह गया है।
शहर में ट्रैफिक को तरतीब से नियंत्रित करने को शेरांवाला गेट से अंदर प्रवेश करने पर तव्वकली मोड़ से धर्मपुरा बाजार, अनारदाना चौंक और फिर अदालत बाजार होते हुए किला चौंक तक का रास्ता एक तरफा कर दिया गया। इसी प्रकार लाहौरी गेट से आर्या समाज चौंक की ओर का रास्ता वन वे करते हुए सिर्फ प्रवेश के लिए रखा गया। अन्य सड़कों से बाहर की ओर निकलने के रास्ते सुझाए गए।
एक बारगी प्लान घोषित होने के बाद ना लोगों ने इसके क्रियांवन मेंं सहयोग दिया और ना ही प्रशासन ने ही इसकी सुध ली है। शहर में अभी भी वनवे के बोर्ड लगे हैं पर इस दिशा संकेतों को मानने वाला कोई नहीं है।
वहीं मेयर अजीतपाल सिंह कोहली कहते हैं कि निगम की ओर से इस दिशा में हर संभव उपाय किया गया। लेकिन 'लोगों की इच्छाÓ के आगे नहीं चल सका। इसके अलावा इसे लागू करने का जिम्मा ट्रैफिक पुलिस के पास था इसमें निगम की कोई भूमिका नहीं थी। ऐसे में आप नगर निगम को दोषी नहीं ठहरा कसते।
 लगातार बढ़ रही ट्रैफिक समस्या इस समय जिला पुलिस के लिए भी एक बड़ी समस्या बन चुकी है, लेकिन पुलिस विभाग इस समस्या को हल करने के लिए कोई सफलता हासिल नहीं कर सका है। ट्रैफिक से जुड़े पुलिस अधिकारियों का अपना तर्क है कि वह ट्रैफिक के समाधान के लिए कई प्रकार की प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाकर अपने आला अधिकारियों को भेजते रहे हैैं, लेकिन किसी भी योजना को सरकार ने गम्भीरता से नहीं लिया। यही नहीं शहर के मुख्य 19 ट्रैफिक प्वाइंट  पुलिस कर्मी कभी कभार ही दिखते हैं।
आतंकवाद के दिनों को याद करने वाले लोग बताते हैं कि यही पुलिस थी और ऐसी ही नगर परिषद थी, किसी की क्या मजाल कि एक साइकिल भी निकल जाए। अब केवल योजनाएं बन रही हैं।
दिलचस्प है कि शहर के दुकानदार दबी जुबां से यह तो स्वीकार करते हैं कि ग्राहक पहले की तरह शहर में नहीं आते। बड़ी गाडिय़ां और लगने वाले जाम इसके लिए जिम्मेवार हैं, पर इस कार्य में उनका योगदान भी है, इस पर बोलने को तैयार नहीं हैं और पड़ौसी की ओर इशारा कर देते हैं कि देखो वो मुझसे च्यादा बड़ा गुनाहगार है।

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