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Friday, 25 February 2011

उम्मीद; शगुन योजना को 'अच्छे शगुन' का इंतजार

 चुनावी वर्ष में राशि बढ़ने के प्रस्ताव पर नहीं लगी मुहर 
 मई, 2009 से मिलना है दलित की बेटी को शगुन, कुछ और जातियां भी जोड़ी

भूपेश चट्ठा, पटियाला

साल में विवाह के दो बड़े सीजन और बीच बीच में आने वाले कुछ अच्छे महूर्त अपने क्रम से आ रहे है और बिना किसी जाति, धर्म के द्वेष के विवाह भी भरपूर हो रहे है लेकिन राज्य सरकार की ओर से शगुन योजना के तहत दी जाने वाली राशि को आज भी 'अच्छे शगुन' का इंतजार है।

दिलचस्प है कि राज्य में पिछली तीन सरकारों के चुनावी वर्ष के कार्यकाल का इतिहास गवाह है कि इस अंतिम वर्ष में किसी का शगुन बकाया रहना तो दूर अपितु शगुन राशि भी बढऩे की घोषणाएं भी होती रही है। शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी सरकार के पिछले कार्यकाल में सरकार ने योजना 51 सौ रूपये के साथ शुरू की तो कांग्रेस सरकार ने सत्ता में आते ही इसे 61 सौ रूपये कर दिया और पिछले विधान सभा चुनावों से ठीक पहले राशि को बढ़ा कर 15 हजार रूपये कर दिया गया। अब राज्य के सामाजिक सुरक्षा विभाग के तहत आते अनुसूचित जाती पिछड़ी श्रेणी विभाग की ओर से शगुन राशि बढऩे का प्रस्ताव तैयार तो कर लिया गया पर मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर इस पर मुहर नहीं लगी है। आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि शगुन योजना के तहत राशि को बढ़ा कर 21 हजार किए जाने की मांग लगातार आ रही है, जिसके चलते निदेशालय की ओर दसे मुख्यमंत्री के ध्यान में बात लाई गई उन्होने इस पर इंकार तो नहीं किया पर हामी भी नहीं भरी है।

वहीं विभाग की निदेशिका इंदू मिश्रा अपने कार्यकारी निदेशक से बात करवा बताती है कि धन का अभाव आगे आ रहा है। यही सबसे बड़ी समस्या है। याद रहे कि मई 2009 से शगुन योजना के तहत दी जाने वाली राशि नहीं मिली है। दलित की बेटी को विवाह शगुन के रूप में दिए जाने वाले 15 हजार रूपये तो अभी आने है पर सरकार ने पिछड़ी श्रेणी की कुछ और जातियां भी इसमें जोडऩे की घोषणा कर दी है।

दूसरी ओर लोकतंत्र में चुनावी राजनीति पर निगाह रखने वाले कहते है कि अकेले पटियाला जिले में 45 सौ दलितों की बेटियां शगुन का इंतजार कर रही है। और सधारण गणित अनुसार सीधे प्रभावित होने वाले मायका और ससुराल पक्ष के परिवार मिला लें तो यह आंकड़ा दोगुना हो जाता है। ऐसे हर घर की दो पीढिय़ों में मतदाताओं की संख्या आठ-दस से कम नहीं है। ऐसे में एक लाख के करीब पहुंच चुके और लगातार बढ़ रहे वोट बैंक से कोई भी राजनीतिक दल 'पंगा' लेने की हिमाकत नहीं कर सकता। शगुन मिलेगा भी और आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू होने से पहले इसके बढऩे की घोषणा होने की भी पूरी संभावना है पर 'अच्छे शगुन' का इंतजार है। संभावित रूप से बढऩे वाली राशि और बकाया अर्जियों का भुगतान करने में होने वाला एक सौ करोड़ रूपये का कुल खर्च बड़ी रकम नहीं है।