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Friday, 5 October 2012

नहीं कोई गम... आज भी है दम, freedom fighter, ajad hind foj


फोटो: 1, 7, 8, 9
भूपेश चट्ठा, पटियाला
कोई आजाद हिंद सेना का सिपाही रहा है, तो किसी ने बापू के आंदोलन में भाग लिया...किसी ने गुलामी के दौर में किसी ने थानेदार को पीटा तो कोई लाहौर जेल में छह महीने लगा आया। हर किसी की अपनी कहानी है। किस आजादी के लिए लड़े थे और क्या मिला? इस पर लगभग एक राय है पर फ्रिडम फाइटर का नाम लेते ही सारे शिकवे दूर हो जाते हैं। आंखों में चमक आ जाती है। फिर लगता है कि इन्हें नहीं है कोई गम और आज भी है दम। दोबारा लड़ाई लडऩी पड़े तो स्वतंत्रता संग्राम के इन सिपाहियों का शरीर चाहे साथ ना दे पर जच्बे में कोई कमी नहीं है।
उम्र के अंतिम पड़ाव से गुजर रहे इन सैनानियों से जब 'दैनिक जागरणÓ ने इनके कार्यक्रम में आने का सबब पूछा तो बताया गया कि जिला प्रशासन की ओर से फोन कर बुलाया गया है। इनमें से ही भादसों के निकट राजपुरा गांव के परजण सिंह खुद तो कोई बात नहीं कर पाते लेकिन उनके साथ आए उनके लड़के बताते हैं कि बापू जी खेतों में ही रहते हैं, रास्ता कच्चा है। जिसे दुरुस्त करवाना चाहते हैं। साथ ही बताया जाता है कि दवा लेने अक्सर लुधियाना जाना होता है रास्ते में दो बार टोल टैक्स देना पड़ता है। जो नहीं होना चाहिए।
इसी प्रकार आजाद हिंद फौज के एक अन्य सिपाही की विधवा गुरदयाल कौर के पुत्र बताते हैं कि बलबेड़ा के निकट 40 साल तक खेती करने के बाद 2006 में उनसे जमीन खाली करवा ली गई। उन्हें वापिस दी जाए। जबकि विर्क कालोनी में रह रहे शमशेर सिंह अपनी टूटी टांग से परेशान हैं। कहते हैं कि पिछली बार ढि़ंडसा साहब ने वायदा किया था पर बात नहीं बनी अब देखो क्या होता है? ऐसे ही गोदम सिंह की कहानी लाहौर जेल से शुरु होती है और यहीं पर ठहर जाती है।
दिलचस्प है कि समस्या सम्मेलन में पहुंचा लगभग हर सेनानी अपनी परेशानी से परेशान नहीं है बल्कि अपने बच्चों को उम्मीद के मुताबिक ना सम्मान ना मिलने से परेशान जरूर दिखा। स्वतंत्रता संग्राम का नाम लेते ही आंखों में चमक आती है और जवानी के पूरी जोश के साथ आधी अधूरी कहानी जोड़ी जाती है, शेष इशारों में समझने के लिए छोड़ दी जाती है, पर बात सरकार से कुछ लेने की आती है तो हाथ जरूर हिलते हैं पर मुंह से कुछ नहीं निकलता।


इंतजार में बैठे रहे स्वतंत्रता सैनानी 
फोटो: 4, 5, 6
आजादी का 66 वां साल देख रहे किसी भी स्वतंत्रता सैनानी की उम्र 80 से कम नहीं है, चाहे पति के देहांत के बाद पेंशन ले रही उसकी पत्नि को स्वतंत्रता सैनानी का लाभ मिल रहा हो। ऐसे में एक ही कुर्सी पर कई घंटे बैठे रहना खासा मुश्किल काम कहा जा सकता है। भादसों से इस समस्या सम्मेलन में भाग लेने आए एक सैनानी के पुत्र अवतार सिंह बताते हैं साढ़े दस बजे उनके आने के बाद से पौने 12 तक कोई नहीं आया है। एसी चल नहीं रहा है, अफसर एसी में आराम से बैठे हैं जबकि देश को आजाद करवाने वाले परेशान हैं। क्या समस्या लेकर आए है? इस सवाल पर वे कहते हैं कि उन्हें तो फोन कर बुलाया गया है, उनके बापू की तो मानसिक रूप से समझ कम हो गई है। साथ सवाल दागते हैं कि बुलाया है तो पहले बात होनी चाहिए।
 ऐसे ही मेघा सिंह बताते हैं कि यहां पर निसंदेह चाय व पानी आया है पर इस उम्र में लंबी देर तक गर्मी में बैठे रहना बीमार करने वाला काम है। जबकि कृपाल सिंह आरोप लगाते हैं कि जो चंद लोग आगे होकर लीडर बने हैं, वे तो अपने काम करवाने अफसरों के साथ जा बैठे हैं बाकी यहां छोड़ दिए गए हैं।