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Monday, 29 October 2012

बारिश से राहत पर और तेज हुई तो आफत


- पत्ता लपेट सुंडी से धान के पौधों को मिलेगी निजात
- अगेती किस्मों पर और बारिश का हो सकता है नुकसान
भूपेश चट्ठा, पटियाला
लगातार हुई रिमझिम बारिश से सूखे की मार झेल रहे और महंगा डीजल फूंक रहे किसानों को आखिरकार राहत मिल गई है, लेकिन धान के सीजन के जिन दिनों में ये बारिश हो रही है उसके और तेज होने अथवा हवा चलने से यही राहत, आफत में बदल सकती है।
प्रोग्रेसिव खेती से जुड़े जसविंदर सिंह बताते हैं कि बारिश का फसल को लाभ ही है। इस बार कोई भी ऐसी जगह नहीं है जहां धान की फसल डूब रही हो ऐसे में धान को सभी जगह पर फायदा हो रहा है। चारा व बासमती के नाम इसमें शामिल किए जा सकते हैं। इसी प्रकार कोरजीवाला के परविंदर सिंह कहते हैं कि वे देख रहे हैं कि कुछ दिनों से पत्ता लपेट सुंडी धान की बीमारी के रूप में पौधों को लग रही है। इन बारिशों से बिना स्प्रे ही दूर होनी चाहिए। वे कहते हैं कि जो जान ईश्वर के दिए पानी में है वो टयूबवेल के पानी में नहीं। वहीं बराबर पानी का छिड़काव होता है, यहां कुछ पौधे डूब रहे होते है तो कुछ पानी आने का इन्तजार कर रहे होते हैं।
इसी क्रम में आनन फानन ज्यादा डीजल फूंक कर शुरु में धान की बिजाई करने वाला किसान थोड़ा चिंतित होने लगा है। इन पौधों में बल्लियां निकलने को हैं वहां पर बारिश तेज होने से दाने में बनने वाले दूध की कमी रह जाती है अथवा दाना बनता ही नहीं है। हालांकि बारिश के साथ हवा ना चलने के कारण फसल के जमीन में बिछने की खबर नहीं है।
वहीं मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल बताते हैं कि बारिश का इसी रफ्तार से होना धान के लिए अच्छा है। इसके बाद खिलने वाली धूप पौधे की ग्रोथ और बढ़ाएगी। बारिश से पिछले दिनों में कुछ क्षेत्रों में थोड़ी बहुत पौधों को लगी पत्ता लपेट सुंडी भी हट जाएगी, लेकिन बारिश ज्यादा हुई तो धान की अगेती किस्मों विशेष रूप से पीआर 113, 114 आदि को नुकसान पहुंच सकता है। हालांकि धान की ही पछैती किस्मों के लिए ये अभी भी फायदेमंद है।

Tuesday, 17 April 2012

कांगे्रस घास को उखाड़ फेंका देसी बाथू से local herb killed congress grass


 पृथ्वी के प्रहरी 1
फोटो: 37
- गोल्फ कोर्स, ईको टूरिजम के नाम पर क्यों उजाड़ते हो जंगल जब लगा नहीं सकते : जोगिंदर टाइगर
- विदेशी पौधे ला हमारा हैबीटेट खत्म किया, पांच साल बाद वन अधिकारियों को समझ आती है कि पौधा नहीं चलेगा
भूपेश चट्ठा, पटियाला
साठ के दशक में हरित क्रांति से ठीक पहले देश में अन्न की कमी पर अमेरिका के साथ पीएल-480 जैसे शर्मनाक समझौते हुए इनके साथ ही भारत को गेहूं दिया गया, इसी गेहूं के साथ अमेरिका से आए जहाजों बिन बुलाए मेहमान काकरोच इस धरती पर आए और तोहफे में मिली कांग्रेस घास। इन दोनों को ही लाइलाज बीमारी मान लिया गया। काकरोच तो खत्म नहीं हुए अलबत्ता कांग्रेस घास का इलाज जरूर तलाश लिया गया है। ये कर दिखाया डा.जोगिंदर टाइगर ने। उन्होंने देसी बूटी बाथू के साथ प्रयोग किया और बरसात के दो ही सीजन में देखा गया कि जहां बाथू के बीज छिड़के थे वहां से कांग्रेस घास बिलकुल गायब है और बाजारों में बिकने आने लगा बाथू एक बार फिर सड़क किनारे दिखने लगा।
पटियाला में डकाला रोड पर फनविल स्थित फाइव ऐलिमेंट हैल्थ एंड ऐजूकेशनल सोसायटी चला रहे डा.टाइगर बताते हैं कि हर बीमारी का इलाज आपके आसपास ही मौजूद होता है, लेकिन होता क्या है कि हम अपने जुकाम का इलाज अमेरिका में बनी दवा से तो दांत का दर्द चीन से ठीक करवाना चाहते हैं। यहीं से त्रासदी शुरू होती है और फिर नहीं रुकती।
वे याद करते हैं कि वर्ष 2002 में जब उनके पास सांस, दमा, चमड़ी, फेंफड़ों में इन्फेक्शन जैसी बीमारियों के रोगियों की संख्या बढ़ी तो इस ओर ध्यान गया। अध्ययन के बाद सामने आया कि 1993 की बाढ़ के बाद कांग्रेस घास का फैलाव तेजी से हुआ है और बीमारियां भी बढ़ी।
2004 आते आते सब स्पष्ट हो गया। दो साल के परीक्षण के बाद सामने आया कि जहां कहीं बाथू लगा है वहां कांग्रेस घास नहीं उगी है। इसके बाद डा. टाइगर ने बाथू की खेती शुरू की, बारिशों से ठीक पहले इसके बीजों को बोरी में भर अपने वाहन पर रखकर सड़क किनारे छिड़कना शुरू किया। दो ही सीजन में सकारात्मक परिणाम आ गए। आज भी आप पटियाला-डकाला, पटियाला-समाना, पटियाला-चंडीगढ़ पर गंडाखेड़ी तक हर बरसात के बाद सिर्फ बाथू देखेंगे, कांग्रेस घास नहीं।
दो से तीन साल के इस क्रम के बाद अब नदी किनारे हर मानसून में थोड़ी थोड़ी मात्रा में बाथू के बीज रखे जा रहे हैं। यहीं से फैलाव हो रहा है।
उधर पर्यावरण का नाम लेते ही डा. टाइगर कहते हैं कि गोल्फ कोर्स व इको टूरिजम के नाम पर आज जंगल उजाड़े जा रहे है। चंडीगढ़ का गोल्फ कोर्स कुछ इसी तरह से फैल रहा है, जो लोग आज सौ-सौ एकड़ जंगल लीज पर ले इको टूरिजम की बात करते हैं। वे ही इसका सबसे च्यादा नुकसान कर रहे है। कुछ ही सालों में यहां होटल, कालोनियां, फार्म हाउस दिखाई देंगी।